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आज से पितृपक्ष...काशी से ग्राउंड रिपोर्ट:पितरों की तृप्ति के लिए पिशाचमोचन से लेकर गंगा घाट पर उमड़े लोग, यहां होता है त्रिपिंडी श्राद्ध कर्म

वाराणसी8 महीने पहलेलेखक: पुष्पेंद्र कुमार त्रिपाठी

आज सोमवार 20 सितंबर से 6 अक्टूबर तक पितृ पक्ष रहेगा। इन दिनों में पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध कर्म किए जाएंगे। गया तीर्थ में मान्यता रखने वाले प्रयागराज में तर्पण के बाद काशी भी पहुंचते हैं। यहां पिशाचमोचन कुंड है, जहां अशांत आत्माओं के उद्धार के लिए अनुष्ठान और प्रार्थनाएं की जाती हैं। ऐसे में सुबह से गंगा घाटों पर आज यानी भाद्रपद की पूर्णिमा से लोगों की आवाजाही शुरू हो गई है।

तीर्थ पुरोहित सौरभ दीक्षित ने बताया कि पिशाचमोचन पर त्रिपिंडी श्राद्ध कर कुंड में स्नान करने वाले को पितृ दोष से और पितरों को प्रेत योनि और अकाल मृत्यु से मुक्ति मिलती है। बगैर पिशाचमोचन आए गया जाने से भी पितृ दोष से मुक्ति नहीं मिल पाती है।

पिशाचमोचन में त्रिपिंडी श्राद्ध के बाद इस कुंड में श्रद्धालु स्नान करते हैं।
पिशाचमोचन में त्रिपिंडी श्राद्ध के बाद इस कुंड में श्रद्धालु स्नान करते हैं।

पिशाचमोचन और यहां स्थित कुंड का इतिहास गंगा के धरती पर अवतरित होने से पहले का है। इसके बारे में गरुड़ पुराण में भी बताया गया है। देवी-देवताओं के स्नान करने के कारण पौराणिक काल में पिशाचमोचन कुंड विमल तीर्थ कहलाता था।

अस्सी घाट के समीप गंगा में स्नान करते बुजुर्ग।
अस्सी घाट के समीप गंगा में स्नान करते बुजुर्ग।

गंगा घाटों पर स्नान कर पितरों को दी जलांजलि
आज सुबह से ही दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट, तुलसी घाट सहित अन्य प्रमुख गंगा घाटों पर लोग स्नान कर रहे हैं। स्नान करने के बाद लोगों ने अपने पितरों को जलांजलि दी। इसके साथ ही घाट पर मौजूद तीर्थ पुरोहितों से टीका लगवाकर उन्हें दक्षिणा दी। अस्सी घाट पर साकेत नगर कॉलोनी से आए संजय कुमार खत्री ने बताया कि उनके पिता भागीरथी खत्री का जबसे निधन हुआ है, तब से वह प्रत्येक वर्ष पितृ पक्ष में रोजाना गंगा स्नान करने आते हैं।

स्नान के बाद वह अपने पिताजी को याद कर उन्हें जल अर्पित करते हैं। वहीं, आज सोमवार का दिन होने के कारण काशी के शिवालयों में आम दिनों की अपेक्षा दर्शन-पूजन करने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ कुछ ज्यादा ही दिखी।

पिशाचमोचन पर पीपल के इसी पेड़ पर अतृप्त आत्माओं को बैठाया जाता है।
पिशाचमोचन पर पीपल के इसी पेड़ पर अतृप्त आत्माओं को बैठाया जाता है।

पीपल के पेड़ पर बैठाई जाती हैं अतृप्त आत्माएं

पिशाचमोचन पर पीपल का एक पेड़ है। इस पेड़ पर अतृप्त आत्माओं को बैठाया जाता है। इसके लिए पेड़ पर सिक्का रखवाया जाता है, ताकि पितरों का उधार चुकता हो जाए और वह सभी बाधाओं से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकें।

तीर्थ पुरोहित सौरभ दीक्षित ने बताया कि इस बार पितरों की पूजा के लिए 16 दिन से ज्यादा का समय है। श्राद्ध पक्ष में कोई नया कार्य नहीं शुरू करना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए सात्विकता और संयम से रह कर पितरों की शांति के लिए सभी को पूजापाठ करनी चाहिए। स्नान के बाद एक लोटा जल पितरों की स्मृति में अर्पण करना चाहिए।

गंगा घाट पर स्नान के बाद जल अर्पित करते लोग।
गंगा घाट पर स्नान के बाद जल अर्पित करते लोग।

पुलिस लोगों को गहरे पानी में न जाने के लिए आगाह कर रही

दशाश्वमेध घाट पर स्थित जल पुलिस चौकी के पुलिसकर्मियों ने बताया कि उनकी ओर से लगातार आगाह किया जा रहा है कि कोई गहरे पानी में न जाए। अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें और अनावश्यक भीड़भाड़ न लगाएं। वहीं, पिशाचमोचन कुंड के प्रवेश द्वार के समीप ही गंदगी पड़ी दिखी और तीर्थ पुरोहितों का कहना था कि नगर निगम के सफाई कर्मी आएंगे तो वह झाड़ू लगा कर साफ कर देंगे।

पिशाचमोचन कुंड के मुख्य द्वार पर ही बिखरी गंदगी।
पिशाचमोचन कुंड के मुख्य द्वार पर ही बिखरी गंदगी।

प्रशासन की ओर से नहीं है कोई व्यवस्था

बीते साल कोरोना महामारी की पहली लहर के दौरान पिशाचमोचन कुंड से लेकर गंगा घाटों तक सन्नाटा छाया हुआ था। हालांकि, इस बार वैसी बंदिशें नहीं हैं और तीर्थ पुरोहितों ने तय किया है कि कोविड-19 की गाइडलाइन का पालन करते हुए श्राद्ध कर्म संपादित किया जाएगा। घाटों की सफाई स्थानीय मल्लाहों और पूजा समितियों की ओर से की गई है। प्रत्येक वर्ष की भांति इस बार भी प्रशासन की ओर से कोई खास व्यवस्था नहीं की गई है।

सौरभ दीक्षित, तीर्थ पुरोहित।
सौरभ दीक्षित, तीर्थ पुरोहित।

पितृ पक्ष में क्या करें और क्या न करें

  • रोजाना स्नान करने के बाद पितरों को जलांजलि देनी चाहिए।
  • नियम और संयम से रहते हुए पितरों का स्मरण कर उनकी आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए।
  • श्राद्ध पक्ष में अपने घर के अतिरिक्त कहीं और भोजन नहीं करना चाहिए।
  • पितृ पक्ष में भोजन में मसूर, अरहर, कद्दू, गाजर, बैगन, शलजम, सिंघाड़ा, अलसी, जामुन, चना आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • पितरों की तृप्ति के लिए ब्राह्मणों और जरूरतमदों को भोजन कराना चाहिए।
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