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सांस पर नियंत्रण तो जीवन पर नियंत्रण:सांस से जुड़ी है जीवन की डोर, जानें सांस लेने का सही तरीका और अभ्यास

अजिता मिश्र2 महीने पहले
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  • यह उक्ति कितनी सच्ची और कारगर है, कोरोना काल ने हमें समझा दिया है।
  • सही ढंग से ली गई सांस दिल और फेफड़ों को ही नहीं शरीर के हर हिस्से के लिए प्राण की सूचना लेकर दौड़ती है।
  • सांस पर नियंत्रण कैसे पाया जाए, आइए सीखते हैं।

सांस की डोर जीवन की डोर है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन फिर भी अगर इसको विस्तार से, विज्ञान के दृष्टिकोण से समझना चाहें, तो...

  • सही ढंग से ली गई सांस हमारे शरीर में फैली लगभग एक लाख मील लम्बी रक्त वाहिनियों को प्रभावित कर सकती है।
  • सांस लेने का ढंग शरीर की हर कोशिका को कितनी आक्सीजन मिलेगी, यह तय करता है।
  • बच्चे के रूप में किस तरह सांस लेने की आदत डाली है, इससे निर्धारित होता है कि वयस्क अवस्था में चेहरे की बनावट कैसी होगी।
  • सांस का प्रकार आपकी बेचैनी बढ़ा सकता है और आपके मन को शांत भी कर सकता है।
  • लोअर एअरवेज़ यानी फेफड़ों के निचले तंत्र पर नियंत्रण बनाने में मदद करती है नियंत्रित श्वसन प्रणाली। यह कार्य आसान नहीं होता।

सांस लेने की गड़बड़ी के लक्षण

मुंह से सांस लेना, सांस का तेज़ चलना, सांस की आवाज़ आना, अक्सर नि:श्वास छोड़ना, गहरी सांस लेकर जम्हाई लेना, बोलने से पहले गहरी-गहरी सांसें लेना।

मुंह से सांस लेने के लक्षण

मुंह का सूखना, सोते समय खर्राटे लेना, नींद का बार-बार खुलना, सोते समय सांस का बाधित होना, सुबह उठते समय मुंह का सूखा होना, सुबह उठने पर नाक का बंद होना, खांसी और सांस का उखड़ना।

नाक से सांस लेना क्यों ज़रूरी है?

नाक से सांस लेने पर नाक में उपस्थित रोम एवं म्यूकस अंदर आने वाली हवा को फिल्टर करते हैं। वहीं नाक के अंदर रीलीज़ होने वाली नाइट्रिक ऑक्साइड रोगाणुओं और पर्यावरण जनित रोगों को मारने में सक्षम होती है। इससे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर काम कर पाती है। यह प्रक्रिया सीज़नल फ्लू और एलर्जी से हमारी रक्षा करती है।

जब हम नाक से सांस लेते हैं, तो सांस की धीमी गति के कारण हमारे फेफड़े अधिक मात्रा में आक्सीजन अवशोषित करते हैं। नाक से सांस लेते वक़्त हम जिस मात्रा में सांस लेते हैं, उसी मात्रा में छोड़ते हैं। इससे दो फायदे होते हैं -

  • हमारे फेफड़ों में हवा का अत्यधिक मात्रा में संग्रह नहीं होता। हम फेफड़ों को अच्छी तरह ख़ाली कर पाते हैं, जिससे अगली सांस बेहतर होती है।
  • नाक से सांस लेने पर हम अपने शरीर का कार्बन डाय ऑक्साइड का स्तर बनाए रख पाते हैं। आम सोच से विपरीत कार्बन डाय ऑक्साइड बहुत उपयोगी गैस है। यह हमारे वायुमार्ग को खुला रखने में सहायक है।

श्वसन का सही तरीका और अभ्यास

  • नाक से सांस लें।

सांस पर ध्यान लगाएं। दिन में ऐसा एक-दो बार तो ज़रूर करें। सांस को धीमे-धीमे लेकर, धीरे से छोड़ने का अभ्यास करें। हल्की और धीमी सांस लें। इसके लिए दो व्यायाम भी कर सकते हैं। पहला, नाक से ठंडी वायु के प्रवेश पर ध्यान लगाएं और फिर गर्म श्वास के बाहर निकलने पर। दूसरे में, तीन तक गिनती गिनते हुए सांस को नाक से भीतर लें, दो तक गिनते हुए सांस को रोकें और फिर पांच तक गिनते हुए सांस को बाहर छोड़ें। इससे रक्तचाप को कम करने में मदद मिलती है, किसी शारीरिक गतिविधि के दौरान उखड़ी सांस पर काबू पाने में सहायता होती है और रक्त का ऑक्सीजन सैचुरेशन बेहतर होता है।

सांस डायफ्राम के संग लें। डायफ्राम श्वास की मुख्य मांसपेशी होती है, जो एक छतरी की सीने और पेट के बीच मौजूद होती है। डायफ्राम के संग सांस लेने को बेली ब्रीदिंग भी कहा जाता है। इसके अभ्यास के लिए पीठ के बल लेट जाएं, पैरों को हल्का-सा मोड़ें। पेट पर एक किताब रखें और पांच तक गिनते हुए नाक से सांस लें और पांच तक गिनते हुए छोड़ें। ध्यान इस पर देना है कि सांस लेते समय किताब ऊंची हो जाए और छोड़ते समय नीचे आए। किताब की गति को जितना कम कर सकें, उतना बेहतर होगा। इस अभ्यास को पंद्रह मिनट के लिए संभव हो तो दिन में दो बार करें। रात को सोने से पहले करने से नींद की गुणवत्ता बहुत बेहतर हो जाएगी। इस अभ्यास को उन लोगों को ज़रूर करना चाहिए जिन्हें व्यग्रता, बेचैनी और उलझन होने की शिकायत रहती हो।

सांस सुसंगत करें। यह हृदय रोगियों के लिए बेहद फायदेमंद अभ्यास है। आमतौर पर हम तीन सेकंड में ही नाक से सांस लेकर छोड़ देते हैं यानी श्वसन का समय बहुत कम होता है। सांसों के समन्वय में पांच सेकंड तक नाक से सांस को भीतर लेने का अभ्यास करना होता है, जिसके दौरान पेट के फूलने और धड़ यानी कंधों और सीने के फैलने को अनुभव करें। फिर पांच सेकंड तक सांस छोड़ें जिस दौरान पेट के पिचकने और धड़ के सिकुड़ने को महसूस करें। इससे सांस का चक्र दस सेकंड का हो जाएगा, जो हर मिनट की छह सांस के बराबर होगा।

शुरूआत अगर पांच सेकंड से ना कर पाएं, तो तीन से शुरू करें। लेकिन ध्यान रखें कि सांस लेने और छोड़ने का समय समान होना चाहिए। इस अभ्यास से सांस की गति पर नियंत्रण पाया जा सकता है। पैल्पिटेशन के कारण बढ़ी हृदय गति में यह श्वसन लाभप्रद है।

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