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53 उत्पादों को GI टैग दिलाने की तैयारी:लद्दाख के सीबकथोर्न और पश्मीना को मिलेगा विशिष्ट उत्पाद का दर्जा, पाकिस्तान और चीन बॉर्डर के उत्पादों को वाराणसी दिलाएगा ख्याति

वाराणसी10 महीने पहले
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रामनगर के सफेद भंटे (बैगन) व लद्दाख का पौष्टिकता से भरपूर फल सीबकथोर्न। - फोटो। - Dainik Bhaskar
रामनगर के सफेद भंटे (बैगन) व लद्दाख का पौष्टिकता से भरपूर फल सीबकथोर्न। - फोटो।

जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान और चीन के सीमावर्ती इलाकों के विशिष्ट उत्पादों को वाराणसी अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाएगा। पद्मश्री डॉ. रजनीकांत ने पाकिस्तान बॉर्डर स्थित पूंछ और लद्दाख सहित उत्तर भारत के 53 उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर लाने की तैयारी कर ली है। जल्द ही इन उत्पादों की विशेषता को लेकर वह कश्मीर का दौरा करेंगे। इन खास उत्पाद के इतिहास के बारे में देश और दुनिया के लोगों से जानकारी साझा करेंगे। बता दें, पद्मश्री डॉ. रजनीकांत (ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी) इससे पहले भी पूर्वांचल के 13 उत्पादों को जियोग्रॉफिल इंडीकेशन (GI) टैग दिला चुके हैं।

लद्दाख में पौष्टिकता से भरपूर फल सीबकथोर्न और पश्मीना (ऊन) समेत कई ऐसे विशिष्ट उत्पाद पाए जाते हैं, जिनके बाजार में आने से उस क्षेत्र में रोजगार का विकास होगा। साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में उस क्षेत्र को उसके विशेष वस्तु की वजह से लोग जान पाएंगे।

रामनगर के सफेद भंटे (बैगन) की खास किस्म। इसका चोखा बेहद ही स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है।
रामनगर के सफेद भंटे (बैगन) की खास किस्म। इसका चोखा बेहद ही स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है।

बनारसी टमाटर चाट और मिठाइयों की बारी
2006 में बनारसी साड़ी को GI टैग दिलाने से शुरू हुआ सफर रामनगर के सफेद भंटा (बैगन) के आगे भी जारी है। इस भंटे से बने चोखा का लुत्फ 2018 में वाराणसी दौरे पर आए फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी उठा चुके हैं। इस भंटे के GI टैग के लिए सारी कागजी कवायद पूरी हो चुकी है और अब प्रमाण पत्र का इंतजार है।

डॉ. रजनीकांत ने बताया कि अब तक बनारसी साड़ी, गुलाबी मीनाकारी, चंदौली के काला नमक चावल, भदोही के कालीन, मीरजापुर और गाजीपुर के वॉल हैंगिंग, चुनार बलुआ पत्थर, मेटल क्राफ्ट, स्टोन शिल्प, ग्लास बीड्स, बनारसी पान, निजामाबाद आजमगढ़ की ब्लैक पाटरी और प्रयागराज के अमरूद को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल चुकी है। अब बारी बनारस के खट्टे-मीठे व चटपटे टमाटर चाट और विविधता पूरक मिठाईयों की है।

पद्मश्री डॉ. रजनीकांत मिश्र।
पद्मश्री डॉ. रजनीकांत मिश्र।

GI टैग के बाद बाजार में बढ़ जाती है मांग
डॉ. रजनीकांत ने बताया कि GI टैग मिलने के बाद किसी भी उत्पाद की मांग एक-तिहाई ज्यादा बढ़ जाती है। क्षेत्र विशेष के तौर पर पहचान रखने वाले उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय ग्राहक मिलने के साथ ही प्रतिष्ठा भी बढ़ जाती है। GI टैगिंग की प्रक्रिया जब से बनारस में शुरू हुई है तबसे ही स्थानीय कुशल कारीगर, शिल्पी और बुनकर अपने पारंपरिक व्यवसाय में वापस लौटने लगे हैं।

डॉ. रजनीकांत ने कहा कि अब वह GI टैग युक्त उत्पादों के उत्पादकों की वर्तमान आय से 50 फीसदी ज्यादा की बढ़ोतरी कराने का रोडमैप बना रहे हैं। इससे युवा समेत कई अन्य लोग भी इस ओर काम करने को अग्रसर होंगे।

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