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अनुभव-लघुकथा:मकर संक्रांति पर आने वाले तोहफ़ों की एक मीठी-सी याद और सुम्मी ने पहली बार अपने लिए कुछ सोचा था, जानिए उस बारे में...

निशा गुप्ता, अलका जैन13 दिन पहले
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याद हैं वो लाल चूड़ियां

हालांकि मेरे शहर के बाज़ारों से भी मीठी-मीठी, भीनी-भीनी ख़ुशबू आने लगी है। मगर मेरी यादों में गांव की जो सुनहरी ख़ुशबू आती है, उसका अहसास ऐसा है, जैसे कल की बात हो! लगता है जैसे नानी इस बार भी वही लाई और मेरी स्पेशल वाली चीज़ भेजेंगी! शायद वह तैयारियों में लगी होंगी! ज्वार जिसे हम जनेरा कहते हैं वह भून रही होंगी। ये महीना चढ़ते ही हम बच्चे नानी के घर से आने वाले सनेस का इंतज़ार करने लगते। यह इंतज़ार कभी-कभी सावन-सा होता तो कभी-कभी परीक्षा के परिणाम-सा। सबको टॉप करना होता था। हम सब यही चाहते कि मेरे नानी के घर का सनेस सबसे अच्छा हो। उसमें बहुत कुछ हो सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे लिए। उन दिनों सनेस की अपनी महत्ता थी। अन्य तीज-त्योहारों में तो मम्मी के लिए अधिकतर चीज़ें आतीं। लेकिन मकर सक्रांति मेरे लिए ख़ास हुआ करता था। हर साल नानी कुछ न कुछ ख़ास ज़रूर भेजती थीं मेरे लिए भी तिल-चूड़ा के अलावा। नानी बहुत कुछ बनाना जानती थीं। सबकी पसंद की ख़ूब समझ थी उन्हें। बचपन में मुझे सजने का शौक़ था, नानी जानती थीं, ऐसा मम्मी बताती हैं।

इस बार सनेस आया था- चूड़ा- दही, काले व उजले तिल के लाई, चूड़ा का लाई, रामदाने की लाई और अंत में वही जनेरे की लाई, मेरी सबसे पसंदीदा। मम्मी अलग से छुपाकर महीनों तक रखती थीं। जब भी मैं ज़िद करती, एक दे देतीं और ख़त्म होने पर कहतीं, ‘अगले साल’ और मैं अगले साल के इंतज़ार में लग जाती। दूसरे थैले में थी, आसमानी रंग की एक फ्रॉक और छोटी-छोटी, लाल-लाल चूड़ियां, जिन्हें मैंने पूरे दिन पहन कर रखा था। उछल उछलकर कहतीं, ‘मेरी नानी ने भेजी है।’ मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। पूरे आंगन में नाची थी उस दिन। लड़कियों के बीच धाक भी जमाई थी। और अंत में मम्मी से डांट भी खाई थी क्योंकि ना तो मैं फ्रॉक निकालना चाहती थी और ना ही वह चूड़ियां। स्कूल से लौटते ही चूड़ियां फिर से पहन लेती। कहीं भी जाना होता, वही फ्रॉक पहन लेती। मैंने नानी से कह दिया था अगली बार भी चूड़ियां ही भेजना पर लाल नहीं गुलाबी रंग की। नानी ना कभी वो गुलाबी रंग की चूड़ियां भेज ही पाईं और ना ही जनेरे की लाई। मगर आज भी उसकी ख़ुशबू आती वैसे ही है जैसे पहले आती थी। वे लाल चूड़ियां अब भी मेरी यादों के संदूक में खनखनाती हैं।

नई सुबह

सुमित के सिरहाने चाय रखकर सुम्मी अपने काम में लग गई थी। तेज़ ठंड से उसके हाथों और पांवों की अंगुलियां सूज गईं थीं पर घर के काम तो निपटाने ही थे। दोनों बेटे अभी उठे ही नहीं थे। सर्दियों की छुट्टियां चल रही थीं उनकी... और सुमित का वर्क फ्रॉम होम... सारी दुनिया नए साल के जश्न की तैयारियों में जुटी थी पर सुम्मी के लिए साल दर साल, हर दिन मशक्कत भरा ही रहा था। नाश्ते की तैयारी करती सुम्मी यही सोच रही थी कि काश उसे भी छुट्टी मिल पाती! तभी सुमित के तीखे स्वर कानों में पड़े, ‘सुम्मी! ये चाय है या कोल्डड्रिंक? तुम भी बस फॉर्मेलिटी करती हो।’ सुम्मी दौड़कर सुमित के पास पहुंची थी। सुमित अब भी ग़ुस्से में बड़बड़ाए जा रहे थे। सुमित के शब्द उसके कानों में हथोड़े-सी चोट कर रहे थे। वह चाहती तो कह सकती थी कि उसने चाय गर्म ही रखी थी टेबल पर और सुमित ने कप देर से हाथ में लिया लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। उसने चुपचाप कप उठाया और रसोई की तरफ़ बढ़ गई। सुमित को दोबारा चाय बनाकर देकर आई ही थी कि बड़े बेटे किंशु का आदेश सुनाई दिया,‘मम्मी! जल्दी कॉफ़ी लाओ। मेरा बैडमिंटन का मैच है दोस्तों के साथ।’ सूजी हुई अंगुलियों से आटा लगाने से होने वाले दर्द से वह पहले ही बेचैन थी और पति और बच्चों के एक के बाद एक आदेशों से उसका धैर्य अब जवाब दे गया था। छोटा बेटा मिंशु जिसकी उम्र 13 साल थी, आंखें मलता हुआ रसोई में आ गया था। वह चॉकलेट पाउडर वाला दूध बनाने को कहता, उससे पहले ही सुम्मी उसे अनदेखा करते हुए तेज़ी से रसोई से बाहर आ गई थी। तेल की शीशी लेकर धूप सेंकने के लिए बरामदे की ओर बढ़ती सुम्मी यही सोच रही थी कि सबने उसे घर के काम करने वाली मशीन ही समझ लिया है। वह अपने हाथों की सूजी हुई अंगुलियों की मालिश करने लगी। तभी मां का फोन आ गया। सुम्मी ने फोन उठाया तो उधर से मां का स्नेहिल स्वर सुनाई दिया - ‘तेरा भाई आ रहा है तुझे लेने। अब तेरी एक न सुनूंगी।’ सुम्मी कुछ कहती इससे पहले ही मां ने फोन रख दिया था। न जाने क्या सोचकर सुम्मी ने चार दिन के कपड़े रख लिए थे बैग में। पर वह यही सोच रही थी, ठंड के मारे पानी में हाथ डालने से डरने वाले पति और दोनों बेटे उसके बिना कैसे मैनेज करेंगे। तभी उसके हाथों में सूटकेस देख दोनों बच्चे चौंक गए। पति सुमित ठिठके से खड़े थे और बेटों के स्वर बदल गए थे -‘आप हमारी लाइफलाइन हो मम्मी। आपके बिना रह पाना मुश्किल है।’ सुम्मी मुस्कराते हुए बोली- ‘बस, चार दिन की ही तो बात है। मैनेज कर लेना।’ बच्चों के मामा आ गए थे। सुम्मी ने आज पहली बार अपने लिए कुछ सोचा था। यह सुबह सचमुच उसके लिए नई सुबह थी।

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