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बोधकथा 'मन का ना हो, तो क्यों हो अच्छा?':हम जैसा चाहें वैसा होता नहीं, आख़िर क्यों ऐसा होता है, एक किसान ने मन की करके जाना

8 दिन पहले
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एक बार एक किसान परमात्मा से नाराज़ हो गया। कभी बाढ़ आ जाए, कभी सूखा पड़ जाए, कभी धूप बहुत तेज़ हो जाए तो कभी ओले पड़ जाएं। हर बार किसी ना किसी कारण से उसकी फसल थोड़ी ख़राब हो जाती थी।

एक दिन तंग आकर उसने परमात्मा से कहा- ‘देखिए प्रभु, आप परमात्मा हैं, लेकिन लगता है आपको खेती-बाड़ी की ज़्यादा जानकारी नहीं है। एक प्रार्थना है कि एक साल मुझे मौका दीजिए, जैसा मैं चाहूं वैसा मौसम हो, फिर आप देखना मैं कैसे अन्न के भंडार भर दूंगा।’ परमात्मा मुस्कराए और कहा- ‘ठीक है, जैसा तुम कहोगे, वैसा ही मौसम दूंगा, मैं दखल नहीं दूंगा।’

किसान ने गेहूं की फसल बोई, जब धूप चाही, तब धूप मिली, जब पानी तब पानी! तेज़ धूप, ओले, बाढ़, आंधी तो उसने आने ही नहीं दी। समय के साथ फसल बढ़ी और किसान की ख़ुशी भी, क्योंकि ऐसी फसल तो आज तक नहीं हुई थी। किसान ने मन ही मन सोचा अब पता चलेगा परमात्मा को कि फसल कैसे तैयार करते हैं। बेकार ही इतने बरस हम किसानों को परेशान करते रहे।

देखते ही देखते फसल काटने का समय भी आ गया। किसान बड़े गर्व से फसल काटने गया, लेकिन जैसे ही फसल काटने लगा, एकदम से अपनी छाती पर हाथ रख कर बैठ गया। ये क्या? गेहूं की एक भी बाली के अंदर गेहूं नहीं था। सारी बालियां अंदर से ख़ाली थीं। बहुत दुखी होकर उसने परमात्मा से कहा- ‘प्रभु ये क्या हुआ?’ तब परमात्मा बोले- ‘ये तो होना ही था। तुमने पौधों को संघर्ष का ज़रा सा भी मौका नहीं दिया। ना तेज़ धूप में उनको तपने दिया, ना आंधी-ओलों से जूझने दिया। उनको किसी प्रकार की चुनौती का ज़रा-सा भी सामना नहीं करने दिया, इसीलिए सब पौधे खोखले रह गए।

जब आंधी आती है, तेज़ बारिश होती है और ओले गिरते हैं, तब पौधा अपने बल से ही खड़ा रहता है। वो अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष करता है और इस संघर्ष से जो बल पैदा होता है वो ही उसे शक्ति देता है, ऊर्जा देता है, उसकी जीवटता को उभारता है।’ किसान जान चुका था कि मनचाही ना होना, दरअसल, मज़बूत बनने का अवसर है।

सोने को भी कुंदन बनने के लिए आग में तपने, हथौड़ी से पिटने, गलने जैसी चुनौतियों से गुजरना पड़ता है, तभी उसकी स्वर्णिम आभा उभरती है, उसे अनमोल बनाती है।

प्रस्तुति- देवेंद्रराज सुथार

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