• Hindi News
  • Madhurima
  • If You Go To The Wedding As A Guest, Then Carry A Smile On Your Face And Positive Behavior.

विवाह विशेष:शादी में मेहमान बनकर जाएं तो चेहरे पर मुस्कान और सकारात्मक व्यवहार साथ ले जाएं

डॉ. मोनिका शर्मा16 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
  • ख़ानदान में किसी की शादी हो, तो सबको उस अवसर के सफल आयोजन में अपना योगदान देना चाहिए ना कि वहां पहुंचकर ‘मेहमान’ का जामा पहनकर, अपने लिए की गई व्यवस्थाओं में मीनमेख निकालना चाहिए।
  • होना क्या है, होता क्या है, आंकिए व्यवहार के आईने में झांककर।

घर-परिवार में किसी की शादी ऐसा अवसर होता है, जहां सबके व्यवहार और शिष्टाचार की आज़माइश हो जाती है। जिसके घर शादी होती है, वहां बड़ों का तनाव बढ़ जाता है। सबको भाए ऐसी व्यवस्था करने में वे दिन-रात हलाकान होते रहते हैं।

सोचने और याद रखने की बात यह है कि जिस परिवार के बेटे या बेटी की शादी में शरीक होने आप आए हैं, वे ख़ुद एक नए अनजान परिवार के समक्ष एक अच्छे आयोजन और अच्छे व्यवहार की मिसाल पेश करने की कोशिश में जुटे हैं। ऐसे में उनके लिए मुश्किलों के कई-कई द्वार खोल देना क्या उचित है?

विवाह- दो ज़िंदगियों को जोड़ने वाला आयोजन होता है। या यूं कहें कि स्मृतियों की दीवार पर सदा के लिए चस्पा हो जाने वाला ऐसा जीवंत फ्रेम होता है, जिसमें सहयोगी- स्नेहमयी बर्ताव और बातें प्यारी तस्वीरों की तरह साथ रह जाते हैं तो वहीं उलाहने और कमियां खोजने वाली नज़रें और नुक्स निकालते बोल मन में कहीं गहरे धंस जाते हैं। जान-बूझकर कहे गए तीखे शब्द, अनजाने ही दिए गए ताने, सोच समझकर बनाए गए बहाने, सब मन को बींध भी जाते हैं।

कमी-बेसी नहीं अपनी भागीदारी तौलिए

शादी एक बड़ा कारज होता है। इसीलिए क्या ठीक नहीं है, यह ऐसे क्यों किया, वैसे क्यों नहीं किया, जैसे सवालों और शिकायतों के बजाय सोचिए कि आप क्या कर सकते हैं। मामा, बुआ, चाचा या कोई दोस्त-पड़ोसी, किसी ना किसी रिश्ते की डोर में बंधकर ही आप नए बंधन की ख़ुशियों को सैलिब्रेट करने आए हैं। दूल्हा-दुल्हन के अभिभावकों को शिकायतों की झड़ी से सहमा देने के लिए नहीं, जो पहले से ही भागदौड़ में जुटे हैं। ध्यान रहे कि ख़ुशी के मौके पर आपके शिकायती लहजे का हर शब्द ख़ुद आपकी छवि उकेर रहा होता है। आपका व्यवहार पुराने रिश्तों और नए जुड़ रहे सम्बन्धियों को बता रहा होता है कि आप ख़ुशदिल हैं या कमी ढूंढने वाले। असंतुष्ट सोच वाले हैं या सहजता से ख़ुशियों में शामिल होने वाले।

छोटी बात को बड़ा मत बनाइए

बड़ों को विश्राम करने के लिए आरामदेह बिस्तर - कमरा नहीं मिला या आपके उधम मचाते बच्चों को किसी ने टोक दिया, बराबर की उम्र के लोगों की मान-मनुहार मेंे ज़रा कमी रह गई या खाना परोसने में थोड़ी-सी देरी, आपने क्या तोहफ़ा दिया और उसके बदले क्या मिलेगा या बिटिया के उपहारों में कमी पर तुनकमिज़ाजी और अपने घर की शादी के ख़र्चे का उदाहरण- ऐसे हिसाब-किताब और शिकायतों से हर उम्र के लोग दूर रहें। शादी समारोह में ना तो बड़े-बुज़ुर्ग आराम करने भर को आते हैं और ना ही लेन-देन का हर हिसाब भावनाओं से परे किसी बहीखाते की तरह किया जाता है। पहले से ही बड़ी चिंताओं की भागदौड़ में घिरे परिजनों के लिए छोटी-छोटी बातों को बड़ा मत बनाइए। यह सब करते हुए आप अपनी ही सोच को उजागर करते हैं।

