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  • Budhai's Condition Was Definitely Bad, But He Did Not Let Them Affect His Education, How Was This Possible, Read The Story

कहानी:बुधई के हालात तो ज़रूर ख़राब थे लेकिन उसने उनका असर अपनी शिक्षा पर नहीं पड़ने दिया था, ऐसा कैसे संभव हुआ पढ़िए कहानी में...

विकास शकरगाए9 दिन पहले
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  • ग़रीबी में जीते बच्चे कम मेधावी नहीं होते, लेकिन उनके पास अवसरों और माहौल की कमी ज़रूर होती है। इसी का असर उनकी इच्छाशक्ति पर पड़ता है, जो उनकी मजबूरी की शक्ल में सामने आ जाता है

एक अनोखी सी ख़ुशी हो रही थी, वापस अपने मनचाहे शहर में ट्रांसफर जो हुआ था। काफ़ी समय तक यहां रहा हूं, यहां की हर चीज़ से एक लगाव-सा है मुझे। ऑफिस से दो दिन का समय मिला था जॉइन करने में। इसलिए किराए का मकान देखने वहीं पहुंच गए थे, पुरानी मैजेस्टिक पाम्स कॉलोनी में। दो मकान देखे थे, उनमें से एक फाइनल करना था। हम दोनों, मैं और पत्नी प्रज्ञा, आए थे। कॉलोनी के अंदर सब कुछ वैसा ही था, मगर बाहर काफ़ी परिवर्तन दिख रहे थे। क़रीब ही एक बड़ा-सा सुपर मार्केट खुल गया था। प्रज्ञा मुस्कराकर बोली, ‘मैं कुछ ख़रीदी करके और नई शॉप घूमकर आती हूं, तब तक आप भी उधर बुधई गेट तक घूम आओ।’ मैं हंस दिया था। प्रज्ञा जानती थी मैं उधर ज़रूर जाऊंगा। पहले कॉलोनी के दूसरे गेट से अक्सर घूमने जाया करता था। बाहर निकलते ही पटेल भवन की विशाल इमारत के बाजू में पेड़ों के झुरमुट में तीन-चार घर थे, मज़दूरों के। वहीं कोने के मकान के सामने मैं उस ग्यारह-बारह वर्ष की बच्ची को अपने छोटे भाई को गोद में लिए या लकड़ी की टूटी-सी गाड़ी पर घुमाते, उसे खिलाते या कभी स्कूल की कोई पुस्तक पढ़ते देखा करता था। उसके पिता किसी निर्माणाधीन कॉलोनी में काम करते थे और मां कुछ घरों में काम करती थी। हमारे यहां भी वो आया करती थी। कभी-कभी बुधई भी उसके साथ अपनी पुस्तक लिए आ जाती थी। मैंने उससे एक-दो बार उसकी पाठ्य पुस्तक से या सामान्य गुणाभाग पूछा तो मैं अचंभे में पड़ गया था। बुधई बहुत ही सही जवाब दे रही थी। मैं उसकी मां से कहा करता कि इसे आगे ज़रूर पढ़ाना, होशियार है। उस समय बुधई छठी कक्षा में पढ़ रही थी। मैं उसे हमेशा पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया करता था। वह क्लास भी उसने बढ़िया नंबरों से पास कर ली थी। इसी बीच मेरा प्रमोशन और ट्रांसफर बाहर गांव हो गया था। मुझे जाना ही था इस शहर से। मैंने एक दिन बुधई की मां से फिर कहा कि इसे ज़रूर आगे पढ़ाना मगर उसने फीकी-सी हंसी हंसकर कहा, ‘जितना मेरे हाथ में है, इसके लिए ज़रूर करूंगी।’ अगले कुछ दिनों में हम वो शहर छोड़ गए थे और इतने सालों बाद फिर मैं उसके घर की ओर देखता खड़ा था। मैं आगे नहीं गया, काफ़ी चलना हो गया था। मैंने देखा कि बुधई के घर के आंगन में एक बच्चा खेल रहा था और दूसरा बुधई की गोद में था। मैं समझ गया कि उसकी शादी और कम उम्र में बच्चे भी हो गए। उसकी पढ़ाई-वढ़ाई पता नहीं कहां रह गई होगी। मैं दुखी हो गया था और सोचता हुआ वापस लौट पड़ा। काफ़ी दिन बीत गए। एक दिन प्रज्ञा बोली, ‘आप बुधई की बातें नहीं करते आजकल।’ मैंने कहा,‘अब क्या समाचार उसके? शादी बच्चे सब हो गए। बस अब उसका आदमी दारू पिया करेगा और बुधई घरों में बर्तन मांजा करेगी, वही पुरानी कहानी।’ मगर प्रज्ञा इतनी जल्दी बात मानने वाली नहीं थी। उसी दिन शाम को हम उस दूसरे गेट से निकलकर बुधई के घर जा पहुंचे। हमें देखकर वो ख़ुशी से झूम उठी और बोली, ‘आइए, मां तो अभी गांव गई है। बहुत सालों बाद मिले आपसे। मेरी तो शादी भी हो चुकी है।’ वहां दो-तीन बच्चे खेल रहे थे। मुझे उन बच्चों की ओर देखता जान बुधई हंसकर बोली, ‘ये बच्चे तो आसपास मैडमों के हैं, वे जॉब करती हैं। मुझे अच्छे पैसे मिल जाते हैं, बस थोड़ी ज़्यादा साफ़-सफ़ाई रखनी होती है। हमारे घर को मिनी झूलाघर ही समझो।’ तभी अंदर से एक युवक बाहर निकला, हमें नमस्कार किया। बुधई बोली, ‘ये भी आईटीआई हैं और एक प्लांट में ट्रेनिंग ले रहे हैं’ और उससे बोली, ‘ये वो ही साहब और आंटी हैं जिनकी प्रेरणा से मैं अभी तक पढ़ रही हूं’ फिर हमारी तरफ़ देखकर बोली, ‘अंकल मेरा सेकंड ईयर चल रहा है, ओपन यूनिवर्सिटी से कॉमर्स में डिग्री लेने का विचार है। अच्छा है ना?’ वो युवक जिसका नाम रंजीत था हमसे हंसकर बोला- ‘साब, बुधई ने शादी के समय ही शर्त रख दी थी, मैं आगे पढ़ूंगी, अभी ही सोच लो।’ हम दोनों के हृदय ख़ुशी से भर गए। मैंने कहा, ‘घर आते रहना और कोई भी ज़रूरत हो तो हमें बतलाना।’ बुधई और रंजीत ने हमें प्रणाम किया। हम ख़ुश थे कि बुधई आगे पढ़ भी रही है और गृहस्थी सम्भालते हुए दो पैसे भी कमा रही है। शाम ढलने को थी, दूर क्षितिज पर सूरज अस्त होते दिख रहा था। शीतल हवा चल पड़ी थी जो हमारे दिलों को एक अनोखे संतोष, तृप्ति से भर गई।

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