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  • He Soon Found Out The Reason For Kiran's Request To Dinanathji To Write The Story Again And Again.

कहानी:किरण का दीनानाथ जी से बार-बार कहानी आगे लिखने का आग्रह करने का कारण उन्हें जल्द ही पता चल गया

केदार शर्मा ‘निरीह’16 दिन पहले
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  • किरण का बार-बार मिलना और कहानी को आगे बढ़ाने का आग्रह करना दीनानाथ जी को समझ में नहीं आ रहा था।
  • जब उन्हें सच्चाई पता चली, तो फिर उलझ गए कि कहानी को सच से कैसे जोड़ें?

पूजा करने हेतु लोटा भरने के लिए दीनानाथ उस मोहल्ले के एकमात्र हैं‍डपम्प पर रोज़ की भांति गए। वहां पहले से ही अपना कलश भर रही किरण को देखकर वे चौंक गए -‘अरे किरण! तुम यहां कैसे?’ ‘सर, प्रणाम। मैं भी आपके इसी मोहल्ले में रहने लगी हूं। मैडम जी भी मुझे जानती हैं। मैं एक बार आपके घर भी जा चुकी हूं, पर उस दिन आप नहीं मिले थे। सर, आपकी लिखी कहानी, जो पिछले रविवार को अख़बार में छपी थी, बहुत अच्छी लगी, पर यह कहानी जाने क्यों अधूरी सी लगी। कहानी की मुख्य पात्र सूर्या शराबी पति को छोड़कर अपने पिता के घर पर रहने लगती है। वह आत्मनिर्भर बनकर पिता की सेवा भी करने लगती है। पर सर, फिर आगे सूर्या का क्या हुआ होगा? सर, इस कहानी को और आगे लिखिए ना।’ वह बिना रुके बोले जा रही थी। दीनानाथ ने कहा- ‘किरण, मुझे यह जानकर ख़ुशी हुई कि इतने ध्यान से तुमने कहानी पढ़ी है। तुम तो जानती ही हो कि कहानियों में कल्पना का समावेश होता है। यह भी एक काल्पनिक कहानी थी और सहज रूप से कहानी का जो अंत होना था वह हो गया।’ ‘नहीं सर, आप तो लेखक हैं, जहां कहानी समाप्त हुई है उसके आगे की भी कल्पना कर सकते हैं कि आख़िर सूर्या का आगे क्या हुआ होगा? सर, मेरे लिए प्लीज़...’ वह लगभग गिड़गिड़ाने-सी लगी थी। उस दिन दीनानाथ उसे बिना कोई आश्वासन दिए घर चले आ गए। पूजा के समय भी किरण की वही अनुनय भरी आवाज़ उनके भीतर गूंजती रही। ‘हर पाठक को संतुष्ट नहीं किया जा सकता’, यह सोचकर उन्होंने अपने आप को सहज कर लिया। पर जब भी किरण मिलती वही प्रश्न दोहराती- ‘सर, कहानी पूरी हुई या नहीं?’ हर बार प्रयास करने की बात कहकर वे हंसकर टालते रहे, पर तीव्र तूफान से उद्वेलित हुई सागर की लहरों के समान अब उनके मन में ऊहापोह चलने लगा था। एक दिन अपनी पत्नी यशोदा के साथ दीनानाथ चाय पीने बैठे तो उन्होंने पूछ ही लिया-‘तुम किसी किरण नाम की लड़की को जानती हो?’ ‘हां जानती हूं, मुसीबत की मारी है। ऐसे दिन भगवान किसी को न दिखाए’- नि:श्वास छोड़ते हुए उसने कहा। ‘एक दिन यहां आई भी थी। आपके बारे में पूछ रही थी।’ ‘बताओ क्या हुआ उसके साथ?’ दीनानाथ की जिज्ञासा अब उत्तुगं शिखर पर थी। ‘हुआ यह कि उसके माता-पिता अच्छे-भले गांव से इस मुए शहर में बसकर एक मंदिर की पूजा का काम संभाले हुए थे। कोरोना की पहली लहर में किरण की मां चल बसी। बेचारा पिता अकेला रह गया। एक ही संतान थी यह किरण, जिसका विवाह पास ही के एक गांव में हुआ था। पति किसी प्राइवेट कंपनी में कलर्क था पर शराबी था। वह आए दिन किरण के साथ मारपीट करता था। किरण उसे छोड़कर कई-कई दिन तक अपने पिता के पास रहती। पर पिता हर बार उसे समझा-बुझाकर निभा लेने की सलाह देता और वापस ससुराल भेज देता। पर एक दिन तो हद हो गई। एक रात उसके पति ने नशे में धुत होकर उसे बहुत पीटा। किसी तरह वो ख़ुद को कमरे में बंद करके बचाने में कामयाब हो गई। अगले दिन सवेरा होते