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दो अनुभव:मदद वही होती है जो निस्वार्थ भाव से की जाती है जैसे उस कामगार द्वारा की गई और सास-बहू जब एक-दूसरे को समझने लगती हैं तो उनका रिश्ता और मज़बूत हो जाता है, कैसे जानिए इन अनुभवों से...

शैलजा विजयवर्गीय, सोनिका उप्रेतीएक महीने पहले
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मदद के मायने

सालों से घर के पास ही खाली प्लॉट बारिश में भर जाता था। मच्छर, कीड़े, मकोड़े और यहां तक कि सांप भी पानी में तैरते नज़र आते थे। एक दिन प्लॉट के मालिक को भूमि पूजन करते हुए देख राहत महसूस हुई! पड़ोसी तो होंगे ही साथ ही मच्छर, गंदगी से भी बचाव! पर वहां लगा मज़दूरों का जमघट वह भी कोरोना काल में। ख़ैर, मकान बनेगा तो मज़दूर तो होंगे ही, झोपड़ी भी होगी। इस सच से समझौता कर लिया! धीरे-धीरे मज़दूरों को समझाने की कोशिश की मास्क लगाओ, ध्यान रखो लेकिन उनके कान पर तो जूं भी नहीं रेंगी! हरदम यह कहकर बात टाल देते हमें कोरोना-वोरोना नहीं हो सकता। यही सोच पर चुप रह गए कि हम ही अपना ख़्याल रख लें!

पर बाहर से हर रात बच्चे की रोने की आवाज़ आती तो मन द्रवित हो जाता। इतनी सर्दी में कैसे यह मज़दूर छोटी-सी झोपड़ी में अपने आप को सुरक्षित रखते हैं! उस दिन रहा नहीं गया, तो पतिदेव ने एक रज़ाई और एक गद्दा निकाला और बाहर उन्हें देने के लिए कहा। मैंने बाहर जाकर उन मज़दूर दंपति से पूछा ‘रज़ाई लोगे?’ मज़दूर मां ने झट से ले ली। पता चला उसका डेढ़ महीने का बच्चा है, उसके साथ दिन भर मज़दूरी करती है! एहसास हुआ कि कितनी कठिन ज़िंदगी है! मैं भी मज़दूर दंपति से बातचीत करने लगी। वह मास्क लगाने लगे थे!

एक दिन गैस पाइपलाइन वालों ने पाइपलाइन डालने के लिए खुदाई की तो उनकी झोपड़ी आधी तोड़ दी! सुबह से शाम तक कॉन्क्रीट के टीले पर मासूम से बच्चे को लेकर धूप सेकती रही लेकिन उस मज़दूर मां के चेहरे पर कहीं शिकन नहीं! मुझसे रहा नहीं गया, शाम होते-होते मैंने उस मज़दूर दंपति से कहा, ‘मैं खाना बना देती हूं पर बिना लहसुन प्याज़ का होगा, तुम लोग खा लोगे ना?’ उस मज़दूर ने बड़ी दयनीयता से जवाब दिया ‘आप हमारे लिए क्यों परेशान होते हो! अभी थोड़ा ही काम बचा है फिर हम अपनी झोपड़ी बनाकर खाना बना लेंगे! हमारे लिए आप खाना बनाओगे?’ उसे बड़ा आश्चर्य हुआ पर मेरे ज़ोर देने पर उन्होंने खाने के लिए हां कर दी। उन्हें भरपेट खाना खिलाकर बहुत ही ख़ुशी मिली। रोज़ उनके चेहरे पर मुस्कराहट देखकर मैंने भी उनसे सीखा कि मुश्किलें आती हैं, चली जाती हैं पर हमें हिम्मत से हंसते हुए ही उनका सामना करना चाहिए। एक दिन वो मज़दूरन बोली, ‘आंटी, मेरे लिए लड्डू बना दोगे क्या! मेरी सास ने बना कर दिए थे, वो ख़त्म हो गए! सामान मेरे पति ले आए हैं! पर मुझे बनाना नहीं आता।’ मैं सोच में पड़ गई क्योंकि लड्डू तो ज़्यादा मात्रा में बनाने थे और मुझे टेनिस एल्बो और फ्रोज़न शोल्डर की प्रॉब्लम है जिसकी वजह से मैं अपने आप को कुछ असमर्थ महसूस कर रही थी। मैं सोच ही रही थी इतने में मेरी कामवाली बाई ने कहा, ‘मैं आटा कल घर से सेक लाऊंगी। उसमें ही हाथ ज़्यादा दुखता है बाकी आप मेवों को मिक्सी में एकसार कर देना। लड्डू मैं बांध दूंगी!’ सच उसकी भलाई की पहल चौंकाने वाली थी। मासूम बच्चे और उसकी मां की तकलीफ़ को विपन्न घरेलू कामगार ने भी समझा। स्वादिष्ट लड्डू भी बने और मज़दूरन ने उसे सहर्ष स्वीकारा! निस्वार्थ भाव से मदद कर संतुष्टि तो सभी को होती है।

बहू की जगह

ये बात उस समय कि है जब मेरी शादी को एक साल हो चुका था। मन में सास का डर तो था, पर सारे कार्यों में कुशल होने से एक विश्वास-सा बन गया था कि मैं धीरे-धीरे सबका दिल जीत लंूगी। हालांकि, शादी को एक साल बीतने और हर काम को कुशलतापूर्वक कर लेने के बावजूद मैंने सास के मुंह से अपने लिए तारीफ़ का एक शब्द भी नहीं सुना था सो मन में उनके लिए थोड़ी कड़वाहट आने लगी थी।

उन्हीं दिनों सास से मिलने कुछ रिश्तेदार आए और मेरे बारे मंे उनकी राय जानने को पूछने लगे कि छोटी बहू कैसी है? तो मेरी सास बोलीं, ‘बिलकुल नमक के जैसी।’ मैं चाय लेकर आ रही थी, तो मैंने उन लोगों की यह बात सुन ली। सुनकर बहुत बुरा लगा और मैं अनमनी-सी होकर सबके पैर छूकर आ गई और कमरे में आकर रो पड़ी। रात को खाना खाने का भी मन नहीं हुआ।

खाना ठीक से नहीं खाते देख कर सास ने पूछा, ‘क्या बात है, तुम बहुत उदास लग रही हो और खाना भी नहीं खाया। तबियत तो ठीक है ना तुम्हारी?’ इतना सुन मैं फिर रो पड़ी और जो सुना था सब बता दिया। सास हंसते हुए बोलीं, ‘बस, इतनी-सी बात। तुमने मेरी बात का ग़लत मतलब निकाल लिया। उसका मतलब है कि बहू नमक के समान होती है जिसका कर्ज़ कभी नहीं चुकाया जा सकता क्योंकि वो हमारे लिए अपना सब कुछ छोड़कर आती है और जिसके बिना हर चीज़ बेस्वाद लगती है जैसे बिना नमक के सब बेस्वाद लगता है। और घर की इज़्ज़त तो बहू से ही होती है।’ मेरी सास का ये नज़रिया जानकर मैं दंग रह गई थी। मेरी उनके प्रति सोच बदल गई थी। आज सास के रूप में मुझे एक मां और मिल गई।

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