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लघुकथाएं:दादी मां ने हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया लेकिन अब समय था अपने लिए जीने का और रिटायरमेंट के बाद रिश्ते फीके पड़ने लगते हैं, लेकिन समझने की बात यह है कि काम नहीं इंसान अहम होता है

वीरेन्द्र बहादुर सिंह, डॉ. अशोक शर्मा8 दिन पहले
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सार्थक जीवन

‘दादी मां, हर किसी के जन्म के पीछे विधाता कोई न कोई ध्येय निश्चित किए रहता है, क्या यह बात सच है?’ विधि दादी मीना की गोद में सिर रख, आकाश को देखते हुए बोली। ‘हां, होता है। पर अपने जन्म का ध्येय कोई कोई ही पूरा करने में सफल होता है।’ विधि के सिर पर हाथ फेरते हुए मीना ने कहा। ‘ऐसा क्यों दादी मां? हर किसी का ध्येय क्यों नहीं पूरा होता? मम्मी-पापा का तो पूरा हुआ है न? यूएसए में सेट हो गए हैं।’ ‘जन्म हो गया यानी पूरा नहीं हो जाता बेटा। इस जन्म के साथ दूसरे तमाम जन्म होते हैं। जैसे कि जि़म्मेदारियां, चिंताएं, सपने के साथ रोज़ाना नित नए विचार और संबंध तक जन्म लेते हैं।’ ‘इतने अधिक जन्म, एक ही जन्म में। दादी, आपने भी तो कोई सपना देखा होगा न?’ हैरानी से विधि बोली। ‘मैं अपनी बात करूं तो बेटा... जन्म हुआ। बेटी जान कर परिवार में सभी का मुंह लटक गया, बेटी की एक मर्यादाएं होती हैं। कुछ सालों बाद भाई का जन्म हुआ। उसी के साथ एक और जन्म हुआ। बड़ी बहन होने की वजह से मुझे मां की तरह उसे संभालना पड़ा, जहां सोचना-विचारना सीखा। विचार और सपनों ने जन्म लेना शुरू किया था कि एक पत्नी के रूप में जन्म हुआ। हर्ष के जन्म के साथ ही एक मां के रूप में जन्म हुआ और उसी के साथ ढेरों ज़िम्मेदारियां। उन ज़िम्मेदारियों में मैं अपना अस्तित्व ही भूल गई। जब मेरा जन्म हुआ तो बस यह घर, पति और बच्चों को संभालने के लिए हुआ। इन सभी को बसा देख कर मैं ख़ुश थी। सोचने लगी कि अब सारी ज़िम्मेदारियां पूरी हो गई हैं तो थोड़ा अपने लिए भी जी लूं। तभी तुम्हारे दादा भी मुझे अकेली छोड़ कर चले गए। मैं एकदम अकेली थी कि बेटे के घर बच्चे जन्मे तो नया जन्म दादी के रूप में हुआ। बेटा और बहू तुम्हें मेरे भरोसे छोड़ कर विदेश चले गए तो मैं फिर से तुम्हारे लिए मां बनी। मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मैं अपने जन्मे हर पात्र में सफल रही हूं। यही है ज़िंदगी का सत्य, जिसकी वजह से कोई भी जन्म को सार्थक और अमर बना सकता है। बाकी तो रोज़ असंख्य लोग जन्म लेते हैं और मरते हैं।’ अपना जन्म किस तरह बीता, दुखी भावनाओं के साथ व्यक्त करते हुए मीना ने कहा। ‘कुछ नहीं दादी मां, अब कुछ नया सोच कर नई शुरुआत कीजिए।’ ‘मतलब?’ हैरानी से विधि को ताकते हुए मीना ने पूछा। ‘मतलब यह मेरी भोली दादी मां कि मुझे ये पता है कि आप की हमेशा से ही पढ़ने की इच्छा रही है, जो पूरी नहीं हुई। मैं कॉलेज में अपना एडमिशन कराने जा रही हूं। अपने साथ आप का भी एडमिशन करा दूं तो...?’ ‘बेटा, तुम भी कैसा मज़ाक कर रही हो। इस उम्र में कौन पढ़ने जाता है। अब तो भगवान के घर जाने का समय आ गया है, कॉलेज जाने का नहीं।’ फीकी हंसी हंसते हुए वृद्ध मीना ने कहा। ‘अभी-अभी तो आपने कहा है कि जन्म विचारों से होता है तो विचार पैदा कीजिए न। एक छोटी सी ज्योति काफी है अंधकार भगाने के लिए।’ ‘फिर भी...’ ‘फिर-विर कुछ नहीं। कल आप मेरे साथ कॉलेज चल रही हैं। यह मेरा आदेश है।’ विधि ने अधिकार जताते हुए कहा। ‘ठीक है, चलो जैसी प्रभु की इच्छा।’ कह कर मीना ने सहमति प्रकट कर दी। विधि ने अपनी दादी मां मीना के एडमिशन से ले कर क्लास में बैठने तक की सारी व्यवस्था कर दी। विधि विज्ञान की छात्रा थी, जबकि मीना हिंदी साहित्य पढ़ना चाहती थीं। उन्हें वैसे भी पढ़ने का शौक़ था। इस उम्र में कॉलेज में पढ़ने का साहस करना हर महिला के लिए एक प्रेरणा बन सकता है। शुरू में क्लास में सब मीना को प्रोफेसर समझते रहे। पर वह भी पढ़ने आई हैं, यह जान कर सभी को हैरानी हुई। उनकी ग्रहणशक्ति और कुछ कर गुज़रने की लगन से वह अन्य छात्रों के लिए प्रेरणा की मूर्ति बन गईं। कॉलेज के 3 साल बीत गए। मीना ने अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ली। जीवन की एक और सार्थक भूमिका निभा ली।