ही अपनी चार साल की बेटी को लेकर वह हमेशा के लिए अपने पिता के पास आ गई और किसी निजी स्कूल में कम्प्यूटर का काम कर गुज़ारा करने लगी। तभी कोरोना की दूसरी लहर में पिता भी पॉजीटिव हो गए। सात दिन तक वेंटीलेटर पर रहने के बाद भगवान को प्यारे हो गए। अब किरण अपनी बच्ची के साथ अकेली ही रह रही है। दीनानाथ अतीत के किसी गहरे आयाम में खो गए। जिस गांव में किरण का परिवार रहता था उसी गांव में दीनानाथ सोलह साल तक अध्यापक रहे थे। उन्हें याद आ रहा था कि किस तरह किरण पहली कक्षा में भर्ती हुई थी और सीनियर सेकेंडरी पास करके निकली थी। बहुत ही कुशाग्र बुद्धि, विनम्र और होनहार लड़की थी। मुस्कराहट सदा उसके चेहरे पर तैरती रहती थी। अब उनके समझ में आया कि आख़िर किरण बार-बार क्यों कह रही थी कि कहानी की सूर्या का आगे क्या हुआ? किरण के भविष्य का प्रश्न उनके मन मष्तिष्क को भी व्यथित करने लगा, ‘क्या होगा बेचारी का?’ एक दिन दोपहर के ख़ाली समय में बातों का दौर चल रहा था। यशोदा कोरोना काल को सेवा का अवसर बता रही थी। वह बता रही थी कि किस तरह उनका बेटा अखिलेश, जो फिज़ियोथैरेपिस्ट था, कोरोना संबंधित पूरी सुरक्षा का ध्यान रखते हुए मरीज़ों की मदद करने में जुटा हुआ था। समय का अनुकूल रुख भांपकर उन्होंने प्रस्ताव रखा- ‘अगर आप सब सहमत हो जाएं तो क्यों नहीं हम किरण को अपने घर की बहू बना लें। वह पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की है।’ सुनते ही सन्नाटा छा गया। मानो सभी को सांप सूंघ गया हो। थोड़ी देर बाद यशोदा ने ही चुप्पी तोड़ी-‘हमारे एक ही बच्चा है और आपने यह सब कैसे सोच लिया? क्या हम उसका विवाह ऐसी तलाकशुदा लड़की से कर दें जिसके साथ एक बच्ची भी हो? समाज के लोग क्या कहेंगे?’ दीनानाथ ने उस समय कुछ भी कहना उचित नहीं समझा। वे चुपचाप अपने काम में लग गए। शाम तक सभी गंभीर और गुमसुम रहे। एक अजीब तरह का मौन चारों तरफ़ पसर गया था। रात को खाने के समय सब फिर एक साथ बैठे। बात दीनानाथ ने ही शुरू की, ‘देखो किसी को भी परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। विवाह अखिलेश और तुम्हारी सहमति से ही होगा। मैं तो इसलिए कह रहा था कि बारह साल तक मैंने किरण को क़रीब से देखा है। माता-पिता के बाद एक अध्यापक ही होता है जो विद्यार्थी को गहराई से जानता है। किरण एक विनम्र, कुशाग्र बुद्धि और संवेदनशील लड़की है और संघर्षों ने उसे तपाकर और निखार दिया है। उसके आने से ना केवल अखिलेश के जीवन में बल्कि हमारे परिवार की बगिया में भी एक नई बहार आ सकती है। फिर जैसी आप लोगों की मर्ज़ी।’ दीनानाथ ने सुबह उठकर देखा तो पाया कि दोनों मां-बेटे गहन विचार-विमर्श में मग्न थे। आख़िरकार दोनों की सहमति मिल गई। एक सादे पारिवारिक स्तर के कार्यक्रम में वरमाला का आदान-प्रदान हुआ। किरण के एकमात्र रिश्तेदार मामा-मामी ने माता-पिता की भूमिका अदा की और किरण दीनानाथ के घर की बहू बनकर आ गई। दीनानाथ ने भी आशीर्वाद समारोह और छोटा-सा प्रीतिभोज का कार्यक्रम रखा। वर-वधू सभी बड़ों का चरण-स्पर्श कर आशीर्वाद ले रहे थे। दोनों ने दीनानाथ के पैरो में झुककर प्रणाम किया ‘जुग जुग जियो, तुम्हारी जोड़ी चिरंजीवी और सुखी रहे।’ फिर किरण की ओर देखकर बोले, ‘अब तो मेरी अधूरी कहानी पूरी हो गई होगी बेटा।’ किरण भावुक हो गई। वह एक बार फिर दीनानाथ के पैरों में झुकी, ‘आप महान हैं सर! ओह भूल हुई, पिताजी।’ अपने आंसू पोंछते हुए किरण मुस्करा दी।

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