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  • It Is Not Enough Just To Give Medicines, Good Food And Money To The Elderly, They Also Expect Respect, Affection And Belonging From Us.

विमर्श:बुज़ुर्गों को सिर्फ़ दवाइयां, अच्छा खाना और रुपये देना ही पर्याप्त नहीं होता, उन्हें हमसे सम्मान, लगाव और अपनेपन की भी आशा होती है

प्राजक्ता मोदी10 दिन पहले
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  • वृद्धों को नज़रअंदाज़ करना, उन्हें ग़ुस्से में जवाब देना व शर्मिंदा करना भी दुर्व्यवहार की श्रेणी में शामिल है।

आपको कितनी बार कहा है कि मुझसे बिना पूछे मेरे किसी सामान को हाथ मत लगाया कीजिए। मेरे दोस्तों के आने पर आप अपने कमरे से बाहर मत आया कीजिए, उनसे बात मत किया करें, यह सब मुझे पसंद नहीं है। हर काम में रोक-टोक मत किया करें। इस तरह की बातें जब बच्चे या नाती-पोते घर के बुज़ुर्गों से कहते हैं, तो उनके मन को ठेस पहुंचती है। घर में होने वाला इस तरह का व्यवहार उन्हें अच्छा नहीं लगता है। ऐसे में कई बार बुलाने के बावजूद बुज़ुर्ग दूसरे शहर में रहने वाले अपने बच्चों के पास जाना पसंद नहीं करते हैं, तो कई बार संयुक्त परिवार में एक ही छत के नीचे रहकर भी दुखी रहते हैं।
दुर्व्यवहार के कारक
हमारे देश में बुज़ुर्गों को ही घर का मुखिया माना जाता है। बदलते समय के साथ संयुक्त परिवार एकल परिवार में तब्दील होते गए। पति-पत्नी और बच्चे के रूप में ही परिवार सिमट गया। ऐसे में बुज़ुर्ग या तो अपने पुश्तैनी घरों में बच्चों और परिवार से दूर रह गए, या जहां वे परिवार के साथ रहने लगे, वहां भी उनके हिस्से अकेलापन और दुर्व्यवहार ही आया। नई पीढ़ी और पुरानी सोच के टकराव से भी कई स्थानों पर दुर्व्यवहार उपजा है।

स्वतंत्रता का अधिकार
नई पीढ़ी नहीं चाहती है कि उनके जीवन में कोई भी किसी प्रकार का हस्तक्षेप करे। जब चिंता या समझाइश स्वरूप बड़े कुछ कहते हैं तो बच्चों को वो रोक-टोक या स्वतंत्रता के अधिकार का हनन प्रतीत होता है। तब वे चिढ़कर या ग़ुस्से में बड़ों को अक्सर ऐसा कुछ कह देते हैं कि जो बुज़ुर्ग मन पर लंबे समय के लिए टीस बनकर रह जाता है।

सोशल मीडिया
अधिकांश बुज़ुर्गों की यह शिकायत होती है कि बच्चे अपना ख़ाली समय मोबाइल या सोशल मीडिया पर अपरिचितों से बात करते हुए गुज़ार सकते हैं। लेकिन माता-पिता से बात करने का समय उनके पास नहीं होता है। बच्चे, नाती-पोते जब दफ़्तर, विद्यालय जाते हैं तो वृद्ध घर पर ही दिनभर अकेले रहते हैं। ऐसे में जब वे लौटते हैं तो घर के बड़ों को उम्मीद होती है कि वे सबसे बात करें, अपनी बात कहें। यहां मोबाइल बाधा बन जाता है।

हम सब जानते हैं
बुज़ुर्गों के प्रति हो रहे दुर्व्यवहार के पीछे एक कारण यह भाव भी है। वर्तमान पीढ़ी को लगता है कि वे सारी दुनिया को जानते-समझते हैं। चूंकि वृद्ध तकनीक को, पाश्चात्य सभ्यता को इतनी आसानी से आत्मसात नहीं कर पाते हैं, इसलिए वे उनकी नज़रों में पुराने हैं। ऐसे में उनकी अधिकांश नसीहतों को यह कहकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है कि- ‘आपको कुछ नहीं पता।’

