बच्चों में बढ़ रही है ऑनलाइन वीडियो गेम्स की लत:जितनी जल्दी हो सके बच्चों को इस खेल की अंतहीन गलियों से बाहर निकाल लें

डॉ. प्रियंका जैन2 महीने पहले
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हाल ही में एक 13 साल के बच्चे को ऑनलाइन गेम की ऐसी लत लगी कि उसने अपने ही घर पर साइबर हमला कर दिया। बच्चा दिनभर वीडियो गेम खेलता था, जिसकी लत में उसने माता-पिता के फोन में हैकिंग एप इंस्टॉल करके सारा डेटा डिलीट कर दिया। इतना ही नहीं, घर में भय का माहौल पैदा करने के लिए मोबाइल की पुरानी डिवाइस काट-काट कर कुछ दीवारों और टेबल के नीचे भी चिपकाई। जब साइबर सेल ने छान-बीन की तो पता चला कि सारी करतूत बच्चे की है।

गेम की लत में हैकिंग का यह पहला बड़ा मामला है, लेकिन इससे पहले भी वीडियो गेम्स की लत के काफ़ी बुरे परिणाम सामने आए हैं। कुछ ने माता-पिता के हज़ारों-लाखों में पैसे उड़ा दिए, कुछ ने परिवार को ही ख़त्म कर दिया, तो कुछ ने ख़ुद को।

बच्चों में ऑनलाइन गेमिंग की लत इतनी बढ़ गई है कि वो इसके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। इससे उनकी सोच और बर्ताव पर भी असर पड़ रहा है।

अनुमान है कि...

इस समय भारत की 41 फीसदी आबादी जो 20 साल से कम उम्र की है, ऑनलाइन गेम्स की आदी बन चुकी है। 2018 में ऑनलाइन गेम खेलने वाले बच्चों और किशोरों की संख्या 26.90 करोड़ थी, वहीं 2022 के अंत तक ये आंकड़ा 51 करोड़ को भी पार कर सकता है।

बच्चों में बढ़ रही तनाव, डिप्रेशन की शिक़ायत

ऑनलाइन गेम की लत में पड़ने वाले बच्चों में तनाव और डिप्रेशन की शिक़ायत बढ़ रही है क्योंकि वो गेम में इतना उलझ जाते हैं कि उससे उबर ही नहीं पाते। एक रिपोर्ट के अनुसार 87 प्रतिशत लोग ये मान रहे हैं कि ऑनलाइन गेम के माध्यम से वो डिप्रेशन के शिकार हुए हैं। वहीं मारधाड़ और शूटिंग वाले गेम ज़्यादा लोकप्रिय हैं जिसके कारण बच्चों में बहुत मानसिक तनाव बना रहता है। यहां तक कि वो खाना-पीना भी भूल जाते हैं, उनका सारा ध्यान बस वहीं लगा रहता है। कई विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि बच्चों, किशोरों और वयस्कों में गेम की लत से हिंसक प्रवृत्ति बढ़ रही है। कुछ मामलों में मोबाइल वापस ले लिए जाने से बच्चे गहरे अवसाद में चले जाते हैं।

कौन-से शहर ज़्यादा प्रभावित?

भारत के प्रमुख गेमिंग प्लेटफॉर्म में से एक मोबाइल प्रीमियर लीग ने 2021 में एक रिपोर्ट जारी की जिसमें ये बताया गया कि राजधानी दिल्ली में सबसे ज़्यादा ऑनलाइन गेम खेलने वाले बच्चे हैं। वहीं दूसरे नंबर पर जयपुर, तीसरे पर पुणे, चौथे पर लखनऊ और पांचवें नंबर पर पटना शहर है। इसमें हैरान करने वाली बात ये थी कि शीर्ष 5 शहरों में मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता, चेन्नई जैसे कई बड़े महानगर नहीं थे।

बच्चों को समय दें और बाहर घुमाने ले जाएं

कुछ अध्ययनों के मुताबिक़ यदि कोई भी व्यक्ति एक ही जगह घंटों समय बिताता है तो यह डीप वेन थ्रोम्बोसिस के ख़तरे को बढ़ा देता है। यदि बच्चा एक ही स्थान पर लगातार बैठकर पढ़ाई कर रहा है या टीवी भी देख रहा है तो उसे किसी न किसी बहाने से हर घंटे जगह से उठाएं। उसे सैर पर ले जाएं या घर के किसी काम में मदद लें। इस बहाने वह लगातार बैठे रहने से बचेगा और मोटापे जैसी स्वास्थ्य समस्या भी नहीं होगी। मोबाइल व लेपटॉप से भी ऐसे ही दूर करें।

