बिहार के मजदूर के बेटे को मिली BHU में जिंदगी:वाराणसी में 7 साल के बच्चे के खून से स्टेम सेल निकालकर ग्लैंड कैंसर को किया जड़ से खत्म, अब कीमोथेरेपी की भी जरूरत नहीं

वाराणसी2 महीने पहले
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यह BHU का बोन मैराे ट्रांसप्लांट सेंटर है जहां पर जुलाई के बाद दूसरी बार बच्चे में स्टेम सेल को ट्रांसप्लांट कराकर कैंसर से जान बचाई गई है। - Dainik Bhaskar
यह BHU का बोन मैराे ट्रांसप्लांट सेंटर है जहां पर जुलाई के बाद दूसरी बार बच्चे में स्टेम सेल को ट्रांसप्लांट कराकर कैंसर से जान बचाई गई है।

अब बोन मेरो ट्रांसप्लांट और स्टेम सेल आधारित इलाज के लिए दिल्ली या मुंबई के खर्चीले अस्पतालों के चक्कर नहीं लगाने होंगे। पूर्वांचल और बिहार के लोगों को यह सुविधा वाराणसी में ही मिल जाएगी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के चिकित्सा विज्ञान संस्थान (IMS) में स्थित सर सुंदरलाल अस्पताल में बच्चों पर स्टेम सेल ट्रांसप्लांट का पहला प्रयोग सफल रहा। बिहार के एक बच्चे के स्टेम सेल की मदद से ग्लैंड कैंसर को जड़ से खत्म कर दिया गया। 7 साल के इस बच्चे के ब्लड से लिया गया स्टेम सेल ग्लैंड कैंसर से ग्रसित संक्रमित कोशिकाओं की जगह पर ट्रांसप्लांट किया गया। सवा महीने तक बच्चे को ऑब्जर्वेशन पर अस्पताल में ही रखा गया और अब 2 दिन पहले बच्चा डिस्चार्ज हो अपने घर जा चुका है और बिल्कुल स्वस्थ है। अगस्त महीने में बिहार के औरंगाबाद से आए इस बच्चे के परिजनों के पास इलाज के पैसे नहीं थे। इस लिहाज से BHU में इस ट्रांसप्लांट से बच्चे की जान बचाई गई। डॉक्टरों ने बताया कि अब उसे कीमोथेरेपी की भी जरूरत नहीं होगी। सबसे खास बात इस जटिल ऑपरेशन में बाहर 6 लाख रुपए से ज्यादा पैसे लगते हैं, मगर यहां महज 1.5 लाख ही अब तक खर्च हुए। अभी तक लखनऊ के SGPGI और दिल्ली के AIIMS में ही अब तक ये सुविधा थी और खर्च के मामले में यहां पर भी इलाज करना किफायती नहीं पड़ता है।

प्रोफेसर वीनिता गुप्ता
प्रोफेसर वीनिता गुप्ता

IMS-BHU में डिविजन ऑफ पीडियाट्रिक हीमेटोलॉजी एंड आेंकोलाॅजी की इंचार्ज प्रोफेसर वीनिता गुप्ता द्वारा इस ट्रांसप्लांट को पूरा किया गया। प्रो. गुप्ता बताती हैं कि 2 साल पहले इंग्लैंड के न्यू कैसल यूनिवर्सिटी में इसकी 6 महीने तक ट्रेनिंग भी ली है। उसके बाद उन्होंने BHU में इस कार्य को अंजाम दिया। प्रोफेसर गुप्ता के अनुसार कैंसर रोग को जड़ से खत्म करने में विभाग की यह दूसरी सफलता है। इससे पहले जुलाई महीने में पहला सफल ट्रांसप्लांट हुआ था।

स्टेम सेल निकालने की मशीन।
स्टेम सेल निकालने की मशीन।

बच्चे के ही ब्लड से लिया स्टेम सेल
इस बच्चे को पेट का ग्लैंड कैंसर था। इसे न्यूरो ब्लासटोमा रोग भी कहते हैं। बच्चे में यह जेनेटिक नहीं, बल्कि इंफेक्शन के कारण हुआ था। प्रोफेसर गुप्ता ने बताया कि एथेरेपिक मशीन द्वारा बच्चे के ब्लड सेल से स्टेम सेल को 4 घंटे के अंदर निकाल लिया गया। इसके बाद 4 दिन तक ब्लड बैंक में माइनस 20 डिग्री सेल्सियस तापमान पर स्टोर किया गया। बच्चे की एक कीमोथेरेपी करने के बाद संक्रमित कोशिकाएं जब हटा ली गईं तो स्टेम सेल को इंजेक्ट कर दिया गया। इस ऑपरेशन के बाद बच्चे को ICU वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। जहां उस पर करीब 1 महीने तक 24 घंटे निगरानी रखी गई। स्थिति बेहतर होते ही नॉर्मल वार्ड में लाकर 15 दिन बाद छुट्टी दे दी गई।

बच्चे के पिता औरंगाबाद में मजदूर
प्रोफेसर गुप्ता ने बताया कि निजी अस्पतालों में इस इलाज में 6 लाख रुपए से अधिक लग जाते हैं, वह भी पूर्वांचल में तो इंपॉसिबल है। जबकि BHU में ऑटोलॉगस ट्रांसप्लांट के तहत ज्यादातर व्यवस्था सरकारी खर्चे से की जाती है। बच्चे के पिता औरंगाबाद में मजदूरी करते हैं। इस कारण से उन्हें मुख्यमंत्री राहत कोष से 2 लाख रुपए भी इलाज के लिए मिले।

एनीमिया और थैलीसीमिया में होगा ट्रांसप्लांट

प्रोफेसर गुप्ता ने बताया कि ल्यूकेमिया यानि कि ब्लड कैंसर, लिंफोमा ग्लैंड कैंसर, एप्लास्टिक एनीमिया और थैलीसीमिया जैसे रोगों को बोन मैरो ट्रांसप्लांट की मदद से ठीक किया जा सकता है। बता दें कि इस केंद्र की स्थापना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल किया था। तभी से यहां पर इलाज की तैयारी की जा रही थी। इस सेंटर में केवल ट्रांसप्लांट कराने वाले मरीजों को ही देखा जाएगा।

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