पीएम की घोषणा और BHU में पीठ पर मंथन शुरू:वाराणसी से अपनी आध्यामिक यात्रा शुरू करने वाले सुब्रमण्यम भारती पीठ में छात्र जानेंगे तमिल साहित्य की श्रेष्ठता

वाराणसी9 महीने पहले
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तमिल के प्रख्यात कवि सुब्रमण्यम भारती ने वाराणसी से शुरू की थी अपनी आध्यात्मिक यात्रा। पीएम ने आज उनके नाम से BHU में चेयर स्थापना की घोषणा की। - Dainik Bhaskar
तमिल के प्रख्यात कवि सुब्रमण्यम भारती ने वाराणसी से शुरू की थी अपनी आध्यात्मिक यात्रा। पीएम ने आज उनके नाम से BHU में चेयर स्थापना की घोषणा की।

BHU में तमिल के प्रख्यात कवि सुब्रमण्यम भारती के नाम से एक पीठ की शुरूआत होने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद BHU में बैठकों और मंथन का दौर शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक वीडियाे कांफ्रेसिंग के जरिए अहमदाबाद के सरदार धाम भवन का उद्घाटन करने के बाद यह घोषणा की। प्रधानमंत्री ने कहा कि सुब्रमण्यम भारती की 100वीं पुण्यतिथि पर वाराणसी स्थित बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के कला संकाय में 1 चेयर स्थापित किया जाने का फैसला लिया गया है।

सुब्रमण्यम भारती।
सुब्रमण्यम भारती।

पीएम ने कहा कि तमिल स्टडीज पर सुब्रमण्यम भारती चेयर विद्यार्थियों और रिसर्च फेलो को भव्य भारत के निर्माण में जुटे रहने की निरंतर प्रेरणा देगी, जिसका सपना भारती जी ने देखा था। पीएम की घोषणा के बाद BHU में कुलपति और कला संकाय के डीन के बीच बैठक भी शुरू हो चुकी है। तमिल साहित्य के विद्वानों और धर्म व दर्शन से जुड़े प्रोफेसरों ने सिलेबस भी तैयार कर लिया है। जल्द ही इस पीठ से जुड़ी जानकारियां और सिलेबस आदि बीएचयू जारी करेगा। यह पीठ कला संकाय के तमिल स्टडीज यूनिट में चलाई जाएगी। इसके तहत छात्रों को एमए और पीएचडी कराने का निर्णय लिया जा रहा है।

पत्नि चेल्लम के साथ सुब्रमण्यम भारती।
पत्नि चेल्लम के साथ सुब्रमण्यम भारती।

वाराणसी के हनुमान घाट पर रहते थे भारती

1882 में जन्में सुब्रमण्यम भारती प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद बनारस चले आए थे। यहां पर गंगा किनारे हनुमान घाट पर रहते थे। उन्होंने कई समाचार पत्रों में पत्रकार के तौर पर अपनी सेवाएं दी। वाराणसी प्रवास के दौरान ही उन्हें हिंदू आध्यात्मवाद और राष्ट्रसेवा के मर्म का पता चला। हिंदू एवं दर्शनशास्त्र विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर मुकुल राज मेहता ने बताया कि उन्होंने काशी से ही हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाएं सीखी। काशी में ही रहकर अपनी दाढ़ी भी बढ़ाई और संत व सिख की वेशभूषा में आ एगा। बता दें कि 20वीं सदी के शुरू होते ही वह वापस तमिलनाडु लौट गए और दरबारी कविता पाठ और पत्रकारिता की। वरूार् 1905 कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने वह दोबारा वाराणसी आए। इसी समय वह स्वामी विवेकानंद और सिस्टर निवेदिता से भी मिले।

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