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युवमन:बचपन बेहद नाज़ुक होता है, इसलिए बच्चों को समझना और किसी प्रकार का संशय होने पर भरोसा करना व साथ देना ज़रूरी है, ऐसे ही एक पिता की समस्या व उसका समाधान इस लेख में हैं...

मार्गदर्शक विशेषज्ञ डॉ राजेंद्र राजपूत, प्राचार्य, राजकीय श्री दुर्गा14 दिन पहले
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प्रश्न मेरे बेटे की उम्र 17 वर्ष है। एेसा लगता है कि उसे पुरुषों के प्रति आकर्षण महसूस होता है। उसकी उम्र कम होने के कारण हम सभी भ्रम में हैं। इन बातों को स्वीकारना मुश्किल लग रहा है।
आने वाले जीवन के लिए उसका मनोबल कमज़ोर हो रहा है। कृपया मार्गदर्शन दें। — राजीव, उमरिया

राजीव जी, आपके पत्र से स्पष्ट नहीं है कि आपके बेटे ने एकाध दोस्त के प्रति ऐसा महसूस किया है या यह सभी पुरुषों के प्रति है। दूसरी बात, यदि यह आपका संशय है और उसका किसी दोस्त के प्रति लगाव देखकर आप केवल अंदाज़ा लगा रहे हैं, तो आप चंद मुद्दों पर ग़ौर करें -

- टीनएज में बच्चों की दोस्ती को लेकर किसी तरह के निर्णय पर पहुंचना उनके स्वस्थ विकास में और अपने समवयसों से उनके रिश्तों की स्पष्टता में बाधा पहुंचा सकता है। आप बार-बार किसी को लेकर उसे टोकेंगे, तो हो सकता है कि वो आपसे बातें छुपाने लगे या आपकी ही अवहेलना करने लगे। संतुलित परवरिश के लिए यह ठीक नहीं होगा। इसलिए साफ़ बात करें, बिना किसी आरोप लगाने वाली शैली का इस्तेमाल किए।

- अगर आप भ्रमित हैं, तो भी परेशान ना हों। क्योंकि परेशानी और तनाव की स्थिति में हमारे मुंह से कुछ ऐसी नफ़रत भरी बातें निकल सकती हैं, तो कच्चे मन को ठेस पहुंचा सकती हैं। मिसाल के तौर पर, समलैंगिक समुदाय को लेकर कुछ ऐसा कहना, जो घृणा या नकारात्मकता से भरा हो। अगर आप शांत मन से विचार करेंगे, तो समझ जाएंगे कि हर वयस्क इंसान को अपने ढंग से जीने और अपने जीवन के लिए निर्णय लेने का हक़ है। आपका बेटा अगर परेशान है, तो उसको समझें, उससे बात करें। संवाद हमेशा खुले मन से करें, जिसमें स्वीकृति या एक्सेपटेंस का भाव हो। बच्चे की स्थिति को नकारना या उसकी अवहेलना दोनों ही उचित नहीं होंगे। बात करते समय ध्यान रखें कि आपके लिए भी ऐसे किसी विषय पर बात करने का यह पहला अनुभव होगा, तो थोड़ी तैयारी करें, सही और सकारात्मक शब्दों का ध्यान रखते हुए बात करें। ख़ुद के लिए किसी परामर्श की ज़रूरत महसूस हो, तो उस मदद को लेने से भी हिचकें नहीं।

- बेटे से खुलकर बात कर सकते हों, तो सबसे बेहतर होगा। अगर ख़ुद ऐसा ना कर सकें तो किसी काउंसलर की मदद ले सकते हैं। लेकिन अपने हाव-भाव संयत रखें, बच्चे की तरफ़ ज़्यादा न देखें, उसके हाव-भाव को गहरी नज़र से न देखें। ना ही उसके दोस्तों को लेकर कोई टिप्पणी करें। हर बच्चे के लिए घर एक सुरक्षित स्थान होना चाहिए और उसे भी ऐसा महसूस हो, यह ज़रूरी है।

- अब जबकि आपके मन में या उसके भी मन में कोई भ्रम उत्पन्न हुआ है, तो उस पर हर समय नज़र रखने की कोशिश ना करें। इससे उसका आत्मविश्वास बहुत प्रभावित होगा। ‘कहां जा रहे हो, कौन-कौन होगा वहां, किसके साथ जा रहे हो, कितने बजे लौटोगे, अपने दोस्तों के फोन नबंर दो, ध्यान रखना, रात नहीं होनी चाहिए’ जैसे सवाल या शर्तें रखना उसे और परेशान करेगा। हो सकता है, वो ख़ुद को घर में बंद कर ले या आपसे छुपकर उन लोगों से मिले, जिन पर आपने शक करना शुरु किया है या हो सकता है, कि उसका घर से बाहर रहने का समय बहुत बढ़ जाए। तीनों ही सूरतों में उसका व्यक्तित्व कमज़ोर होता चला जाएगा।

- बेटे के मोबाइल को छुपकर चेक करने या उसके सोशल मीडिया अकाउंट पर नज़र रखने की कोशिश ना करें। इसके बजाय उसका विश्वास जीतें। उसके दोस्तों से दोस्ती करें। उनको समझने की कोशिश करें। फिर यदि जब आपको लगे कि वे आपको समझने लगें है, आप सबके बीच विश्वास बन गया है, और उन लोगों और बेटे से खुलकर बात करने का वक़्त आ गया है, तो बात करके अपना और उनका संशय दूर करें। राजीव जी, जैसा आप सोच रहे हैं, अगर वैसा सच भी है, तो अपने बेटे को समझने की कोशिश करें। अगर उलझन बहुत अधिक लगे, तो प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक, यौन शिक्षा परामर्शदाता या एलजीबीटी समूह की काउंसलिंग भी ली जा सकती है। बेटे का मनोबल ना कम होने दें। उससे कहें कि बिना किसी पूर्वाग्रह के दोस्ती करे। अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे। यह समय करियर बनाने और जीवन लक्ष्य के संधान की तैयारी का है। जब अन्य फैसलों का समय आएगा, तब उन पर भी संतुलित ढंग से फैसला कर लेंगे। आप उसके साथ हैं, इसका विश्वास दिलाएं।

इस मुद्दे का एक और पहलू भी है - वो है 14-19 साल के बच्चों का अपने ही जेंडर के दोस्तों के प्रति विश्वास और दोस्ती का सहज रिश्ता।
अगर आपने देखा हो, तो इस आयु में लड़कियों की अपनी सहेलियों से बहुत नज़दीकियां होती हैं और ऐसा ही लड़कों में भी होता है। चूंकि वे एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझते हैं, उसी आयु के होते हैं, तो उनसे साथ समय बिताया या राज़ बांटना उन्हें अच्छा लगता है। वे एक-दूसरे की प्रशंसा भी करते हैं और एक-दूसरे की नकल भी। कभी कोई बहुत सुंदर या स्मार्ट हो, तो दूसरों के उसके प्रति रुझान को आकर्षण भी कहा जा सकता है। एक उम्र के बाद यह लगाव अपने आप ख़त्म हो जाता है, और वे अपनी नौकरियों या उच्च शिक्षा आदि में व्यस्त हो जाते हैं।

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