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आमुख कथा:इस कठिन दौर में ख़ुशियों की तलाश करते रहें, जो पास है उसका आभार मानिए, व्यस्त रहिए

सुनील अवसरकर, - डॉ. एलेन सूज़ेन16 दिन पहले
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  • दौर कठिन है, हालात डराने वाले हैं, ऐसे में मन को शांत बनाए रखना मुश्किल ज़रूर है, लेकिन दुर्लंघ्य को लांघना ही तो मानव की ताक़त है।
  • इस समय में भी ख़ुशियों का दामन थामा जा सकता है।

पिछले साल से हम सभी एक कठिन दौर से गुज़र रहे है। हमारी जीवनशैली में बड़ा बदलाव आया है। बढ़ता संक्रमण, बार-बार लगने वाला लॉकडाउन, जीवन और मृत्यु से संघर्ष करते अपने लोग, नौकरी और व्यवसाय में अस्थिरता से लोगों में मानसिक सेहत प्रभावित हो रही है। एक अदृश्य वायरस ने हमारी ख़ुशी और आनंद को भी संक्रमित कर दिया है।

मनुष्य आनंद के लिए बना है- दलाई लामा

भयग्रस्त करने वाली ख़बरें, दुख का माहौल, पाबंदियों, लॉकडाउन के बाद भी घर से बाहर निकलना और काम करना हमारी ज़रूरत होगी। आज असुरक्षा का अनजाना भय हमें घेरे हुए है जो तनाव बढ़ा रहा है। पर प्रकृति ने हमारा निर्माण सदा तनाव में रहने के लिए नहीं किया है। वास्तव में मनुष्य आनंद के लिए बना है।

पानी चाहे गर्म होकर भाप बने या ठंडा होकर बर्फ पर हर बार अपने मूल स्वरूप में लौटता है जो तरल और शीतल होता है। दलाई लामा कहते हैं हम कितनी ही तकलीफ या तनाव से गुज़रे हो, हम मनुष्यों का भी मूल स्वभाव शांत और प्रसन्न रहना है।

मानसिक उलझनों, तनाव और कठिन समय के मध्य ही हमें ख़ुश होने के बहाने ढूंढने पड़ेंगे।

आभार जताइए

धन्यवाद या थैंक्यू ऐसे जादुई शब्द हैं जब ज़ुबां से निकलते हैं तो सामने वाले के चेहरे पर मुस्कान लाते ही हैं। प्रसन्न रहना है तो किसी की छोटी-सी मदद पर इन शब्दों को बोलने की आदत डालिए। सुबह उठते ही पहले दो मिनट ठहरकर पिछले दिन हुई तमाम अच्छी बातों के लिए मन में ईश्वर, मित्रों और परिवार का आभार मानिए। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया’ की प्रार्थना तो हमारी उदार संस्कृति का मूल आधार है। जो हमारे पास है उसके प्रति कृतज्ञता और आभार की प्रवृत्ति हमारी ख़ुशी को बढ़ाने का काम करती है और अभावों से ध्यान हटाती है।

व्यायाम और ध्यान सहायक हैं

ध्यान और व्यायाम आपके तनाव को काफ़ी हद तक कम करते है। 74 वर्ष के बौद्ध भिक्षु मैथ्यू रिकार्ड को दुनिया का सबसे ख़ुश व्यक्ति माना जाता है। वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि जब मैथ्यू दया पर आधारित ध्यान करते हैं तो उनके दिमाग़ में गामा तरंगें पैदा होती हैं जो उनकी ख़ुशी को बढ़ाती हैं। हैरानी की बात यह है कि मैथ्यू को ख़ुश होने का यह गुर भारत की धरती पर ही मिला है। हल्के व्यायाम, स्ट्रेचिंग, थोड़ी चहलकदमी या दिन में 4-5 गहरी सांसें लेना आपके स्वास्थ्य में सुधार करते हैं। किसी भी तरह की कसरत जैसी गतिविधि तनाव दूर करने में सहायक होती है।

मदद कीजिए

ख़ुश होने का सबसे कारगर तरीका है – मदद करना। मुसीबत, अवसाद या तनाव में किसी के स्नेह भरे हाथ की बहुत ज़रूरत महसूस होती है। आज लोग होम क्वारंटाइन हैं, परेशान हैं, ऐसे ही लोगों का सहारा बनकर देखिए, उन्हें पूछिए, छोटी-छोटी सहायता की पेशकश कीजिए आप ख़ुुशी महसुस करेंगे। अद्भुत होता है देने का सुख।

मित्रों संग हंसिए, बतियाइए

मित्र ऐसा टॉनिक हैं तो ज़िंदगी की जंग में ताक़त देते है। राह की रोशनी होते हैं दोस्त जीवन में। वे जब भी आप बतियाते है तो आप ज़्यादा ख़ुश होते हैं और ज़्यादा बार हंसते भी हैं। हंसने से तात्कालिक प्रभाव यह होता है तनाव दूर होता है। रोज़ कुछ देर हंसने वाली बातें या काम करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

