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  • It Is Not Only Necessary To Put On A Mask But It Is Also Our Responsibility, Not To Fulfill This Responsibility Is A Big Reason For The Current Tragedy.

बात पते की:मास्क लगाना सिर्फ़ ज़रूरी ही नहीं है बल्कि ये हमारी ज़िम्मेदारी भी है, इस ज़िम्मेदारी का पालन ना करना ही मौजूदा त्रासदी का एक बड़ा कारण है

सीताराम उपाध्यायएक महीने पहले
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  • निजी जमावड़ों में कहीं-कहीं मास्क लगाने वाले को क्या-क्या सुनना पड़ता है, वहां मास्क लगाने के बारे में लोग क्या राय रखते हैं, इसका गवाह बना व्यक्ति बता सकता है कि मौजूदा त्रासदी का एक बड़ा कारण क्या है।

पिछले महीनों में कोरोना के दौर में भी शादियों का आयोजन होता रहा था। भले ही पाबंदियां थीं, लेकिन हम भारतीय लोग पूर्णत पांबद हो जाएंगे, यह कहना और सुनना दोनों ही मुझे तो हास्यास्पद लगता है। उन दिनों मैं अपने दोस्त की शादी में घृतपान की रस्म में गया, जिसे शहरी परिवेश में हल्दी की रस्म भी कहते हैं। घर मोहल्ले में ही था तो मैं थोड़ा जल्दी चला गया। घर में प्रवेश से पहले मैंने अपना मास्क ढंग से लगा लिया। उम्मीद थी कि वहां आए हुए लोगों ने मास्क लगा रखे होगें, पर अंदर जाकर देखा तो दंग रह गया। भीतर क़रीब 30-35 लोग थे, पर एक ने भी मास्क नहीं लगाया हुआ था। मास्क थे ज़रूर सबके पास, कुछ के ठोढ़ियों पर तो कुछ के हाथों में और शेष जो बचे उनकी जेबों में हों, तो कह नहीं सकता। मैं तो उनको देखकर ख़ाली हैरान ही था पर वहां हर कोई मुझे ऐसे ताक रहा था जैसे मैं कोई दूसरे ग्रह से आया होऊं। शायद बेवकूफ भी समझ रहे हों। धीरे-धीरे आने वालों की संख्या बढ़ने लगी। मैं उनमें कोई अपने जैसा तलाश रहा था तभी एक व्यक्ति आया जो मास्क लगाए हुए था। एक राहत की सांस ली कि चलो एक से दो तो हुए। मैं यह सोच ही रहा था कि एक भाई साहब मेरे बगल से निकलते हुए कहते हैं-‘ओ हो मास्क-धास्क काम पक्का है।’ दूसरा एक लड़का बोला ‘क्या तेरा मास्क से दम नहीं घुटता? मैं तो बाज़ार जाते वक़्त केवल पुलिस को देखकर लगाता हूं तो भी अटपटा लगता है।’ और तीसरा तो बड़ा हसोड़ निकला। हंसते हुए बोला -‘क्या बात है सीताराम, तुम तो सोते हुए भी मास्क लगाए रखते होगे।’ मैंने किसी को जवाब नहीं दिया क्योंकि मुझे पहले ही अंदेशा हो गया था कि मास्क लगा होने के कारण मुझे कोई टोकेगा ज़रूर, इसलिए मैं ऐसी बातों के लिए तैयार था और मैं यह भी स्पष्ट कर दूं कि वहां आए लोग कोरोना से बेखबर थे या देश-प्रदेश के हालात से अनजान थे, ऐसा कुछ नहीं था। चर्चा भी कोविड की ही हो रही थी। सब एक से बढ़कर एक डिबेटर थे पर अपनी बातों से जैसे महामारी की भयावहता को ठेंगा दिखा रहे थे। एक कह रहा था, ‘मैं कल ही आया हूं बाहर से पर मैंने न वहां जांच करवाई, न यहां आकर करवाई क्योंकि यह डॉक्टर लोग जाते ही कह देंगे पॉजिटिव है। अगर किसी को शिकायत करनी है प्रशासन से तो शौक़ से करे।’ इस पर सब ठहाका लगाकर हंस पड़े। अब ऐसे माहौल में मैं समय बिताने की जद्दोजहद कर रहा था। जो एक महाशय जी आए थे न मास्क लगाए वो भी मास्क को ठोढ़ी पर खींच भीड़ में शामिल हो गए।

अब मेरे पास भी दो ही विकल्प थे पहला मैं भी बेमास्क हो जाऊं और दूसरा वहां से निकल लूं। वैसे मेरे दोस्त ने कह रखा था कि खाना खाकर और थोड़ा काम में हाथ बंटाकर बाद में जाना पर मैं घृतपान की रस्म होते ही फटाक से वहां से निकल लिया। रास्ते में कई विचार आ रहे थे क्या मैं वहां अजीब लग रहा था। मुझे देखकर लोग शायद यह सोच रहे हों कि मैं कुछ ज़्यादा ही समझदार बन रहा था या फिर दिखावा कर रहा था, ऐसे तरह-तरह के ख़्याल आ रहे थे मन में कि तभी पास ही मंदिर में शंख-नगाड़े बजने लगे। मेरा ध्यान टूटा और देखा कि सामने ही एक मंदिर में संध्या आरती हो रही थी। मैं मन को हल्का करने अनायास ही मंदिर में चला गया। मंदिर में जाते ही मन एकदम शांत हो गया इसलिए नहीं कि देवप्रतिमा के दर्शन हो गए बल्कि इसलिए कि वहां उपस्थित पुजारी जी सहित अन्य चारों सज्जनों ने अच्छी तरह से मास्क लगा रखा था और उचित दूरी पर खड़े थे। मैंने आंखें मूंद लीं और मन की संतुष्टि की अनुभूति करने लगा। लगा मानो भगवान ही ने यह संकेत देने के लिए कि तुम मास्क लगाने वाले अल्पमत में भले ही हो पर दूसरे ग्रह से नहीं हो इसीलिए मुझे मंदिर में खींंच लाए हों। मैंने प्रभु से इस संकट से निकलने के लिए लोगों को शक्ति और सदबुद्धि दोनों देने की प्रार्थना की। ‘बेटा, प्रसाद लो’ पुजारी जी की आवाज़ से मैंने आंखें खोलीं तो पाया पुजारी जी साबुत फल प्रसाद में देने को खड़े थे। इस दौर में यही सुरक्षित भी है। प्रसाद लेकर मैं प्रसन्न मन से घर लौट आया।

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