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बोधकथा 'जिह्वा को वश में रखना':अति प्रीतिकर की लत हो जाना स्वाभाविक है और लत का अति में तब्दील हो जाना भी, जो भली हो ही नहीं सकती

एक महीने पहले
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महादेव गोविन्द रानाडे प्रसिद्ध समाजसेवी नेता थे। उनके यहां उनके किसी मित्र ने एक दिन अच्छे आम भेजे। उनकी पत्नी ने आम धो-धो कर काट कर रानाडे के सम्मुख रख दिए। एक-दो टुकड़े खाकर उन्होंने स्वाद की प्रशंसा की और कहा, ‘इसे तुम भी खाकर देखो और सेवकों को भी दे देना।’

पत्नी ने देखा कि पति ने केवल दो-तीन टुकड़े ही आम के खाए हैं। उन्होंने पूछा, ‘आपका स्वास्थ्य तो ठीक है?’

रानाडे हंसे, बोले, ‘तुम यही तो पूछना चाहती हो कि आम स्वादिष्ट हैं फिर भी मैंने अधिक क्यों नहीं खाए? देखो, ये मुझे बहुत स्वादिष्ट लगे, इसलिए मैं अधिक नहीं लेता।’

‘यह अच्छा उत्तर है कि स्वादिष्ट लगे, इसलिए अधिक नहीं लेना है।’ पति की यह अटपटी बात पत्नी समझ नहीं पाई। रानाडे ने फिर कहा, ‘देखो, बचपन में जब मैं बम्बई में पढ़ता था, तब मेरे पड़ोस में एक महिला रहती थी। वह पहले सम्पन्न परिवार की सदस्या रह चुकी थी, किन्तु भाग्य के फेर से सम्पत्ति नष्ट हो गई थी। किसी प्रकार अपने और पुत्र के निर्वाह लायक आय रह गई थी। अनेक बार जब वह अकेली होती, तब स्वयं से कहा करती थी- मेरी जीभ बहुत चटोरी हो गई है, इसे बहुत समझाती हूं कि अब चार-छह साग मिलने के दिन गए।

अनेक प्रकार की मिठाइयां अब दुर्लभ हैं। पकवानों का स्मरण करने से कोई लाभ नहीं। फिर भी मेरी जीभ मानती ही नहीं। मेरा बेटा रूखी-सूखी खाकर पेट भर लेता है। किन्तु दो-तीन साग खाए बिना मेरा पेट नहीं भरता।’

रानाडे ने यह घटना सुना कर बताया -

‘पड़ोस में रहने के कारण उस महिला की बातें मैंने अनेक बार सुनी थीं। मैंने तभी से नियम बना लिया कि जीभ जिस पदार्थ को पसंद करे, उसे बहुत ही थोड़ा खाना। जीभ के वश में न होना। यदि उस महिला के समान दुख न भोगना हो तो जीभ को वश में रखना चाहिए।’

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