आख़िर समाधान क्या है?
कर्म का सिद्धांत कहता है कि ‘जैसा आप बोओगे, वैसा काटोगे’। जिस चक्र में आप नई पीढ़ी के स्थान पर हो, उसी चक्र में आने वाले समय में आपको दूसरे पक्ष का मोर्चा संभालना होगा। ऐसे में यही बर्ताव आपके साथ भी हो सकता है। इसलिए बहुत ज़रूरी है कि समय रहते नूतन पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के इस अंतर को पाट दिया जाए।

बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन होता है
इस कथन की मन में गांठ बांध लें। अपने घर के वरिष्ठों से बच्चों की तरह पेश आएं। याद करें कि बचपन में आपके माता-पिता ने आपको कितने प्यार से रखा था। ग़लती करने पर भी कई बार प्यार से पुचकारा था, बेवजह कभी ग़ुस्सा नहीं किया था। यही व्यवहार अब आपका उनके प्रति होना चाहिए। जहां कहीं वे लड़खड़ाते हैं, तो अब आपको उन्हें संभालना होगा।

आपके वक़्त में हो उनका हिस्सा
बीते वक़्त में जिस प्रकार बच्चों, पत्नी, मित्र, परिजन, सभी का थोड़ा-थोड़ा भाग होता है, वैसे ही वर्तमान की आवश्यकता है कि आज जिनकी वजह से आप हैं, उन्हें भी आपके वक़्त का कुछ अंश मिले। कुछ समय के लिए बुज़ुर्गों से बात करें, अपनी परेशानियों को साझा करें। ऐसा करने के बाद आप भी अच्छा महसूस करेंगे।

पहली-तीसरी पीढ़ी की मैत्री
यदि आप घर के बड़ों को समय नहीं दे पा रहे हैं तो कोशिश करें कि आपके बच्चे दादा-दादी, नानी-नानी के साथ ज़्यादा समय बिताएं। ऐसा करने से आपकी चिंता भी दूर हो जाएगी और उनका अकेलापन भी मिटेगा। बचपन से बच्चों के मन में इस बात का बीज डालें कि घर के बड़े, उनके माता-पिता के जन्मदाता हैं, इसलिए उनका महत्व और सम्मान सदैव अधिक ही रहेगा।

क़ानून का सहारा नहीं लेते बुज़ुर्ग
कई परिवारों में बच्चों का रवैया बुज़ुर्गों के प्रति इतना ख़राब हो जाता है कि क़ानून की सहायता के इतर कोई विकल्प शेष नहीं रहता है। इसी संदर्भ में भारत सरकार द्वारा 2007 में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम (वरिष्ठ नागरिक अधिनियम) देश में लागू किया गया था। आंकड़ों के मुताबिक, समाज में 10 प्रतिशत से भी कम बुज़ुर्ग दुर्व्यवहार की शिकायत दर्ज करवाते हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि मामलों में इतनी कमी है।
मनोविशेषज्ञ ज्योति शर्मा कहती हैं कि बच्चे कपूत ही क्यों न हों, माता-पिता के मन में उनके लिए हमेशा प्रेम होता है और उनमें बदलाव की उन्हें उम्मीद रहती है। एक दूसरा बिंदु यह भी है कि बुज़ुर्गों के लिए समाज में मान-सम्मान बहुत मायने रखता है और शिकायत दर्ज करने व कानून की सहायता लेने में उनकी यह धारणा भी रहती है कि परिवार का नाम ख़राब होगा। और तीसरा, उम्र के इस पड़ाव पर अकेले कोर्ट-कचहरी के चक्कर भी उनके लिए संभव नहीं होते।

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