सरकारें आईं-गईं, लेकिन मतदाताओं का भरोसा बरकरार:पूर्वांचल की वे विधानसभा सीटें जहां दो दशक से ज्यादा एक ही दल या नेता का दबदबा

वाराणसीएक वर्ष पहलेलेखक: पुष्पेंद्र कुमार त्रिपाठी

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के लिए अलग-अलग दलों के नेता इन दिनों एड़ी-चोटी का जोर लगाए हैं। सभी नुस्खे आजमाए जा रहे हैं, जिनके सहारे सियासी रसूख बरकरार रह सके। इस सियासी धमा-चौकड़ी के बीच पूर्वांचल में कुछ ऐसे भी विधानसभा क्षेत्र हैं जहां के मतदाताओं का भरोसा एक ही दल या नेता पर लगातार बना हुआ है। सरकारें आईं और गईं, लेकिन इनकी राजनीतिक आस्था को कोई डिगा न सका। आइए, जानते हैं पूर्वांचल के उन विधानसभा क्षेत्रों के बारे में जहां एक-दो बार से नहीं बल्कि दो दशक से ज्यादा समय से एक ही दल या एक ही नेता का दबदबा बरकरार है...।

वाराणसी की 2 सीटों पर 3 दशक से भाजपा
वाराणसी की शहर दक्षिणी और कैंट विधानसभा ऐसी सीट है जहां तकरीबन 3 दशक से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के तिलस्म को कोई नहीं तोड़ पाया। शहर दक्षिणी विधानसभा से वर्ष 1989 में श्यामदेव चौधरी विधायक चुने गए तो 2017 तक वह 7 बार विधायक रहे। 2017 में भाजपा ने यहां से डॉ. नीलकंठ तिवारी को प्रत्याशी बनाया तो उन्हें भी जीत नसीब हुई। नीलकंठ इस बार भी शहर दक्षिणी विधानसभा से भाजपा के प्रत्याशी हैं।

इसी तरह से वाराणसी की कैंट विधानसभा से 1991 में भाजपा की ज्योत्सना श्रीवास्तव चुनाव जीती थीं। इसके बाद ज्योत्सना और उनके पति हरिश्चंद्र श्रीवास्तव ही इस सीट से चुनाव जीतते रहे। 2017 में यहां से भाजपा ने ज्योत्सना के बेटे सौरभ श्रीवास्तव को प्रत्याशी बनाया और उन्होंने भी जीत दर्ज की। सौरभ ही इस बार भी कैंट विधानसभा से भाजपा के प्रत्याशी है।

गोरखपुर शहर सीट पर 31 साल से भाजपा

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस बार गोरखपुर शहर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में हैं। इस सीट पर वर्ष 1989 में पहली बार बीजेपी के शिव प्रताप शुक्ला जीते थे। चार बार शिव प्रताप शुक्ला चुनाव जीते। वर्ष 2002 से डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं। इस तरह से गोरखपुर शहर विधानसभा सीट पर बीते 31 साल से भाजपा का कब्जा है।

दुर्गा, आलमबदी और रामगोविंद का दबदबा
पूर्वांचल में समाजवादी पार्टी के अभेद्य गढ़ कहलाने वाले आजमगढ़ जिले से दुर्गा प्रसाद यादव लगातार 8 बार से विधायक हैं। दुर्गा प्रसाद यादव 1985 से विधायक चुने जा रहे हैं। दुर्गा प्रसाद एक बार फिर सपा प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में हैं। आजमगढ़ जिले की निजामाबाद विधानसभा सीट से आलमबदी 1996 से 2017 तक 4 बार विधायक चुने गए। इस बार भी सपा ने उन्हें अपना प्रत्याशी घोषित किया है।

इसी तरह बलिया जिले की बांसडीह विधानसभा से विधायक रामगोविंद चौधरी भी 1977 से 2017 तक 8 बार चुनाव जीते। रामगोविंद चौधरी एक बार फिर सपा से चुनाव लड़ रहे हैं।

जौनपुर जिले से 4 बार से विधायक हैं ललई
जौनपुर जिले से शैलेंद्र यादव ललई भी बीते चार विधानसभा चुनाव से अपना सियासी रसूख बरकरार रखे हुए हैं। 2002 और 2007 का चुनाव उन्होंने खुटहन विधानसभा से जीता। इसके बाद 2012 और 2017 का चुनाव उन्होंने शाहगंज विधानसभा से जीता। शैलेंद्र यादव ललई इस बार भी सपा के टिकट से चुनाव मैदान में हैं। जौनपुर के दिग्गज सपाई रहे पारसनाथ यादव अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक विरासत को उनके बेटे लकी यादव ने मल्हनी विधानसभा से संभाल रखा है।

मुख्तार 5 बार और विजय 4 बार से MLA
पूर्वांचल में जमीनी नेताओं के अलावा बाहुबली भी अपने क्षेत्र में लंबे समय से राजनीतिक रसूख बनाए हुए हैं। बांदा जेल में बंद बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी वर्ष 1996 से 2017 तक मऊ सदर विधानसभा से 5 बार विधायक चुने गए। इस बार वह सपा-सुभासपा गठबंधन से मऊ सदर विधानसभा से चुनाव लड़ेंगे। वहीं, आगरा जेल में बंद बाहुबली विजय मिश्रा वर्ष 2002 से 2017 लगातार 4 बार भदोही जिले की ज्ञानपुर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। विजय मिश्रा इस बार भी विधानसभा चुनाव लड़ेंगे।

वहीं, वाराणसी की सेंट्रल जेल में बंद बाहुबली एमएलसी बृजेश सिंह के भतीजे सुशील सिंह चंदौली जिले से लगातार तीन बार विधायक चुने गए। इस बार सुशील चंदौली जिले की सैयदराजा विधानसभा से भाजपा के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में हैं।

दुद्धी से 7 बार विधायक रहे विजय फिर मैदान में
सोनभद्र जिले की दुद्धी विधानसभा से विजय सिंह गौड़ 1980 से 2002 तक 7 बार अलग-अलग दलों से विधायक चुने गए। 2007 और 2012 का चुनाव वह नहीं लड़े थे। वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार नसीब हुई थी। इस बार के विधानसभा चुनाव में विजय सिंह गौड़ समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी हैं।

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