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बोधकथा 'वृद्धा की सीख':मां के प्रश्न के सामने सिकंदर ने भी ख़ुद को अज्ञानी मान लिया, क्या था वो प्रश्न जानें इस बोधकथा में

हरदीप सिंहएक महीने पहले
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यह तो सब जानते हैं कि सिकंदर विश्व विजय की महत्वाकांक्षा लेकर अपने देश से निकला था। उसमें असाधारण प्रतिभा और योग्यता थी। इसी के चलते उसे प्रत्येक युद्ध में विजय ही प्राप्त होती रही थी। इससे उसका दम्भ बहुत बढ़ गया था। विजय के उन्माद में उसने न जाने कितने नगरों और ग्रामों को रौंद डाला। उसने अपार धन-सम्पदा लूटी। अपने सैनिकों को भी उसने मालामाल कर दिया था। इसी क्रम में एक बार उसने ऐसे नगर पर धावा बोल दिया जिसमें केवल महिलाएं और बच्चे ही रहते थे।

उस नगर में रहने वाले युवक और वृद्ध सभी पुरुष युद्ध में मारे जा चुके रहे थे। स्त्रियी असहाय थीं, उनके पास आत्मरक्षा का कोई साधन नहीं था। शस्त्रविहीन महिलाओं से किस प्रकार युद्ध किया जाए, यही बात सिकंदर की समझ में नहीं आ रही थी। उस समय उसके साथ गिने-चुने सैनिक थे, उसकी विशाल सेना उसके पीछे आ रही थी।

उसने एक घर के आगे अपना घोड़ा रोका। कई बार द्वार पीटने के बाद बड़ी कठिनाई से द्वार खुला और लाठी टेकती हुई एक बुढ़िया बाहर आई। सिकंदर बोला, ‘घर में जो कुछ खाना हो ले आओ। मुझे भूख लगी है।’

बुढ़िया भीतर गई और थोड़ी देर में कपड़े से ढका एक थाल लाकर सिकंदर के आगे कर दिया।

सिकंदर ने कपड़ा हटाया तो देखा कि उसमें सोने के पुराने गहने रखे हुए थे। उसे क्रोध आ गया और बोला, ‘बुढ़िया यह क्या लाई है? मैंने तुझसे खाना मांगा था, क्या मैं इन गहनों को खाऊंगा?’

‘तू सिकंदर है न? तेरा नाम तो सुना था आज देख भी लिया है। यह भी सुन रखा था कि सोना ही तेरा भोजन है। इसी भोजन की तलाश में तू यहां आया था ना। यदि तेरी भूख रोटियों से मिटती तो क्या तेरे देश में रोटियां नहीं थीं? फिर दूसरों की रोटियां छीनने की ज़रूरत तुझे क्यों पड़ी? हमारी संतानों को सताने की क्या ज़रूरत पड़ी थी? एक मां पूछ रही है, बता। ’

सिकन्दर के दम्भ का शिखर टूट कर नीचे आ गिरा। वह बुढ़िया के सामने झुक गया। बुढ़िया ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा। उसे भोजन भी दिया।

सिकंदर रोटियां खाकर चला गया। उसने नगर में किसी को किसी प्रकार की क्षति फिर नहीं पहुंचाई। उसने नगर के प्रमुख मार्ग पर एक शिलालेख लगवाया, जिसमें लिखा था, ‘अज्ञानी सिकंदर को इस नगर की एक महान वृद्धा ने अच्छा पाठ पढ़ाया।’

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