सारस्वत ब्राह्मणों के वंशज हैं गोआ के रोमन कैथोलिक:110 कैथोलिकों की जीन संरचना की मैच, वाराणसी और लखनऊ के वैज्ञानिकों का शोध; 16वीं शताब्दी में बदले थे धर्म

वाराणसी5 महीने पहले
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शोध कार्य के दौरान गोआ में जीन विज्ञानियों का दल। - Dainik Bhaskar
शोध कार्य के दौरान गोआ में जीन विज्ञानियों का दल।

दुनिया के अलग-अलग देशों में रह रहे यहूदी, पारसी और रोमन कैथोलिकों के मूल स्थान को लेकर कई तरह की भ्रांतियां हैं। लेकिन, भारत में गोआ, मंगलौर और कुमटा में रहने वाले रोमन कैथोलिक उत्तर भारतीय सारस्वत ब्राह्मणों के वंशज हैं। यह बात 24 अगस्त को अमेरिका के प्रतिष्ठित जर्नल ह्यूमन जेनेटिक्स में छपे एक शोध पत्र में साबित की गई है।

वाराणसी, लखनऊ और हैदराबाद के जीन वैज्ञानिकों ने गोआ, मंगलौर और कुमटा के 110 रोमन कैथोलिक लोगों के जीन सैंपल पर शोध किया तो पाया कि उनमें से ज्यादातर के आनुवांशिक गुण सारस्वत ब्राह्मण और कुछ के यहूदियों से मैच कर रहे थे। वहीं इन लोगों की डीएनए संरचना में पाया जाने वाला हेप्लोग्रुप R1 सास्वत ब्राह्मणों में भी पाया गया है।

6 साल से चल रहा था शोध कार्य

वैज्ञानिकों की टीम पश्चिमी घाट के रोमन कैथोलिकों पर 6 साल से शोध कर रही थी। इस शोध में मऊ निवासी और लखनऊ स्थित बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट के जीन विज्ञानी डॉ. नीरज राय, स्वीडन में इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड मटेरियल्स के ग्रुप लीडर व बीएचयू के पूर्व छात्र वाराणसी निवासी डॉ. अंशुमान मिश्रा, सीसीएमबी हैदराबाद से डॉ. कुमारासामी थंगराज और लोमस कुमार जुड़े थे। डॉ. नीरज राय ने बताया कि पिछले 2500 साल से भारत में प्रवास और आबादियों के आपस में मिश्रित हो जाने का सबसे बेहतर उदाहरण दक्षिण भारत में दिखता है। वहां की सांस्कृतिक विविधता इस तथ्य को सिद्ध भी करती है।

रोमन कैथोलिक लोगों के सैंपल जुटाने के दौरान कुमटा में शोध कार्य से जुड़े वैज्ञानिक डॉ. क्रांति, डॉ. अंशुमान मिश्रा, डॉ. नीरज राय और सत्या। (बाएं से दाएं)
रोमन कैथोलिक लोगों के सैंपल जुटाने के दौरान कुमटा में शोध कार्य से जुड़े वैज्ञानिक डॉ. क्रांति, डॉ. अंशुमान मिश्रा, डॉ. नीरज राय और सत्या। (बाएं से दाएं)

बेहतर जीवन के लिए बसे पश्चिमी घाट पर

डॉ. राय के अनुसार रोमन कैथोलिक के डीएनए का मिलान द्रविड़ लोगों से भी कराया गया, लेकिन उनकी जैविक समानता इंडो-यूरोपियन से सिद्ध हो पाई है। डॉ. अंशुमान मिश्रा ने बताया कि सारस्वत ब्राह्मण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्राचीन काल से ही बेहतर जीवन के लिए प्रवास करते रहे हैं। इसी चक्कर में वे लोग पश्चिमी घाट के पर्वतों पर जाकर बस गए। माना जाता है कि 16वीं शताब्दी में जब पुर्तगार्ली भारत आए तभी सारस्वत ब्राह्मणों को जबरन रोमन कैथोलिक धर्म अपनाने को बाध्य किया गया होगा।

जेनेटिक्स के आधार पर सामने ला रहे पहचान

लोमस कुमार ने बताया कि प्राचीन आबादी की पहचान हम अब जेनेटिक्स के आधार पर सामने ला रहे हैं। वहीं, डॉ. कुमारासामी थंगराज के मुताबिक, पश्चिमी घाट के रोमन कैथोलिक लोगों के डीएनए में Y गुणसूत्र का 40 फीसद से अधिक हिस्सा हेप्लोग्रुप R1 से संबंधित है। जबकि, कोंकण क्षेत्र में इस हेप्लोग्रुप की कोई आबादी नहीं पाई जाती। इन्हें यह हेप्लोग्रुप पैतृक विरासत के रूप में मिला था, जो कि सारस्वत ब्राह्मण ही थे। ऐसे में जेनेटिक्स के आधार पर यह सिद्ध होता है कि गोआ, मंगलौर और कुमटा के रोमन कैथोलिक सारस्वत ब्राह्मणों के ही वंशज हैं।

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