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  • If Women Understand The Difficulties Of Their Companions, Support Them, Then There Will Be No Need To Appeal To Someone Else's Authority Because There Will Be No Issues.

दो लघुकथाएं:अगर स्त्रियां अपनी साथिनों की मुश्किलें समझ लें, उनका साथ दें, तो सचमुच किसी और की सत्ता से गुहार लगाने की ज़रूरत ही नहीं होगी क्योंकि कोई मसले ही नहीं होंगे

विनीता मोहता, चरणजीत सिंह कुकरेजा11 दिन पहले
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बदला नज़रिया

कड़ियां घर से जुड़ती हुई समाज तक जाती हैं। अगर घर में इनके जोड़ मज़बूत हों, समझ पक्की हो, तो इनका सकारात्मक असर बाहर होगा ही।

आज सुधा की बेचैनी देखकर रमा जी से रहा नहीं गया और उसके पास आकर उससे बोलीं, ‘क्या बात है, कोई परेशानी है क्या? वैसे तो वेदांत के जाने के बाद तू हमेशा से ही उदास हो जाती है, मगर अब तो तुझे ख़ुश होना चाहिए, तेरा बेटा हॉस्टल नहीं गया बल्कि जॉब करने लगा है। अपनी पहली नौकरी पर गया है। क्या कहते हो तुम लोग... ही इज़ अ बिग बॉय नाउ। मगर आज तू बेचैन है!’

सुधा, रमा जी यानी अपनी सास की बात सुनकर गहरी सांस लेते हुए बोली, ‘आपने सही समझा। इस बार बात अलग है मां जी। कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं?’

उसके रुख़ की गंभीरता को भांपकर रमा जी भी आश्चर्यचकित हो गईं और बोलीं, ‘ऐसा क्या हो गया जो तू इतनी परेशान है?’

यह सुनकर सुधा की आंखों में आंसू आ गए। वह बोली, ‘आज सुबह वेदांत का सामान पैक करते हुए मैंने देखा उसके वॉलेट में हमारी फैमिली फोटो नहीं थी बल्कि किसी लड़की की फोटो लगी हुई थी।’

यह सुनकर रमा जी ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगीं, ‘धत तेरे की, खोदा पहाड़ निकला चूहा! यह तो ख़ुशी की बात है, तेरे बेटे को कोई पसंद तो आई वरना मैं तो सोच रही थी कि इससे शादी की बात कैसे की जाएगी। छोटे की बात अलग है, वेदांत तो वैसे ही ख़ामोश रहता है।’

‘रमा जी मुस्कराते हुए बोलीं, ‘यह फ़ैसला तो वेदांत का था कि उसने हमारी फोटो निकालकर उस लड़की की फोटो लगा ली। इस बात के लिए तुम उस बच्ची को कैसे दोष दे सकती हो? और वेदांत को भी क्यों दोष देना, क्या इतना ही भरोसा है तुम्हें अपने संस्कारों पर? एक राज़ की बात बताऊं। तुम्हारी सगाई होने के पहले तक राजीव के पर्स में मेरी फोटो रहती थी, मगर जैसे ही सगाई हुई उसने मेरी फोटो निकालकर तुम्हारी फोटो लगा दी। यदि मैं तुम्हारे लिए अपने मन में पूर्वग्रह लेकर बैठ जाती तो क्या हम दोनों का रिश्ता इतना ख़ूबसूरत हो पाता? जा, जाकर अपने नए रिश्ते के लिए भगवान के मंदिर में दिया लगाकर आ। जा...।’

रमा जी की बातें सुनकर सुधा के मन में जमी हुई बर्फ़ पिघल गई और वह मुस्करा उठी। एक नई मित्र को परिवार में लेकर आने की शुभसूचना मिलने पर वह भगवान का आभार मानने और मंदिर में दिया लगाने चली गई।

पहल

क़ैद रहे, तो दूसरी को आज़ादी मिले, इस बंधन को नियम मानते कितने ज़माने गुज़र गए। इसे बदलने की पहल हुई है।

‘बहू, दरवाज़ा भीतर से बंद कर लेना। हम जा रहे मधु चाची के यहां बैठने, सुबह से चार-पांच फोन आ चुके हैं उनके। देर हो जाएगी हमें... तुम शाम के खाने की तैयारी कर लेना।’

‘मां जी सुनिए न! मैं भी चलती हूं न आपके साथ। वो मधु चाची की बहू स्वाति कई बार बुला चुकी है हमें, विशेष तौर पर आज भी आने के लिए कहा है उसने। थोड़ी देर गप्प-शप्प करके आ जाएंगे... इनके आने के पहले...’

‘स्वाति कभी आई है क्या हमारे यहां... जो तू इतनी उतावली हो रही है जाने के लिए! अरे तेरे इस घर में आने से ही तो मैं भी निकल पा रही हूं कहीं। वरना खिड़कियों से झांकती रहती थी अब तक... आसमान में विचरते परिंदों को।’

‘मां जी, उसकी स्थिति भी तो मेरे जैसी ही है ना! मधु चाची भी तो उसे न हमारे यहां लाती हैं और न ही कहीं और लेकर जाती हैं। क्या हम लोगों को घर की दहलीज़ लांघने के लिए आपकी तरह सास बनने की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी?’

आदर्शों के बंधनों में जकड़ी बहू के भीतर की नारी ने पहली बार स्वच्छंद उड़ान भरने के लिए स्वयं ही अपने बंधन खोलने का प्रयास किया।

‘चल ठीक है भई, हो जा तैयार जल्दी से...।’

फिर श्वास छोड़ते हुए अपने आपसे ही बोलीं, ‘कर लेंगे शाम के भोजन की तैयारी मिल-जुलकर।

सामाजिक बंधनों से मुक्ति दिलाने में आख़िर किसी न किसी को तो पहल करनी ही पड़ेगी।’

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