हर छोटी से छोटी बात का रखें ख़्याल

  • बच्चों के समय और हर ज़रूरत का ख़्याल रखें। कोशिश करें कि बच्चे को मोबाइल की ज़रूरत ही न पड़े और अगर पड़ भी रही है तो ब्राउज़र और मोबाइल की हिस्ट्री में जाकर ये ज़रूर जांच लें कि बच्चा क्या-क्या सर्च कर रहा है। यदि वो गेम खेल रहा है तो उसे अचानक से डांटने के बजाय समझाने का प्रयास करें।
  • बच्चों के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करें और कोशिश करें कि उनके साथ दोस्त वाले संबंध स्थापित कर पाएं जिससे बच्चों को समझा-बुझाकर गेम की लत से दूर रखा जा सके।
  • अभिभावक भी मोबाइल का ज़्यादा इस्तेमाल न करें क्योंकि बच्चा भी वही सीखता है जो वह अपने आस-पास देखता है।
  • अगर अपना मोबाइल बच्चे को दे रहे हैं तो सारे गेम डिलीट करके प्ले स्टोर में चाइल्ड लॉक लगाएं। इससे कोई भी एप डाउनलोड नहीं कर पाएगा। इसमें आप जो भी पासवर्ड सेट कर रहे हैं, बच्चे से साझा न करें।
  • मोबाइल में सोशल मीडिया एप्स न रखें। अगर रखते हैं तो हर एप में फिंगरप्रिंट लॉक रखें। अपना एटीएम और उसका पिन कोड भी उनसे साझा न करें। पढ़ाई के लिए अलग से मोबाइल दें।
  • कुछ गेम्स देश में बैन हो चुके हैं, लेकिन उन्हें वीपीएन के माध्यम से खेल सकते हैं। इसलिए सतर्क रहें।
  • बच्चे ऑनलाइन कई तरह के लोगों से जुड़े होते हैं जिनसे उन्हें तरह-तरह की जानकारियां मिलती रहती हैं। वे किससे बात कर रहे हैं और क्या बात कर रहे हैं, इसका ध्यान भी आपको रखना है।

मूलभूत जानकारी रखें...

बच्चे तकनीक का इस्तेमाल अधिक करते हैं इसलिए उससे जुड़ी मूलभूल जानकारी अभिभावक अवश्य रखें। कौन-से गेम्स ख़तरनाक हैं, जैसे कि पबजी, फ्री फायर, ब्लू व्हेल, पासआउट चैलेंज आदि, इसकी जानकारी रखें। गेम से संबंधित होने वाली घटनाओं से भी अवगत रहें, ताकि बच्चे की गतिविधियों पर ध्यान दिया जा सके।

...लेकिन यहां ग़लती किसकी है?

  • यहां ग़लती माता-पिता की है। वे ये मान बैठते हैं कि उनका बच्चा कोई ग़लती नहीं कर सकता।
  • अगर बच्चा अभिभावकों का हज़ारों-लाखों में पैसा उन्हें बिना बताए गेम में ख़र्च कर देता है, तो माता-पिता इसका दोष उसके साथियों या दोस्तों पर मढ़ने लगते हैं।
  • बच्चा क्या खेल रहा है, मोबाइल पर क्या देख रहा है, इस पर ध्यान नहीं देते। नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
  • कई अभिभावक यह भी सोचते हैं कि लड़का है, गेम नहीं खेलेगा तो क्या खेलेगा।
  • बच्चा नाराज़ न हो जाए इसलिए उसे डांटते नहीं और रोक-टोक करने से कतराते हैं।
  • कौन-से गेम्स ख़तरनाक हैं, कई अभिभावकों को इसकी जानकारी तक नहीं है। यदि है भी तो वे बच्चे पर विश्वास करके नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

कैसे जानें लत है या मनोरंजन

  • बच्चा मोबाइल और कंप्यूटर पर ज़्यादा समय गुज़ारने लगेगा।
  • उसकी नियमित गतिविधियों में बदलाव आएगा।
  • परिवार और दोस्तों से ख़ुद को अलग कर लेगा। सिर्फ़ ऑनलाइन दोस्तों तक सीमित रहेगा।
  • पढ़ाई और काम प्रभावित होंगे।
  • नींद प्रभावित होगी। यदि सोता है तो ऑनलाइन गेम्स या एप्लीकेशन के सपने देखेगा।
  • गेम खेलने से मना करने पर ग़ुस्सा करेगा। बहस करने के बावजूद खेलना बंद नहीं करेगा।
  • बच्चा उल्टे जवाब भी देगा। हाथापाई भी कर सकता है।
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