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  • If Someone Gives Respect As Well As Helping, Then Only Prayers Come Out Of The Mind And No One Should Be Punished For The Injustice Done To Someone Else, It Should Be Known On That Day.

दो अनुभव:कोई मदद करने के साथ ही मान भी दे तो मन से दुआएं ही निकलती हैं और किसी के किए अन्याय की सज़ा किसी अन्य को नहीं देनी चाहिए, ये उस दिन जाना

नीरजा वर्मा, वैभव कोठारी18 दिन पहले
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सफ़र में राहत मिली...

बीते कुछ वर्ष पहले की बात है, पोते के होने की ख़ुशी में मैं और मेरा बेटा रांची गए। वहां छठी की पूजा होने के बाद हमें लौटना था किंतु तत्काल टिकट पर रिज़र्वेशन नहीं मिल रहा था। अनेक कोशिशों के बाद भी रिज़र्वेशन ना मिलने पर और ना रुक पाने की मजबूरी से हमने हिम्मत कर जाने का फैसला किया। राउरकेला में कहीं ना कहीं रिज़र्वेशन मिल ही जाएगा, इस उम्मीद पर हम निकल पड़े। बेटा रास्ते भर टी टी से मिल कहीं रिज़र्वेशन की एक बर्थ भी मिल जाए, इस कोशिश में लगा रहा। राउरकेला पर टी टी मिला, तो उसने कहा- ‘सामने फर्स्ट क्लास के डिब्बे में आंटी को चढ़ा दो। अगले दो-तीन स्टेशन के बाद 10 नंबर की सीट खाली होगी। अभी से उन्हें कूपे में भेज दो।’ बेटे ने मुझे फर्स्ट क्लास में चढ़ा दिया। भाग-दौड़ ने घुटनों का दर्द बढ़ा दिया था। मेरे पैर काफी सूज चुके थे। उस कूपे का दरवाज़ा खोल मैंने जैसे ही अंदर प्रवेश किया, सामने एक बुज़ुर्ग व्यक्ति घूरता नज़र आया। दूसरी बर्थ पर कोई सिर ढक के सो रहा था। चश्मे वाले ने काफी रफ तरीक़े से पूछा ‘क्या है?’ मेरे जवाब देने पर कि अगले दो स्टेशन के बाद यहां एक बर्थ खाली होने वाली है अतः टी टी ने मुझे बैठने को कहा है, सुनते ही वो भड़क उठा। ‘मैं रिटायर्ड रेलवे ऑफिसर रहा हूं। 3 महीने पहले से मैंने सीट बुक कराई थी और आप ऐसे ही चले आए इस कूपे में। हमें कोई डिस्टरबेंस नहीं चाहिए। यहां से जाइए।’ ऐसी बदतमीज़ी-भरी बात मैंने कभी ज़िंदगी में नहीं सुनी थी, सो मैं भी भड़क उठी- ‘कोई फ्री में यहां नहीं बैठने आई हूं और परमिशन से ही आई हूं।’ अब वह बड़बड़ाता हुआ मोबाइल उठाकर- ‘अभी कंप्लेंट करता हूं’ कहते हुए, फोन लगाने लगा। तभी सामने की बर्थ पर सोया युवक तेज़ी से उठ खड़ा हुआ और उस बुज़ुर्ग से ग़ुस्से में कहने लगा- ‘अंकल, आपको एक बुज़ुर्ग लेडी से बात करने की तमीज़ नहीं है? आपको क्या प्रॉब्लम है? इस तरह से दादागिरी नहीं जताई जाती। मानवता और इंसानियत भी कोई चीज़ होती है। इनके सूजे पैर देखिए।’ मेरी ओर बढ़ते हुए उसने कहा- ‘आंटी आप मेरी सीट पर बैठिए, मैं खड़ा रहूंगा बाहर।’ उसने मुझे आदरपूर्वक बैठने को जगह दी। मैं मन ही मन उसे दुआएं देती- ‘धन्यवाद बेटा’ कह उठी। वाकई आज भी भलाई का ज़माना है।

वेतन कम, ख़ुशी ज़्यादा

साल का सातवां महीना यानी जुलाई आते ही 2008 की घटना याद आ जाती है। मैंने पास के गांव के इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाने के लिए आवेदन किया। इंटरव्यू में मुझसे पूछा गया- ‘आप कितनी सैलरी लेना चाहेंगे?’ ‘अन्य टीचर्स के समतुल्य’ मैंने कहा। उन्होंने कहा- ‘ओके’ और मुझे नियुक्ति दे दी। जॉइन करने के बाद मुझे पता चला कि मैनेजमेंट ने मेरे साथ धोखा किया है। उन्होंने मुझे अन्य टीचर्स की सैलरी 1000 रुपए कम बताई। इस तरह से मेरी सैलरी अन्य टीचर्स से 1000 रुपए कम रही। मैनेजमेंट के इस धोखे से दुःखी मैं निराश रहने लगा और स्कूल में सिर्फ़ टाईम पास करने लगा। सिर्फ़ प्रार्थना ही ईमानदारी से करवाता था। इसमें भोजन मंत्र भी शामिल था। स्कूल का समय सुबह 10 बजे से दोपहर 3:30 बजे तक था। मुझे सुबह 9 बजे ही घर से निकल जाना होता था इसलिए मैं टिफ़िन ले जाने के बज़ाय सुबह 8:30 बजे ही भोजन कर लेता था। शाम का भोजन 4:30 बजे। एक माह के प्रयत्न से ऐसी दिनचर्या बन गई थी। अगस्त भी खिसकने को था। मेरे तीन कालखंड प्राथमिक शाला और एक कालखण्ड माध्यमिक शाला में था। मैंने अब तक कक्षाओं में कुछ पढ़ाया नहीं था। ऐसे ही एक दिन मैं भोजन मन्त्र करवाकर बैठा था। तभी कक्षा तीन की एक नन्ही बच्ची अपना टिफ़िन लेकर मेरे पास आई और मुझसे कहने लगी- ‘सर! इस टिफ़िन में पोहे हैं, खा लीजिए!’ ‘क्यों?’ - मैंने आश्चर्य से पूछा। ‘सर! आप टिफ़िन नहीं लाते हैं और भूखे रहते हैं। ये मुझे अच्छा नहीं लगता। कल से मैं आपके लिए भी टिफ़िन लाया करूंगी।’ ‘नहीं! मैं घर से खाना खाकर आता हूं।’ -मैंने कहा ‘सर! ये पोहे आप खा लीजिए!’ -उसने पुनः आग्रह किया। मैंने उस बच्ची को ख़ुश करने के लिए एक चम्मच पोहे हथेली पर लेकर खा लिए और शेष उसे लौटा दिए। ‘तुम्हारे पापा क्या करते हैं?’ मैंने उस से पूछा। ‘खेत में काम’ उसने कहा। पोहे खाते समय मेरी आंखें नम हो गई थीं। उस बिटिया के मेरे प्रति असीम स्नेह ने मुझे बदलकर रख दिया था। मैं सोच रहा था- ‘मैनेजमेंट से मिले धोखे की सज़ा मैं इन मासूमों को कैसे दे सकता हूं?’ उस दिन से मैं सभी कक्षाओं में ईमानदारी से पढ़ाने लगा। मेरी सैलरी अन्य टीचर्स से 1000 रुपए कम थी लेकिन मैं अब उनसे अधिक ख़ुश था और सन्तुष्ट भी।

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