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फादर्स-डे:मज़बूत हैं पिता, उन्हें सख़्त किसने कहा?

डॉ. मोनिका शर्मा2 महीने पहले
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  • वो कोमलता नहीं जानते, लेकिन बच्चे को पूरी एतमाद भरी गोद देते हैं। मुलायम आवाज़ में बात नहीं कर सकते, लेकिन उनके लहज़े में हमेशा आश्वस्ति होती है।
  • घर से बाहर जाते वक़्त कोई बच्चा उनकी तरफ़ पलटकर नहीं देखता, लेकिन उनकी निगाह से बच्चे की परवाह कभी ओझल नहीं होती।
  • वो पिता हैं... जिन्हें बच्चे तब समझते हैं, जब ख़ुद अभिभावक बन जाते हैं। जो हर बच्चे की दुनिया का आसमान हैं, उनके लिए सुरक्षा की छत हैं, वो पिता क्यों अबूझे रहते हैं?

आंखों में उमड़ी नमी को छिपाने के लिए मुंह फेरकर खड़े हो जाने वाले पिता। बच्चों की सफलता पर गर्वित होते हुए भी दबंग आवाज़ में भविष्य के लिए हिदायतें देने वाले पिता। बच्चों के जीवन को सुकून और स्थायित्व देने की जद्दोजहद में भागते-दौड़ते पिता।

पिता जाने कितनी भूमिकाओं को एक साथ साधते हैं। पर बिन कहे बच्चों की ज़रूरतों से लेकर जिज्ञासाओं तक, सब समझ लेने वाले पिता का मन क्या सोचता है? बाहर से कठोर और भीतर से कोमल बाऊजी के हृदय के भीतर क्या चलता है? क्यों उपेक्षित-सी रह जाती हैं डैड के दिल की अनुभूतियां? पिता, जो अभिभावक के रूप में प्रेम दिखाता कम, निभाता ज़्यादा है।

आपाधापी में अनदेखा रह जाता लगाव और चाव

पिता के हिस्से ठहराव कम, भागमभाग ज़्यादा आती है। वह जीवन से जूझकर संसाधन जुटाते हैं। हर पिता के जीवन का बड़ा हिस्सा इस संघर्ष में ही गुज़रता है। पर उनकी यह उलझन दिखती नहीं है। पिता अपने संघर्ष और पीड़ा के बारे में बात भी कम ही करते हैं।

मां की तरह, पिता भले गले लगाकर प्रेम नहीं जताते पर बच्चे की ज़रूरतें, फरमाइशें ज़रूर पूरी करते हैं। यह उनका तरीक़ा है प्रेम दिखाने का। रोज़गार के तनाव, आज की ज़रूरतें और भविष्य की सुरक्षा, जीवन की अपरिहार्य नियमितता, उनको ऐसे रूखेपन से घेर देती हैं कि संवेदनाएं नज़र नहीं आतीं।

जब बच्चे उनकी तरफ़ नहीं देख रहे होते हैं, तब भी पिता की नज़रें उन्हीं पर बनी रहती हैं। बच्चों के जीवन में कोई अभाव दस्तक ना दे, इसी आपाधापी में पापा का चाव और लगाव अनदेखा रह जाता है।

सोच की व्यावहारिक बुनियाद

पिता जानते हैं कि जीवन जय-पराजय के पालों में बंटा है। उनका मन अनुभवी और व्यावहारिक सोच लिए होता है। यही वजह है कि जिंदगी की तपिश का सामना कर चुके पिता आर्थिक-सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी हिदायतें देते रहते हैं। आशंकाओं के ख़्याल के चलते ही पिता के सबक़ देने का अंदाज़ कठोर हो जाता है। इसमें लाड़-प्यार कम और मनोबल की मज़बूती की सीख का ज़्यादा होना लाज़िमी है।

बचपन में सब अपनी नाकामी को मां से तो साझा कर लेते हैं, लेकिन पिता से नहीं कर पाते? क्यों? पिता की डांट का डर नहीं होता यह। पिता की नज़र में कमज़ोर साबित होने की शर्मिंदगी होती है। यह भी क्यों? क्योंकि भले समझ में ना आए, पर हर बच्चे के लिए उसका पिता उसका हीरो होता है। ज़िंदगी का व्यावहारिक पाठ बच्चों को पिता ही सिखाते हैं। लेकिन सिखाने की प्रक्रिया में उनकी भावनाएं सामने नहीं आ पातीं। और बच्चे। उन्हें रौब दिखता है, सख़्ती दिखती है, परवाह नहीं दिख पाती। दुनिया के सभी बच्चों को बड़े होने पर पापा से मिले ऐसे हर सबक़ के मायने समझ में आते हैं।

हर हाल में मज़बूत बने रहने का दायित्व

पिता के कम शब्द और गहरी आवाज़ अक्सर बच्चों को अहसास कराती है कि वे बच्चों को समझते ही नहीं। अनुशासन और सधे हुए संवाद का यह भाव चिंता के उस भाव को ढंक देता है, जो पिता के मन में हर वक़्त चलता है। परिवार के मुखिया की भूमिका निभा रहे पिता को हर हाल में मज़बूत बने रहना होता है।

कैसी विडम्बना है पिता के जीवन की कि बच्चे को बांहों के झूले का आनंद देने के लिए मन को कोमल नहीं कर सकता, बच्चे को संभालने के लिए मज़बूत हाथ जो देने हैं। और बच्चे को भी पिता की सुरक्षा के घेरे से मिली बेफ़िक्री याद रहती है, उसे बनाने वाले पिता के प्यार का अहसास समझ में नहीं आता।

जीवन का सबसे सशक्त आधार, बच्चों के लिए भरोसे का दूसरा नाम कहे जाने वाले पापा के मन की बात मज़बूत बने रहने के दायित्व तले दब जाती है।

और फ़िर एक समय आता है जब...

पिता को उतना समय भी नहीं मिलता कि बच्चों से अपना स्नेह दर्शा सकें। हर रोज़ शाम को घर लौटने पर रोज़गार की, कामकाज की थकान जब तक कुछ कम हो पाए, बच्चे सो चुके होते हैं। जो बच्चों के दैनंदिन की ख़ुशियों, छोटी-छोटी पीड़ाओं में साथ नहीं होता, उस पिता के लिए सप्ताह में एक-दो दिन ‘ऐसा क्या करूं कि बच्चे ख़ुश हो जाएं’ की जद्दोजहद में केवल बाहर घुमाने ले जाना या कोई खेल खेलना ही मुमकिन होता है। मन के तार जोड़ने के लिए यह वक़्त कम पड़ता है। स्नेह स्पर्श की उसकी कमी बच्चे बचपन में पूरी नहीं कर पाते।

एक समय आता है जब जीवन की जद्दोजहद, पिता के मन के अनकहे जज़्बात समझना भी सिखा देती है। तब पिता के स्नेह का हर लम्हा समझ में आ जाता है। और तब खु़द अभिभावक बन चुके बच्चे पिता के कंधों पर हाथ रखकर खिलखिला उठते हैं। पिता की भूमिका, बच्चों की ख़ुशी में मुकम्मल हो उठती है। वो वक़्त काश, बच्चों के छुटपन में ही आए और बना रहे। पिता अबूझे ना रहें। उनके हिस्से के स्नेह का प्रतिसाद उन्हें खुलकर और कई गुना बढ़कर मिले।

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