बदलते रंग

‘अजी सुनिए! सिन्हा साहब आ गए हैं...! आइए न!’ वर्मा जी की पत्नी ममता ने आगंतुक का अभिवादन करते हुए कहा। ‘हां, ममता मैं आ रहा हूं।’ वर्मा जी भीतर से पुकारते हुए आए। आते ही सिन्हा साहब से बोले, ‘आपको आने में देर हो गई?’ ‘हां, वर्मा साहब। असल में ड्राइवर ही गांव से देर से आया जिसके कारण आने में देर हो गई। क्षमा करिएगा!’ सिन्हा जी ने जवाब दिया। ‘नहीं सिन्हा साहब, श्राद्धकर्म में तो देर- सवेर तो होते ही रहती है। पिताजी की आपसे बहुत बनती थी, इसी कारण बड़ी बेसब्री से मैं आपका इंतज़ार कर रहा था। मुझे यक़ीन था कि आप ज़रूर आएंगे।’ वर्मा जी ने अपनी उत्कंठा का स्पष्टीकरण दिया। ‘लोग क्यों कम है?’ ‘हां सर! चार बजे से ही भोज का कार्यक्रम था। बहुत सारे लोग आकर चले गए और आप तो जानते ही हैं कि मैं एक रिटायर्ड आदमी हूं। इस कारण विभागीय भीड़ फीकी ही रही।’ ‘हां वर्मा साहब, हम सब समझते हैं। जब मैं कालेज में प्रिंसिपल था तब मेरी बेटी पिंकी की शादी में भीड़ को संभालना मुश्किल हो गया था। रिटायरमेंट के बाद चिंकी की शादी में तो भीड़ एक चौथाई हो गई थी और फिर यह तो श्राद्धकर्म है। दुनिया बस जीते में ही अपने प्यारे से प्यारे लोगों को याद करती है। आंखें बंद हुईं कि सारी रिश्तेदारी समाप्त।’ इन सब बातों के दौरान वर्मा जी की आंखों में आंसू आने लगे थे। दुख के अतिरेक में उन्होंने बतलाया कि विभाग से केवल चार लोग आए थे। इनकी गुफ़्तगू यह बतलाने के लिए काफ़ी थी कि वाकई में रिटायरमेंट के बाद परिचय के ही नहीं रिश्तों के रंग भी फीके पड़ जाते हैं। यह बात सीखकर ज़माने को नए सिरे से समझाने की ज़रूरत है कि इंसान अहम होता है, उसका काम केवल रोज़गार है।

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