ज्ञानवापी मस्जिद के केयरटेकर का दावा:शिवलिंग में सुराख नहीं होता; जो मिला वह फव्वारा, उसमें कुएं से पानी आता है

वाराणसी4 महीने पहलेलेखक: देवांशु तिवारी

'शृंगार गौरी मंदिर, मस्जिद से दूर है, बैरिकेडिंग के बाहर है। महिलाएं आज भी दर्शन करना चाहें, तो कर सकती हैं। हमें कोई ऐतराज नहीं है।' ये कहना है अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के जॉइंट सेक्रेटरी एमएस यासीन का।

ज्ञानवापी मस्जिद की देखरेख करने के लिए साल 1922 में अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी बनाई गई थी। साल 1989 से यासीन मस्जिद के विकास और इसके रखरखाव का काम देख रहे हैं। यासीन का कहना है कि जब आजादी से पहले 1937 में कोर्ट ने यह मान लिया था कि ज्ञानवापी वक्फ बोर्ड की प्रॉपर्टी है, तो इसे लेकर अब विवाद करना ठीक नहीं है।

यासीन अब 19 तारीख के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर फैसला उनके पक्ष में नहीं आता है, तो वे इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लेकर जाएंगे। उन्होंने सर्वे में मिले शिवलिंग और ज्ञानवापी के इतिहास पर हमसे बातचीत की है। चलिए बारी-बारी से उनकी बातों पर चलते हैं...

जो मिला वो फव्वारा था और फव्वारा है : यासीन
यासीन ने कहा, ''चाहे दिल्ली के लाल किले में चले जाइए या फिर ताजमहल। मस्जिदों में वजू के लिए खासतौर पर हौज बनाया जाता है। आमतौर पर हौज में भरा पानी गर्म हो जाया करता था। इसलिए इसमें फव्वरा बनाने की परंपरा शुरू हुई, ताकि हौज का पानी ठंडा रहे। ज्ञानवापी परिसर में जो फव्वारा मिला है, वो इसीलिए बनाया गया था।"

सर्वे में शिवलिंग मिलने के बाद वायरल हुए वीडियो में ये चीज दिखाई गई। हिंदू पक्ष इसे शिवलिंग कह रहा है। प्रतिवादी इसे फव्वारा बता रहे हैं।
सर्वे में शिवलिंग मिलने के बाद वायरल हुए वीडियो में ये चीज दिखाई गई। हिंदू पक्ष इसे शिवलिंग कह रहा है। प्रतिवादी इसे फव्वारा बता रहे हैं।

उन्होंने कहा, "सर्वे के दौरान भी जब टीम ने उस फव्वारे के छेद में सलाई डाली तो वह 64 सेंटीमीटर अंदर तक चली गई। आप बताइए कि क्या शिवलिंग में होल हो सकता है। जो मिला है वो फव्वारा था और फव्वारा है।"

पिछली दीवार पर बने फूल और घंटे अकबर के 'दीन-ए-इलाही' का प्रतीक
यासीन ने कहा, ''मस्जिद के पीछे की तरफ वाली दीवार को लेकर ऐसी बातें हो रही हैं कि उनमें मंदिर जैसी नक्काशी बनी हुई है। मैं आपको बता दूं कि जो मस्जिद के पीछे वाली दीवार पर जो अवशेष हैं वो अकबर ने साल 1585 के आस-पास नए मजहब 'दीन-ए-इलाही' के तहत बनवाए थे। ये तब हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता था। इसके बाद औरंगजेब ने इस मस्जिद को रेनोवेट कराया था। मस्जिद को को 14वीं सदी में जौनपुर के सुल्तानों ने बनवाया था।"

एमएस यासीन का कहना है कि ज्ञानवापी मस्जिद पर हिंदू चिह्नों को अकबर ने मजहब 'दीन-ए-इलाही' के तहत बनवाया था। ये हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक था। यह दीवार ज्ञानवापी के पिछले हिस्से की है।
एमएस यासीन का कहना है कि ज्ञानवापी मस्जिद पर हिंदू चिह्नों को अकबर ने मजहब 'दीन-ए-इलाही' के तहत बनवाया था। ये हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक था। यह दीवार ज्ञानवापी के पिछले हिस्से की है।

