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  • Indu's Baba Wanted To Make A Will, But Indu Wanted To Get Something Else Written In The Will, Not Property.

कहानी:इंदु के बाबा वसीयत करना चाहते थे, लेकिन इंदु वसीयत में सम्पत्ति नहीं कुछ और ही लिखवाना चाहती थी...

संगीता सेठीएक महीने पहले
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  • दिलों के बीच जो दीवारें खड़ी होती हैं, उनकी नींव वसीयत की चंद सतरों से भी खड़ी हो जाती है।
  • इंदु के बाबा ने भी अपनी सम्पत्ति के बंटवारे के लिए वसीयत की ज़मीन उठाई थी। क्या लिखा जाना था उसमें...

लिख दो बाबा वसीयत में

बाबा यूं ही तो नहीं बन जाता कोई, ख़ून से सींचता है अपने पौधे को। स्नेह की खाद, दुलार की ऊष्मा, भावों के झोंके से सहलाता है तब ही तो बड़ा होता है पौधा और उसके उपवन की शोभा बनता है। वो पौधा कभी फूलों वाला पौधा बनता है, तो कभी पेड़, पर ये कैसा पौधा होता है बाबा जिसे अपने उपवन से उखाड़ कर दूसरे उपवन की शोभा बना दिया जाता है। अक्सर ये प्रश्न उमड़ता था इंदु के मन में पर बाबा की गोद में लाख बार सिर रखने के बाद भी वो पूछ नहीं पाई। मां से पूछती तो बस एक ही जवाब मिलता, ‘दुनिया का दस्तूर है लाडो... हर बाबुल निभाता है।’ इंदु के बाबुल ने भी निभाया था यह दस्तूर जब इंदु की इर्द-गिर्द चाचियां-मामियां यह गीत गाते हुए उसे हल्दी लगाती रहीं– ‘इन महलों दे विच बाबुल वे! मेरा डोला अटक गया’ यह गुहार बेटी की होती है। तब बाबुल कहता है– ‘एक ईंट उखड़वा दूंगा, बेटी घर जा अपने।’ और कितनी निर्ममता से चमकीली चीज़ों का लालच देकर बेटी को डोली में बैठा दिया जाता है। इंदु ने बहुत गुहार लगाई थी मां-बाबा से– ‘मां, इतनी साड़ियां, इतने बर्तन मत दो, सब पैसे का अपव्यय है। शेखर के घर होंगे ना बर्तन!’ ‘लाडो! सब दस्तूर है दुनिया का, फिर ख़ाली हाथ थोड़े ही विदा करेंगे।’ इंदु की आवाज़ नक्कारख़ाने में तूती साबित हुई। भले ही समाजशास्त्र में इंदु ने पढ़ा था कि हर स्त्री का पिता के धन पर अधिकार होता है लेकिन पिता के कर्ज़ को धन नहीं माना जा सकता, पिता की चादर भी देखी जाती है। इंदु शेखर के साथ अपनी गृहस्थी में रमी पर मां-बाबा को याद करना नहीं भूली। बरस-दर-बरस मां-बाबा के उपहारों की परम्परा चलती रही। कभी राखी तो कभी भैया दूज, कभी होली, कभी दिवाली, मां संदूक में सहेजी साड़ी निकालती तो बाबा अपने बक्से में रखे चंद नोट और उपहार में आई डायरी या पेन देते। पिछले वर्ष मां के जाने के बाद बाबा अकेले रह गए थे। वीडियो कॉल पर बाबा का चेहरा तसल्ली नहीं देता तो इंदु ग्यारह घंटे की बस की यात्रा करना ज़रूरी समझती। इंदु के बाबा के शहर में फेरे बढ़ गए थे। ‘आजा इंदु! मांं का संदूक संभाल ले। और भी कुछ हिसाब करना है तुझसे। शेखर को साथ लाना। रोहन को भी लाना।’ उस दिन बाबा की पनियाई आंखें इंदु से छिप ना सकीं। ‘हां बाबा! रोहन की परीक्षा हो जाए, यूं तो ऑनलाइन ही है, फिर आऊंगी, तसल्ली से’ इंदु ने कहा तो बाबा की आंखें डबडबा गईं। ‘मेरा क्या भरोसा! इस महामारी का भी नहीं पता, कब क्या हो, पानी का बुलबुला है, इंसान की ज़िंदगानी।’ बाबा नीरज के अंदाज़ में बुदबुदा उठे। आज बाबा को क्या हो गया है, शेखर को भी याद कर रहे हैं, रोहन को भी, उसे बुलाकर हिसाब करना चाहते हैं। इंदु को बाबा की वो तमाम डायरियां याद आने लगीं जिनमें शायरियां लिखी होती थीं। लगता है बाबा डायरियों में लिखे शेर पढ़कर भावुक हो रहे हैं। मई की चिलचिलाती धूप में शेखर को यात्रा करना पसंद नहीं था लेकिन इंदु ने बाबा का आग्रह बताया तो चल दिए। गेट पर पहुंचते ही छोटी भाभी को देखा। भतीजी प्रिया और सक्षम भी बगिया में खेल रहे थे। रोहन भाग कर उन से मिलने गया। ‘अरे वाह! तो दुर्ग से भैया भी आए हैं, बड़े भैया-भाभी भी रायगढ़ से आए हैं। अच्छा तो बाबा ने सारा कुनबा ही इकट्ठा कर लिया है’ इंदु बुदबुदा उठी। बड़ी भाभी पहले से ही किचन में नाश्ते की तैयारी कर रही थीं। छोटी भाभी तब तक इंदु और शेखर के लिए चाय ले आई थीं। आज डायनिंग टेबल पर रौनक थी। छह कुर्सियों वाली डायनिंग टेबल भी छोटी पड़ गई थी। तीन कुर्सी और एक स्टूल अलग से सेट किया गया। बाबा का चेहरा तटस्थ था। पोहा खाने के बाद चाय का आख़िरी घूंट पीकर साइड में रख कर बैठ गए जैसे किसी के इंतज़ार में थे। ‘बच्चों! आज सबको इसलिए बुलाया है कि यह मकान मां के नाम था। मां के जाने के बाद इसका उतराधिकार हट गया है जिसे टाइटल ओपन होना कहते हैं।’ बाबा ने बिना कोई भूमिका के बात शुरू कर दी थी। सब चुप्प! तो बड़े भैया ने कहा, ‘बाबा आप अपने नाम पर रजिस्ट्री करवा लो।’ ‘मेरा क्या भरोसा! आज हूं, कल नहीं, फिर मेरे सामने ही बंटवारा हो जाए। मैं वसीयत करना चाहता हूं। तीन हिस्से कर लो’ एक दम सपाट शब्दों में बोलते हुए बाबा ने एक मोटी सी धूसर रंग की फ़ाइल रख दी थी। ‘तो इसलिए बुलाया था आपने बाबा!’ इंदु फट पड़ी थी। छोटी भाभी और बड़ी भाभी सोच में पड़ गई थीं। उनके चेहरे पर एक भाव आ रहा था, एक जा रहा था कि इंदु दीदी क्या बोलेंगी। ‘बाबा! अगर आप यह सोच रहे हैं कि मैं आपकी सम्पति में से हिस्सा लूंगी, तो भूल जाना’ इंदु के स्वर में तीक्ष्णता थी। ‘लेकिन बेटियों का बराबर का अधिकार होता है।’ छोटे भैया बोले। ‘हां! होता है भैया। लेकिन वो अधिकार ता-उम्र बेटी घर से लेती रहती है। शादी में दहेज के नाम पर, तो कभी वार-त्योहार के नाम पर, बच्चों के जन्म पर तो कभी भाइयों की शादी पर, बेटियां तो हमेशा ही लेती रहती हैं’ बोलते हुए इंदु का गला रुंध गया था। ‘बाबा! मैं तो आपके उपवन का वो पौधा हूं जो दूसरे उपवन में लगाया गया। और उस उपवन में भी तो कुशल माली होता है न, मुझे आपने शेखर जैसे कुशल माली के हाथों में सौंपा। कोई कमी नहीं आई मेरे जीवन में।’ इंदु की अश्रुधारा अविरल हो गई थी। शेखर इंदु से सहमति जताते सिर हिला रहे थे। बड़ी भाभी और छोटी भाभी डायनिंग टेबल पर कोहनी टिकाए बैठी थीं। ‘हां बाबा! आपको वसीयत लिखनी है ना तो मेरे नाम वो तमाम डायरियां लिख दो जिनमें आपकी शेरो-शायरियां लिखी हैं, वो नोट बुक्स दे दो जिनमें आपकी हस्तलिपि में ब्ल्यू-ब्लैक स्याही से मुकेश और रफ़ी के तमाम गाने लिखे हैं। वो एलबम लिख दो मेरे नाम जिनमें आपकी और मां की तमाम यात्राओं की ब्लैक एंड वाइट फोटो हैं। और आपका वो फिलेटेली एलबम जिसमें विश्व के सभी देशों के डाक टिकट हैं और आपका वो सिक्कों का संग्रह कर दो मेरे नाम बाबा!’ इंदु सुबक रही थी। ‘देना ही चाहते हो ना आप मुझे कुछ, तो मां के संदूक से चंद साड़ियां दे दो ताकि मैं मां की महक महसूस कर सकूं... और... और..’ इंदु की हिचकी बंध गई थी। ‘....और दे सको तो मुझे आपका वो ब्ल्यू चेक वाला कोट दे दो जिसमें छिपकर मैं आपकी गोद में सो जाया करती थी। बाबा! लिख दो ना ये वसीयत!’ इंदु से आगे बोला ना गया था। सबकी आंखें नम हो आई थीं। दोनों भाभियों की आंखों से भी अश्रुधारा बह रही थी। बाबा की आंखों से दो बूंदें उस धूसर फ़ाइल पर लुढ़क पड़ी थीं।

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