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फादर्स डे:बच्चों को पिता हमेशा सख्त नज़र आते हैं, लेकिन इसमें कई नसीहतें शामिल होती हैं

नलिनी रायजादा19 दिन पहले
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छुटपन में बच्चे पिता से दूरी महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि मां जितना प्यार करती हैं, पिता नहीं करते। उनके चेहरे पर हमेशा सख़्ती बनी रहती है। बात करते समय भी उनका लहज़ा सधा हुआ रहता है। मां की तरह लड़ियाते हुए बात करने की तो सोचना भी बेकार है। समय, काम, ख़र्च और खान-पान को लेकर भी पिता का रुख़ बहुत व्यावहारिक होता है। बालपन में पिता से बच्चों को कई शिक़ायतें रहती हैं। एक-एक कर आम शिक़ायतों को देखते हैं और कारण भी समझने की कोशिश करते हैं।

पिता नहीं उठाने आते

पिता बच्चे के लड़खड़ाने पर एकदम नहीं दौड़ पड़ते। कुछ क्षण देखते हैं कि बच्चे की क्या प्रतिक्रिया है - वो सहानुभूति के लिए आसपास नज़र दौड़ा रहा है या अपने कपड़ों पर लगी धूल झाड़ने में व्यस्त है। हालांकि, पिता का यह कुछ क्षण का देखना, उन पर बेदिल होने का ठप्पा लगा देता है, लेकिन उनकी यह नज़र बच्चे को समझने के लम्हे होते हैं। लड़खड़ाकर गिरा बच्चा किसी के उसे उठाने के लिए एकदम दौड़ पड़ने पर रोने लगता है और उसी क्षण अपनी चोट, अपनी संभाल की ज़िम्मेदारी आसानी से किसी और के सुपुर्द कर देता है, जबकि उसे ख़ुद समझने दिया जाए, तो भूल से सीखकर, ख़ुद को संभाल लेता है। पिता की उस ख़ामोश नज़र से मिली नसीहत कई सालों के बाद समझ में आती है।

उनको नहीं परवाह है

झूले पर पींगे लेने या फिसलपट्‌टी पर फिसलने को इच्छुक बच्चे को पिता कई मर्तबा या तो केवल उस जगह पर छोड़कर सामने किसी बेंच पर बैठ जाते हैं या थोड़ी बहुत पींगें देकर हट जाते हैं। बच्चों की शिक़ायत होती है कि उन्हें परवाह ही नहीं है कि हम गिरे-पड़ें, कुछ भी हो। न ही वे हमारे साथ खेलने में ही रुचि रखते हैं। उस समय शायद बच्चों को याद न हो कि सायकिल सिखाने या घर में बोर्ड गेम्स खेलते समय पिता साथ ही होते हैं। यहां उनका मंतव्य होता है कि बच्चे झूले को ख़ुद जानें, ख़ुद अपनी क्रीड़ाओं का मज़ा लें। दोस्तों को शामिल करें, भाई-बहन को संभालते हुए उन्हें भी झूला झुलाएं। थोड़ा बड़े होने पर दोस्तों के साथ खेलते हुए उन्हें याद नहीं आता कि इस समझदारी की नींव पिता की उस तथाकथित अवहेलना ने ही डाली थी।

हर वक़्त पैसे की बात

यह तो सबसे आम शिक़ायत है। पापा हर ख़र्च का हिसाब रखते ही नहीं, याद दिलाते भी रहते हैं। ऐसा लगता है जैसे केवल यही एक पिता हैं, जो बच्चों पर पैसे ख़र्च करते हैं। किफ़ायत से रहो, पैसों की क़द्र करो, बचत ही कमाई है, पाई-पाई कर जोड़ो तो बहुत सारा पैसा इकट्‌ठा किया जा सकता है आदि आदि - जाने कितने ऐसे जुमले होते हैं, जो सबने अपने पिता के श्रीमुख से सुने होंगे। हर बार यही लगता है कि पापा से पूछें कि इतने पैसे बचाकर करेंगे क्या? और अपने पसंदीदा कोर्स की पढ़ाई के दौरान समझ में आ जाता है कि पैसे बचाकर किया क्या। फिर वो दिन आता है जब ख़ुद के मुंह से निकले ये शब्द ख़ुद को ही चौंका जाते हैं। बच्चे के सामने जुमला निकलता है - ‘पैसे पेड़ों पर नहीं उगते।’

हर वक़्त, वक़्त की ताक़ीद

समय से उठो, हम तुम्हारी उम्र के थे तो..., अपने काम समय पर करो, ज़िंदगी के बारे में समय पर फैसला करो...वग़ैरह वग़ैरह- ऐसा लगता है जैसे पापा को समय की याद दिलाने का ही काम सौंप दिया गया है। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे समझ में आने लगता है कि जो चूकें हुई हैं उनमें सबसे बड़ी समय पर काम न करने के कारण हुई हैं। अभिभावक अपने बच्चों को अपने जीवन में हुई भूलों से बचाकर रखने की कोशिश करते हैं, ख़ासतौर पर पिता। जीवन को ख़ास मक़ाम देने की उनकी कोशिश जहां तक हुई थी, वे चाहते हैं कि बच्चे उससे आगे निकल जाएं। जो उन्हें हासिल नहीं हुआ, बच्चों को मिले। उनकी जी तोड़ कोशिश सख़्त रवैये के तौर पर सामने आती है। फिर वो समय भी आता है, जब बच्चे के मुंह से ये शब्द सुनाई देते हैं- ‘समय किसी की राह नहीं देखता, जो साथ चले, वो मंज़िल पाए।’

पिता का प्यार, उनकी परवाह देखने के लिए एक उम्र का इंतज़ार करना ही पड़ता है। उनकी व्यावहारिकता, उनकी दुनियादारी की समझ तभी दिमाग़ में उतरती है, जब दुनिया का सामना करते हैं। कभी उनके यूं ही सिर पर हाथ फेर देने से मिला स्नेह या पीठ थपथपा देने से मिली सराहना या कंधे पर हाथ रखने से मिला संबल तब समझ में आता है, जब पिता से दूर रहना पड़ता है। रात में चुपके से रज़ाई ओढ़ाते पिता, कॉपी पर लिखे नाम पर उंगलियां फेरते पापा, जूते चमकाते, बस्ते जमाते, नए पेन, कड़क कॉलर वाली शर्ट की अहमियत समझाते पिता के हिस्से में बच्चों का उत्साह-भरा प्यार नहीं आता। दूर से ही वे कहते हैं- ‘पापा, आपकी याद आती है।’

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