2 साल पहले कुएं की सफाई करवाई, कुछ नहीं निकला
यासीन ने कहा, ''ज्ञानवापी कूप बहुत गहरा नहीं बल्कि एक साधारण-सा कुआं है। इसकी गहराई 30 से 40 फीट की है। मैंने 2 साल पहले इसकी सफाई भी करवाई थी,वहां कचरे के सिवा कुछ नहीं निकला था। कुएं के नीचे आज भी हमारा जेट पंप फिट है। अब यह कुआं कॉरिडोर का हिस्सा है, मंदिर परिसर में है। पहले हमारे वजू वाली हौज में इसी कुएं से पानी आता था, जिस हौज के फव्वारे को शिवलिंग बताया जा रहा है।"

हाईकोर्ट ने भी माना ज्ञानवापी मस्जिद है, मंदिर नहीं
यासीन ने कहा, ''1991 का जो पूजा स्थल कानून है। वह कहता है कि 15 अगस्त 1947 में मंदिरों और मस्जिदों की जो पोजीशन थी, वो वैसे का वैसे ही रहेगा। उन्हें कोई हिला भी नहीं सकता है। साल 1936 में मस्जिद पर दायर एक मुकदमे पर 1937 में फैसला सुनाया गया था। इसमें अदालत ने माना था कि ज्ञानवापी नीचे से ऊपर तक मस्जिद है और ये वक्फ प्रॉपर्टी है। बाद में इस फैसले को हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया था।"

1937 में अदालत ने ज्ञानवापी परिसर को नीचे से ऊपर तक वक्फ बोर्ड की प्रॉपर्टी माना था। ये कॉपी उसी फैसले की है, जिसे यासीन दिखा रहे हैं।
1937 में अदालत ने ज्ञानवापी परिसर को नीचे से ऊपर तक वक्फ बोर्ड की प्रॉपर्टी माना था। ये कॉपी उसी फैसले की है, जिसे यासीन दिखा रहे हैं।

उन्होंने कहा, ''मस्जिद के ठीक पश्चिम में दो कब्रें हैं जिन पर सालाना उर्स होता था। साल 1937 में कोर्ट के फैसले में भी उर्स करने की इजाजत दी गई थी। ये कब्रें आज भी उसी जगह पर हैं लेकिन अब वहां उर्स नहीं होता है। इस मस्जिद में 1947 से नहीं बल्कि जब यह बनी है तब से यहां नमाज पढ़ी जा रही है।"

कानूनी प्रक्रिया से हमें कोई दिक्कत नहीं, मस्जिद के लिए लड़ते रहेंगे
यासीन ने कहा, ''ये कानूनी प्रक्रिया है, चलती रहेगी। इससे हमें कोई दिक्कत नहीं है। हमारे पास भी रिपोर्ट की कॉपी आएगी। हम ऑब्जेक्शन करेंगे। हमारा ऑब्जेक्शन खारिज होगा, तो हम इस मामले को और आगे ले जाएंगे। ये लड़ाई चलती रहेगी।

मस्जिद में लगा सामान यहीं का है। अफगानिस्तान या मंगोलिया से नहीं आया है। आज भी जो मकान बनाए जाते हैं उनकी ईंटों पर कहीं राम लिखा रहता है, तो कहीं स्वास्तिक बना दिखता है। अब किसी भी इमारत में उस तरह का मैटीरियल निकला तो क्या वो मंदिर हो जाएगा। इसलिए मेरी समझ से मस्जिद में मूर्तियां या शिवलिंग मिलने की बातें महज प्रचार हैं और कुछ नहीं। मैं बस यही चाहता हूं कि मेरे शहर का जन-जीवन सामान्य रहे। सब खुशी से रहें।"

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