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स्मृति शेष:राजन मिश्र अक्सर मौत पर बात करते थे, कहते थे- जिंदगी जियो, अगर मौत को आना होगा तो एक दिन आएगी ही

वाराणसी2 महीने पहलेलेखक: अमित मुखर्जी
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बनारस घराने के शास्त्रीय गायक पंडित राजन मिश्र का रविवार को दिल्ली में निधन हो गया। -फाइल फोटो। - Dainik Bhaskar
बनारस घराने के शास्त्रीय गायक पंडित राजन मिश्र का रविवार को दिल्ली में निधन हो गया। -फाइल फोटो।

बनारस घराने के शास्त्रीय गायक पंडित राजन मिश्र का रविवार को दिल्ली में निधन हो गया। कुछ दिनों पहले कोरोना संक्रमित होने की वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इसी दौरान उन्हें हार्ट अटैक आया। बनारस की कबीरचौरा गली में उनका पुश्तैनी मकान है। उनके भांजे अमित मिश्रा ने दैनिक भास्कर ने कुछ यादें और किस्से साझा किए।

मौत से डरो मत, जिंदगी को जीना चाहिए
अमित मिश्रा ने बताया काशी आने पर हम लोग जब भी साथ बैठते थे तो वे अक्सर मृत्यु पर चर्चा किया करते थे। कहते थे कि मृत्यु को किसी ने नहीं देखा है, इसलिए इसकी चिंता ही नहीं करनी चाहिए। मौत को जब आना होता तो कोई रोक नहीं सकता। सभी को जिंदगी जीना चाहिए। मौत को आना होगा तो आएगी ही।

अपने परिवार के साथ पंडित राजन मिश्र। यह फोटो गुरु पूर्णिमा पर ली गई थी।
अपने परिवार के साथ पंडित राजन मिश्र। यह फोटो गुरु पूर्णिमा पर ली गई थी।

लंदन के कार्यक्रम में ताली बजाने से मना किया
लंदन के एक कार्यक्रम में पूरा हॉल भरा हुआ था। दोनों भाइयों के आते ही तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूंज उठा। मंच पर पहुंचकर उन्होंने माइक से एनाउंस किया कि कार्यक्रम के दौरान कोई तालियां नही बजाएगा। तीन घंटे की प्रस्तुति के दौरान हॉल में बैठे लोग संगीत में डूब गए। मंच से उन्होंने अभिवादन किया तो आधे घंटे तक तालियां बजती रहीं।

तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन के साथ राजन-साजन मिश्र।
तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन के साथ राजन-साजन मिश्र।

होली बहुत पसंद थी
पंडित राजन मिश्र को होली बहुत अच्छी लगती थी। वे कहते थे कि जीवन के अलग-अलग रंग इसमें दिखाई पड़ते हैं। होली खेलने से जिंदगी में रंगत रहती है। बनारस के बारे में कहते थे कि काशी जैसी कोई नगरी नहीं है।

शास्त्रीय गायक पंडित जसराज के साथ राजन मिश्र।
शास्त्रीय गायक पंडित जसराज के साथ राजन मिश्र।

16 घंटे तक प्रस्तुति देते रहे
कुछ साल पहले मुंबई के एक हॉल में उन्होंने भैरव से भैरवी तक रागों की श्रेणी को प्रस्तुत किया था। कहते थे कि भैरव सुबह का और भैरवी रात का राग है। सुबह कार्यक्रम शुरू कर 4-4 घंटे यानी 16 घंटों तक प्रस्तुति देते रहे। हर चार घंटे के बाद दो घंटे ब्रेक लेते थे। वे कहते थे कि संगीत ही सच्ची साधना होती है।

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