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मछली जल की रानी है लेकिन गंदा पानी है:20 साल में 80 फीसदी घटी मछलियां, गंगा में बढ़ती नाइट्रोजन ले रही जान, वाराणसी जोन में छोड़ी जाएंगी 3 लाख मछलियां

वाराणसी2 महीने पहले
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वाराणसी स्थित गंगा में अस्सी घाट के पीछे स्थित नगवा नाला से गंगा में गिर रहा दूषित जल। - Dainik Bhaskar
वाराणसी स्थित गंगा में अस्सी घाट के पीछे स्थित नगवा नाला से गंगा में गिर रहा दूषित जल।

मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है। शायद ही कोई ऐसा हो, जिसने बचपन में यह कविता न पढ़ी हो। लेकिन मछलियों को जीवन देने वाला यही पानी अब उनके लिए जहर बन चुका है।

यही वजह है कि पिछले 20 साल में गांगेय मछलियों (रोहू, कतला झींगा, शंकर, हिलसा, मिरका या मृगला) की आबादी में 80 फीसदी की कमी आई है।

मत्स्य विभाग के उपनिदेशक एनएस रहमानी ने बुधवार को बताया कि गंगा में प्रदूषण का स्तर बढ़ने और मछलियां पकड़ने की वजह से यह समस्या आई है।

वाराणसी में पकड़ी गई गांगेय पढ़िना मछली।
वाराणसी में पकड़ी गई गांगेय पढ़िना मछली।

इस संकट के बाद अब गंगा में अलग-अलग प्रजाति की मछलियों की ब्रीडिंग (प्रजनन) बढ़ाने का फैसला लिया गया है। यूपी में गंगा किनारे के 12 जिलों में एक-एक स्थान तय कर लिया गया है, जहां से 15 लाख मछलियों को छोड़ा जाएगा। वहीं वाराणसी जोन में कुल 3 लाख मछलियां 2 दिन के अंदर छोड़ी जाएंगी। यहां के अस्सी घाट के पास मछलियां गंगा में बहाई जाएंगी।

गंगा में प्रदूषण का स्तर बढ़ने और मछलियां पकड़ने से आबादी घटी है।
गंगा में प्रदूषण का स्तर बढ़ने और मछलियां पकड़ने से आबादी घटी है।

गंगा से पकड़ी गई मछलियों के बच्चों की कराई ब्रीडिंग

रहमानी ने कहा कि गंगा से पकड़ी गई मछलियों के बच्चों को कंट्रोल कंडीशन में हैचरी में डालकर ब्रीड कराया गया है। इससे पैदा हुईं मछलियां 70- 80 MM तक हो गई हैं। इसमें रोहू, कतला, मृगला (नैना) व अन्य नस्लों की 15 लाख मछलियों के बच्चे शामिल हैं। इस काम को रिवर रांचिंग कहा जाता है, जो गंगा को प्रदूषण मुक्त करके मछलियों की आबादी बढ़ाएगी। उन्होंने बताया कि 4 हजार वर्ग मीटर के एरिया में करीब 15 सौ किलो मछलियां 1 मिलीग्राम प्रति लीटर नाइट्रोजन वेस्टेज को खत्म करती है।

उपनिदेशक एनएस रहमानी ने बताया- वाराणसी जोन में 3 लाख मछलियां छोड़ी जाएंगी।
उपनिदेशक एनएस रहमानी ने बताया- वाराणसी जोन में 3 लाख मछलियां छोड़ी जाएंगी।

गंगा में बढ़ती नाइट्रोजन बनी मछलियों के लिए जानलेवा

गंगा में उद्योगों और घरेलू मल-जल के रूप में काफी नाइट्रोजन आती है। हाल ही में शैवाल और सीवर वेस्टेज से नाइट्रोजन की मात्रा काफी बढ़ गई है। जब पानी में नाइट्रोजन की मात्रा 100 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा हो जाती है, तो मछलियों की मौत होने लगती है। इसके अलावा ज्यादा नाइट्रोजन मछलियों का रिप्रोडक्शन रोक देता है और वे अंडे नहीं दे पातीं। इससे गंगा का नेचुरल इको सिस्टम का बिगड़ने लगता है। सरकार की कोशिश है कि मछलियों के जरिए नदियों में नेचुरल ब्रीडिंग (प्राकृतिक जनन) का कार्य शुरू किया जाए। इससे मछलियां संरक्षित होंगी और अन्य जलीय जीव बढ़ेंगे।

वैज्ञानिक बोले- केवल नाइट्रोजन कंट्रोल से नहीं बढ़ेगी आबादी

बीएचयू के पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. कृपा राम ने बताया कि केवल मछली डालने से ही नाइट्रोजन की मात्रा को कंट्रोल नहीं किया जा सकता। नेचुरल ब्रीडिंग बढ़ाने के लिए बाकी के भी रासायनिक प्रदूषण के स्रोतों को बंद करना होगा। खेतों और इंडस्ट्रीज से निकला पानी गंगा में आता है। उसमें बहुत ज्यादा नाइट्रेाजन, सल्फर और कॉपर होता है। इसे रोक कर ही हम मछलियों की आबादी बढ़ाने पर काम कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि नाइट्रोजन पानी में जाकर नाइट्रेट बनती है। वहां से यह छोटे-मोटे जीव और उन पर आधारित मछलियों के आहार या श्वांस के जरिए शरीर में जाती है। इससे उनका श्वसन, पाचन और प्रजनन तीनों की क्षमता कम होने लगती है। वहीं धीरे-धीरे मछलियां मरने लगती हैं। मछलियों के प्रमुख भोजन प्लवक, जीवाणु, घास, शैवाल आदि नष्ट हो जाते हैं।

इन जिलों में छोड़ी जाएंगी मछलियां

वाराणसी, गाजीपुर, मिर्जापुर, प्रयागराज, कौशांबी, प्रतापगढ़, कानपुर, हरदोई, बहराइच, बुलंदशहर, अमरोहा, बिजनौर में मछलियां छोड़ी जाएंगी। रिवर रांचिंग में अलग-अलग प्रजाति की मछलियां छोड़ी जाती हैं। यह मछलियां पानी में नाइट्रोजन को कम करती हैं।

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