व्यस्त रहिए, व्यवस्थित रहिए

स्वयं को व्यस्त एवं व्यवस्थित रखेंगे तो अपने आप को ज्यादा ख़ुश रख पायेंगे और बेहतर महसूस करेंगे। अधिकतर लोग लॉकडाउन में घर में हैं तो अपने आप को किसी गतिविधि, शौक़ या बातचीत में शामिल कीजिए। संगीत सुनिए, पेंटिंग कीजिए, खाना बनाइए या ऑनलाइन कोई हुनर सीखिए। ऐसा करने से आपका ध्यान बुरी घटनाओं से हटकर अच्छी बातों में लगता है जिससे तनाव कम होता है। हर वो गतिविधि जो आपको ख़ुुशी दे वह आपके लिए ख़ास है। इसी तरह घर पर हैं तो अपनी वस्तुओं और अपनी आदतों को व्यवस्थित कीजिए। व्यवस्थित दिनचर्या आपको राहत और सुकून देगी।

गैजेट्स का सीमित उपयोग

मोबाइल और टीवी के बिना जीना इन दिनों मुश्किल है। पर ख़ुुश रहना है तो दिन में कुछ देर तकनीक से अपने आपको डिटॉक्स कीजिए। सुबह उठने के बाद और सोने से पहले एक या दो घंटे गैजेट्स से दूरी बना सकते हैं। सोशल मीडिया पर आपको सकारात्मक व सच बातें कम और उलझाने व गफ़लत वाली पोस्ट ज़्यादा मिलती हैं। वैज्ञानिक तौर पर यह उपकरण शरीर की आंतरिक कुदरती घड़ी व नींद के लिए ज़रूरी मेलाटोनिन के उत्पादन को भी रोकते हैं। हर अच्छी और शांत नींद आपकी ख़ुशी बढ़ाने में मददगार होती है। इसलिए गैजेट्स से दूरी बनाइए।

मदद कीजिए, मित्रों से बतियाइए, अपनों का साथ दीजिए, घर में मदद कीजिए, व्यायाम करें, हंसें, मुस्कराएं.... कठिन वक़्त है, पर निकल ही जाएगा।

डर कैसे दुश्मन है?

मन कमज़ोर हुआ, तो शरीर भी कमज़ोर होता चला जाएगा। और डर मन को दुर्बल करता है। सावधान रहें, सचेत रहें, लेकिन तनाव उत्पन्न करने वाले भय को दूर रखें।

इस समय हमारा पूरा ग्रह एक डर की गिरफ्त में है। एक साल से हम शरीर की रक्षा करने के सबक़ सीख रहे हैं - मास्क, सैनेटाइज़र, दो गज़ की दूरी। यह अब भी उतना ही ज़रूरी है, लेकिन अब मन की रक्षा भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हो चुकी है।

हम डर के साए में होते हैं, तो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर हो जाती है। हमारा शरीर जब सामान्य रूप में कार्य करता है, तो पूरे शरीर को कोशिकाएं रोगाणुओं, जीवाणुओं आदि के हमलों से निपट सकता है, लेकिन जैसे ही यह डरता है, नकारात्मक होता है, तो कॉटिसोल नाम का एक स्ट्रेस हॉर्मोन स्रावित करता है, जो एक हद तक तो मदद करता है, लेकिन ज़्यादा मात्रा में हो, तो रोगों से लड़ने की ताक़त को कम कर देता है।

एक हालिया शोध में बताया है कि हम आजकल हर थोड़ी-थोड़ी देर में कभी सोशल मीडिया पर, तो कभी अन्य ख़बरों से, तो कभी ख़ुद ही नकारात्मक बातें करके छोटे-छोटे कॉर्टिसॉल लम्हे बना रहे हैं, जो बहुत ज़्यादा ख़तरनाक साबित हो सकते हैं। दिन-भर में ऐसे 60,000 से ज़्यादा नकारात्मक विचार (और उनका दोहराव) हमारे मन को थर्रा रहे हैं। ऐसे में कमज़ोर पड़ती रोग प्रतिरोधक क्षमता हर तरह के रोग व संक्रमण के लिए द्वार खोल सकती है।

बच्चे मुश्किल में हैं

छोटे बच्चों के लिए मुश्किलें बढ़ रही हैं। पिछले एक साल से वे स्कूल, खेलों के मैदान, दोस्तों और सामान्य ज़िंदगी से दूर हैं। पढ़ाई का नया ऑनलाइन तरीक़ा भी उन्हें बहुत रास नहीं आ रहा है। वे ख़ुद तो परेशान हैं ही, साथ ही वे बड़ों के तनाव को भी जल्दी महसूस कर लेते हैं और उन्हीं के स्तर तक ख़ुद भी तनावग्रस्त हो जाते हैं। बचपन का यह तनाव बड़ी उम्र तक गहरे असर पैदा कर सकता है। इसे अर्ली लाइफ स्ट्रेस कहते हैं, जो बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा और दूरगामी असर डाल सकता है।

इसलिए बच्चों के साथ खेलिए, उनकी पढ़ाई में मदद कीजिए, उनके साथ व्यायाम कीजिए ताकि वे फिट रह सकें, ख़ुश रहें और उम्मीद से भरे भी।

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