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  • Even After Not Knowing New Cities And New Languages, People Got A New Attitude, How The Books Found In The Trash Changed Their Lives, Read These Two Experiences

अनुभव:नए शहर, नई भाषा ना जानने पर भी लोगों का अपनापन नया नज़रिया दे गया वहीं रद्दी में मिली किताबों ने किस कदर जीवन बदल दिया, पढ़िए ये दो अनुभव

निष्ठा नारंग, देवेंद्र कुमारएक महीने पहले
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अपनेपन ने जीत लिया

मैं अलवर, राजस्थान की रहने वाली हूं। जयपुर में पढ़ाई ख़त्म होने के बाद, दो साल पहले मुझे चेन्नई की एक कंपनी में नौकरी मिली। मेरे परिवार के लोग थोड़े परेशान हो गए क्योंकि उनमें से किसी ने भी कभी दक्षिण भारत का रुख़ नहीं किया था। मुझे भी वहां के रहन-सहन के बारे में जानकारी नहीं थी और थोड़ा डर लग रहा था। लेकिन मैंने तय कर लिया कि जाना ही है, आख़िर करियर का सवाल था। अपनी सारी आशंकाओं को समेट कर, मैं चेन्नई के लिए रवाना हो गई। जैसे ही रेलगाड़ी चेन्नई स्टेशन पहुंची, मैं अपने पांच बैग लेकर बाहर निकली। मेरी निगाहें चारों तरफ़ घूम रही थीं। वहां सब तमिल बोल रहे थे। जहां तक मेरे कान सुन पा रहे थे वहां हिंदी बोलने वाला कोई नहीं दिख रहा था। अब सवाल ये था कि मैं अपने बैग लेकर कैसे बाहर जाऊं, जहां पर कंपनी की तरफ़ से भेजी गई गाड़ी मेरा इंतज़ार कर रही थी। मैं इधर-उधर देख रही थी, तभी दो नौजवान मेरे पास आए और कुछ तमिल में बोले। मेरे चेहरे के भाव देख कर वे समझ गए कि मुझे तमिल नहीं आती है और वे हंसते हुए बोले, ‘हम मदद कर दें आपकी?’ मैंने भी हंसते हुए ‘जी हां’ कहा और हम बाहर की ओर चल पड़े। उन्होंने बताया कि वे बिहार से हैं और वहां पढ़ाई कर रहे हैं। होटल पहुंचने के बाद पूरा दिन आराम किया और अगले दिन सुबह कंपनी पहुंची तो देखा की वहां तो सब तमिल बोल रहे थे और बहुत कम लोग थे जो अंग्रेज़ी में बात कर रहे थे। कुछ लोग मेरे पास आकर पूछने लगे कि मुझे तमिल आती है क्या? जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं तमिल नहीं बोलती हूं, कुछ लोग बिलकुल चुप हो गए। वो शायद मुझे असहज होने से बचाना चाहते थे। कुछ दिन ऐसे ही गुज़र गए। मुझे लगा कि भाषा ना जानने की वजह से मैं लोगों से दोस्ती नहीं कर पाऊंगी। लेकिन चेन्नई ने मुझे ग़लत साबित कर दिया। वहां पहुंचने के कुछ दिनों के बाद लक्ष्मी नाम की लड़की ने मुझे अपने जन्मदिन के अवसर पर अपने घर बुलाया। जब मैं वहां पहुंची तब मेरी मुलाक़ात कुछ लोगों से हुई जो हिंदी जानते थे। बहुत दिनों के बाद अपनी मातृभाषा में संवाद करके मुझे बहुत ख़ुशी हुई। जो लोग हिंदी बोल रहे थे वे मुझसे मेरी शहर और उत्तर भारतीय त्योहारों के बारे में पूछने लगे। पहले तो मैं सोचती थी कि उत्तर और दक्षिण भारत में तो बहुत फ़र्क़ है, पर चेन्नई में रहते हुए मुझे महसूस हुआ कि आख़िर उत्तर भारत के रहन-सहन और दक्षिण भारत के रहन-सहन में उतना अंतर नहीं है। तब से मेरा नज़रिया बिल्कुल बदल गया। आजकल मैं अच्छी तरह तमिल बोल लेती हूं और नए लोगों से बात करने का प्रयास करती हूं।

बदल दी ज़िंदगी

बाहर किसी ने आवाज़ दी। देखा तो रद्दी वाला था। मेरे पास रद्दी का कोई सामान नहीं था। फिर भी मैं उसके पास गया और उसके ठेले को टटोलने लगा। नीचे की तरफ़ देखा तो एक जाली में किताबों का बड़ा सा बंडल पड़ा था। पूछा तो उसने कहा, ‘यह कुछ उपयोगी किताबें हैं जो मुझे रद्दी में मिलीं। ये मेरे उन भाई-बहनों के लिए हैं जो किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं लेकिन अपनी कमज़ोर आर्थिक स्थिति के कारण मंहगी किताबें ख़रीद नहीं सकते। मैं इनका नाम मात्र दाम लेता हूं। मेरी यही इच्छा है कि मेरे ग़रीब भाई-बहन पढ़-लिख कर आगे बढ़ जाएं।’ मुझे और क्या चाहिए था। मैं भी किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा था। पिछले कुछ दिनों से किताबों की कमी महसूस कर रहा था। पर आर्थिक तंगी के कारण ख़रीद नहीं पा रहा था। मेरी ज़रूरत की सारी किताबें यहां मौजूद थीं। मैंने झट से उन किताबों का शुल्क अदा किया और उसे धन्यवाद देता हुआ अपने कमरे में चला गया। आज मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। लगता था जैसे आसमान में उड़ रहा हूं। अब तो मेरी और रद्दी वाले की अच्छी दोस्ती भी हो गई। वह मेरे लिए अच्छी किताबें ढूंढ लाता और मैं मन लगाकर पढ़ता। दिन बीतते गए। परीक्षा नज़दीक आ गई। कुछ दिनों बाद परिणाम भी सामने था। परीक्षा में मेरा चयन भी हो गया। मैं उस रद्दी वाले का शुक्रिया अदा करने के लिए उसे ढूंढ रहा था। पर वह कहीं नहीं मिला। बाद में पता चला कि उसका भी चयन हो गया है। उसे भी नौकरी मिल गई। उसकी नेकी का बदला उसे मिला। उस रद्दी वाले ने अपनी भलाई के साथ दूसरों का ध्यान रखा।

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