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सुनो भई कहानी:अपने घर व दोस्तों पर यदि आपको भरोसा नहीं होता है तो कोई भी उन्हें आपसे दूर कर सकता है, जैसा उल्लू के साथ हुआ

डॉ. अलका जैन ‘आराधना’16 दिन पहले
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एक घने जंगल में एक पेड़ के कोटर में एक उल्लू रहता था। वह कोई साधारण उल्लू नहीं था। उसमें एक बहुत बड़ी ख़ासियत थी कि वह अन्य उल्लुओं की तुलना में बहुत ज़ोर से आवाज़ निकाल सकता था। यही कारण था कि सब उसे जंगल का रखवाला मानते थे। उसकी वजह से जंगल में सारे पशु-पक्षी बेफ़िक्र होकर रहते थे क्योंकि उल्लू रात को बहुत साफ़ देख सकता है और जब भी उसे शिकारियों का कोई झुंड जंगल के आसपास नज़र आता तो वह ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ें निकालता था। इससे सारे जानवर सचेत हो जाते थे और शिकारियों को मुंह लटकाकर वापस लौटना पड़ता था। उल्लू जिस पेड़ के कोटर में रहता था, वह बहुत विशाल बरगद का पेड़ था। उस पेड़ पर बहुत से पक्षी रहते थे। उस पेड़ की छाया में बहुत से जानवर अठखेलियां करते थे, इससे उल्लू का भी मन लगा रहता था। इसी तरह बड़ी शांति से सबकी ज़िंदगी चल रही थी। एक बार पास के जंगल से उल्लू का ख़ास दोस्त चमकू चमगादड़ आया। उल्लू ने उसका बहुत ज़ोर-शोर से स्वागत किया। रात को जब सारे पशु-पक्षी आराम से सो रहे थे तब उल्लू और चमगादड़ आपस में बतिया रहे थे। चमकू ने उल्लू से कहा- ‘तुम तो रहे उल्लू के उल्लू ही...’ उल्लू ने पूछा- ‘ऐसा क्यों कहा दोस्त?’ चमकू ने जवाब दिया- ‘और क्या कहूं...आसपास के सारे जंगलों में तुम्हारी बेवकूफी के चर्चे होते हैं। तुम यहां मुफ्त के चौकीदार बने बैठे हो। अगर हमारे जंगल में होते तो तुम्हें महामंत्री बना दिया जाता।’ चमकू की बात सुनकर उल्लू बोला- ‘ऐसा ना कहो मित्र! यहां पर सब जानवर मुझे बहुत प्यार करते हैं।’ यह सुनकर चमकू ने ठहाका लगाते हुए कहा- ‘यहां पर और भी उल्लू हैं...तुम ही क्यों चौकीदार हो...सब तुम्हारे सीधेपन का फ़ायदा उठाते हैं। सही कहते हैं सब लोग...उल्लू तो उल्लू ही होता है।’ उल्लू को अपने दोस्त की यह बात बहुत अखरी पर वह चुप ही रहा। चमगादड़ ने उसे समझाते हुए कहा- ‘रात को तो हम भी जागते हैं पर इस तरह से चौकीदारी नहीं करते।’ चमकू की बात सुनकर उल्लू उदास हो गया था। उसने सोच लिया था कि अब वह बिल्कुल चुप रहेगा। आख़िर जानवरों को उसकी अहमियत का एहसास तो हो। उल्लू ने देखा कि कुछ लकड़हारे बड़ी-बड़ी कुल्हाड़ियां लेकर जंगल में प्रवेश कर रहे थे। उल्लू तुरंत समझ गया कि वे जंगल के हरे-भरे पेड़ काटकर ले जाएंगे। अब उल्लू ज़ोर से चिल्लाने ही वाला था कि उसे चमकू की बात याद आ गई और वह चुप ही रहा। तभी उल्लू ने देखा कि लकड़हारे कुल्हाड़ी लेकर उसी पेड़ की ओर बढ़ रहे थे जिस पर वह बैठा था। उल्लू सोचने लगा- ‘मैं इस पेड़ से उड़ जाता हूं, दूसरे पेड़ के कोटर में रह लूंगा।’ यह सोचकर उल्लू वहां से उड़ने ही वाला था कि उसे बरगद की आवाज़ सुनाई दी- ‘उल्लू भाई! तुमने इस जंगल को हमेशा बचाया है, मुझे भी बचा लो। तुम दिल के सच्चे हो इसलिए मेरी आवाज़ सुन सकते हो। मुझे अपने जाने की परवाह नहीं लेकिन इस पेड़ पर रहने वाले सब पक्षी बेघर हो जाएंगे।’ कहकर पेड़ ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। अब उल्लू से रहा नहीं गया। वह सोचने लगा- ‘आख़िर यह मेरा घर है... मैं इसे छोड़ कर कैसे जा सकता हूं? मुझे अपने ही नहीं सबके घर को बचाना चाहिए।’ अब उल्लू अपनी चिरपरिचित आवाज़ में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा। जंगल के सब जानवर जाग गए। सियार, भालू, शेर, लोमड़ी सब ऊंचे स्वर में चिल्लाने लगे। इतने जानवरों की आवाज़ंे सुनकर लकड़हारे बुरी तरह घबरा गए। तभी उन्हें जंगली कुत्तों का एक झुंड अपनी तरफ़ दौड़ता हुआ दिखाई दिया। लकड़हारे सिर पर पांव रखकर भागे। पेड़ ने उल्लू को बहुत धन्यवाद दिया और कहा-‘तुम सही मायने में जंगल के रक्षक हो... धन्यवाद दोस्त...।’ सभी जानवरों ने उल्लू की प्रशंसा की। उल्लू को अपनी घटिया सोच पर बहुत पछतावा हुआ। कैसे वो किसी के कहने में आकर अपना घर, अपना जंगल ही उजाड़ने चला था। उसने भावुक होते हुए अपने घर, अपने बरगद के पेड़ की शाखाओं को देखा तो ऐसा लगा जैसे शाखाएं झूलकर उसे शुक्रिया कह रही हैं, दुलार लुटा रही हैं। यह देख उल्लू ख़ुशी से झूम उठा।

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