जिस रिश्ते से शादी में आए हैं, उस रिश्ते का मान रखते हुए अवसर को पूरा और अच्छा करने में शरीक हो जाइए।

शब्दों को संभालें, व्यवहार परखें

ऐसे अवसरों पर सब कुछ पैनी निगाह से परख रहे परिवार वाले बाद में ख़ुद अपने बर्ताव के असर की पड़ताल कम ही करते हैं जबकि वैवाहिक आयोजन व्यवहार का ही अवसर है। यह सोच और सरोकार की झलक दिखाता है। ऐसे आयोजनों में तनाव और आपाधापी में भी सहज रहना ज़रूरी है। मुस्कराते हुए इस अवसर को जीना, इसमें भागीदार बनना ज़रूरी है। इस समय कहे गए शब्द और किया गया सुलूक, जीवन भर याद रहता है। मज़ाक में या नाख़ुशी से की गई टीका-टिप्पणी हमेशा के लिए टिक जाती है ज़ेेहन में।

इसलिए अपने सकारात्मक और सहज-सहयोगी व्यवहार से अवसर को सरल-सुगम बनाएं।

दुल्हन की ससुराल वाले भी जानें स्वीकार्यता से आएगी सहजता

दुल्हन हो या उसके परिजन, मंगल गीतों की धुन में मन दुखाने वाली बातें उनके कानों तक भी पहुंचती हैं। मीन-मेख निकालने का व्यवहार साफ़ समझ में आता है। कितनी ही छोटी-छोटी बातें, जो बारात की मस्ती से लेकर मंडप और विदाई के भावुक पलों में किसी एक ठहाके के साथ उछाल दी जाती हैं, जो उनके मन पर चोट कर जाती हैं। ससुराल में पग धरने से लेकर उस आंगन से पूरी तरह जुड़ने तक सुने गए कुछ शब्द बरसों बाद भी किसी के मन अहाते में गूंजते रहते हैं। शादी के आयोजन में कुछ बताने-सुनाने-जताने और कुछ भी कह जाने का ऐसा अंदाज़ व्यवहार के रंग दिखाता है। यह परिवार की छवि भी बनाता है। आगे के लिए रिश्तों में सहजता या असहजता की नींव गढ़ता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि शादी की रिवायतों से लेकर खानपान और अन्य इंतज़ामों में मीनमेख का दंश सबसे ज़्यादा दुल्हन और उसका परिवार झेलता है। ससुराल में भी यह अनकही बाध्यता ही होती है कि नई बहू ही सब स्वीकार करेगी। बदलना उसी को है। समझना उसी को है। नए माहौल में ढलना भी उसी के हिस्से है। यह सब ताने में सुनाने या चुप्पी में जताने के बजाय उसे खुले दिल से कहिए कि ‘हमारे परिवार में तुम्हारा स्वागत है।’ नई चीज़ें समझाइए और उसके विचार भी सुनिए। जैसी सहजता आप दूसरे रिश्तों के साथ बरतते हैं वैसे ही नई बहू के साथ भी बरतिए। स्नेह-पगा यह व्यवहार उसे सदा याद रहेगा। मन के मेल का सेतु बनेगा।

शादी नए रिश्तों का उत्सव है जिसमें दो परिवारों के बच्चों की अदला-बदली होती है। दोनों ही नए परिवेश, नए लोगों से जुड़ते हैं। अपरिचित परिवार के सदस्य बनते हैं। ऐसे में इस जुड़ाव से जुड़ा हर इंसान अपने मन में दोनों को ख़ूबियों और वैभिन्न्य से साथ स्वीकारने की सोच लाएं। मन दुखाने वाले शब्द कहकर मुश्किलें बढ़ाने के बजाय सहजता से निबाह की राह में अपनी हिस्सेदारी संजीदगी से निभाएं।

खबरें और भी हैं...