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सीख:सिर्फ़ अंकों की होड़ या दिखावे के कारण बच्चों पर पढ़ाई का दबाव बनाना ठीक नहीं है, ज़रूरी है उनकी नींव को मज़बूत करना

अनुपमा तिवाड़ी, शिक्षाविद16 दिन पहले
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  • प्रतियोगिता के इस दौर में कई अभिभावकों के लिए उनके बच्चे का नामी-गिरामी स्कूल में प्रवेश पा लेना ही बड़ी सफलता होती है। फिर उसके बाद शुरू होता है अंकों की दौड़ का सफ़र।

विद्यालय में आयोजित शिक्षक-अभिभावक मीटिंग में मिले फीडबैक के आधार पर अभिभावक बच्चे के लिए होमवर्क, ट्यूशन और फिर रटंत विद्या पर ज़ोर देकर जैसे-तैसे स्कूल की अपेक्षाओं को पूरा करने में लग जाते हैं। कोई बच्चा किसी एक विषय में कमज़ोर हो सकता है तो दूसरे में अच्छा। ऐसे में अभिभावक उसके कमज़ोर विषय के लिए टयूशन लगवाकर भरपाई की कोशिश करने लगते हैं। सीखना कोई ऐसी चीज़ नहीं कि किसी एक विषय को सीखने लिए एक दवाई हो और दूसरे विषय के लिए दूसरी। अभिभावकों को बच्चे के बुनियादी ज्ञान को देखना होगा कि वह वास्तव में क्या जानता है? उसे नई अवधारणा सीखने में दिक़्क़त क्यों आ रही है? यदि नींव ही कमज़ोर होगी तो उस पर खड़ी इमारत जल्दी ही भरभराकर गिर जाएगी। सीखना समग्रता में होता है। शोध बताते हैं कि बच्चे के सीखने के लिए अनेक घटक काम करते हैं। इसलिए अभिभावकों को बच्चे को व्यक्तिगत रूप से समझना होगा।

बच्चे की क्षमताएं भी पहचानें
यह समझना ज़रूरी है कि प्रत्येक बच्चे की मानसिक क्षमता, विभिन्न विषयों की प्रकृति और बच्चे की रुचि के अनेक कारण होते हैं। कई बार तो शिक्षक के शिक्षण कार्य और व्यवहार के अच्छे होने से ही बच्चे को वह विषय अच्छा लगने लगता है। अभिभावकों को इस बात की चिंता छोड़ देनी चाहिए कि किसी का बच्चा गणित में अच्छा है तो उनका क्यों नहीं? शोध बताते हैं कि बच्चे के मस्तिष्क का एक भाग गणित और तार्किक चीज़ों को हल करने के लिए अधिक प्रभावी होता है तो दूसरा भाग कलाओं और कल्पना वाली चीज़ों के लिए प्रभावी होता है। आज तो शिक्षा और रोज़गार में बहुत से नए आयाम खुले हैं। ऐसे में यह तो ज़रूरी नहीं कि सभी बच्चे डॉक्टर या इंजीनियर ही बनें। कोई बच्चा अच्छा खिलाड़ी बन सकता है, तो कोई अच्छा कलाकार। कोई बेहतर समाज के लिए भी कार्य कर सकता है। इसलिए अपने बच्चों की अन्य बच्चों से तुलना करना या उनके होने जैसी अपेक्षा करना बेमानी है।

सीखने के लिए ज़रूरी है माहौल
किसी भी कार्य को सीखने के लिए एक सौहार्दपूर्ण वातावरण बहुत ज़रूरी है। अनेक शिक्षाविदों और बाल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि दंड और भय किसी भी तरह सिखाने में बच्चों की मदद नहीं करते। जब बच्चों को किसी भी तरह का दंड दिया जाता है तो उनके शरीर से निकलने वाले कुछ हॉर्मोन्स मस्तिष्क में डर का संकेत भेजते हैं और ऐसा बार-बार होने पर उनके मस्तिष्क के सैकड़ों न्यूरॉन्स धीरे-धीरे नष्ट होने लगते हैं, जिससे बच्चे के मस्तिष्क में स्मृति के लिए जि़म्मेदार तंत्रिकाएं एक समय के बाद काम करना बंद कर देती हैं। एक समय ऐसा आता है कि बच्चे सीखने से डरने लगते हैं। फिर चाहे पढ़ाई से संबंधित कुछ नया सीखना हो या कुछ रचनात्मक सीखने की बात हो। वे कुछ भी नया सीखने से सकुचाते हैं। एक स्वस्थ और सकारात्मक वातावरण ही बच्चे को सिखाने में मददगार होता है। इसलिए अब कई विद्यालय बच्चों के मूल्यांकन में बच्चे ने क्या सीखा है इसे प्रमुखता से रेखांकित कर रहे हैं।

विषयों के साथ समग्रता में काम हो
हम अपने जीवन को देखें तो पाएंगे कि वह विषयों की तरह बंटा हुआ नहीं है। इसलिए विषयों को एक साथ समेकित करके शिक्षण कार्य करवाने की बात ज़ोर देकर की जाने लगी है। विद्यालयों में प्रोजेक्ट कार्य इसका अच्छा उदाहरण है। किसी प्रोजेक्ट पर काम करते समय बच्चे जब उसके बारे में खोजबीन कर कर रहे होते हैं तब वे उसका इतिहास जान रहे होते हैं। जब आंकड़ों को जान रहे होते हैं तब वे गणित और विज्ञान विषय पर काम कर रहे होते हैं और जब वे लिख रहे होते हैं तब भाषा पर काम कर रहे होते हैं। यूं समग्रता में सीखना बच्चों को सीखने के प्रति आत्मनिर्भर बनाता है। स्वयं देखने, खोजने, विश्लेषण करने और निष्कर्ष तक पहुंचने के कौशलों का विकास करता है। इसके अलावा भ्रमण करना, बाल पत्रिकाएं पढ़ना, समाचार पत्र पढ़ना, थियेटर करना बच्चों को बहुत कुछ नया सिखाता है। अभिभावक जब सीखने का वातावरण व अवसर उपलब्ध करवाते हैं तो बच्चों की क्षमताएं भी बढ़ती हैं।

जीवन मूल्यों को अहमियत दें
बच्चे सीखें और आत्मनिर्भर हों लेकिन जीवन जीने के लिए मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देना ज़रूरी है। हम आने वाली पीढ़ी को एक बेहतर नागरिक के रूप में आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं। बच्चों में शिष्टाचार, प्रेम, संवेदनशीलता सभी कुछ होना ज़रूरी है और वे इन्हें अपनाना भी चाहते हैं, बशर्ते उन्हें सही तरीक़े से सिखाया जाए। साथ ही हमें भी यह विश्वास करना होगा कि प्रत्येक बच्चा जानना और सीखना चाहता है, वरना वह चलना भी नहीं सीख पाता और बोलना भी नहीं। हम अपने आसपास साइकल चलाना सीखते हुए बच्चों को देख सकते हैं। घड़ी में समय देखना और चीज़ों को गिनना सीखना भी देख सकते हैं। माता-पिता अगर संयम बरतें तो बच्चे अपने कमज़ोर विषय को भी प्रयासों द्वारा मज़बूत कर सकते हैं, लेकिन सिखाने की जल्दबाज़ी और होड़ उनकी सीखने की इच्छा को ही ख़त्म कर देती है। इसलिए बच्चों का साथ दें और उनकी नींव पक्की करने में मदद करें। किसी भी प्रकार की होड़ या दिखावे में बच्चों को न उलझाएं।

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