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एस. भाग्यम शर्मा:मां सिर्फ़ जन्म देने वाली ही नहीं होती बल्कि सास भी मां होती है, ये गौरव ने भली भांति बता दिया था

संस्मरणएक महीने पहले
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  • गौरव को वीणा पसंद आई, लेकिन उसने घर जंवाई बनकर, अपनी मां को छोड़ना गवारा नहीं किया। मुद्दा आत्मसम्मान को नहीं बना रहा था वो। उसने कहा कि उसका एक भाई और है, लेकिन अपनी मां का वो इकलौता बेटा है। क्या था इसका राज़?

न्यूज़पेपर पढ़ते हुए अदरक की चाय को स्वाद लेकर पी रहे गौरव के पास आकर बैठीं राधा। ‘क्यों मां काम सब ख़तम हो गया क्या?’ ‘रसोई का काम तो ख़तम हुआ पर ये जो कर्तव्य हैं ये पूरे ही नहीं हो रहे हैं।’ ‘अरे! सुबह-सुबह ही आप शुरू हो गईं। कितनी बार कहने पर भी आप नहीं मानोगी क्या? बड़े ज़ोर शोर से शुरू हुआ मेरा गृहस्थ जीवन सिर्फ़ थोड़े दिनों में ही ख़तम हो गया। उसे ही मैं पचा नहीं पाया। फिर से अगले की तैयारी बोलो तो कैसे हो मां? ये मुझसे नहीं होगा?’ ‘बेटा, क्या जीवन हमेशा ही ख़ुश व संतुष्ट रहने का नाम है? रोज़ सुबह सूरज उगता है व शाम को डूब जाता है ना? पर मेरा जीवन डूब गया कहकर सूर्य अगले दिन बिना उगे रहता है? प्रिया के जाने का दुख तो हमें बहुत ज़्यादा है। उसके बराबर का दुख और कुछ नहीं है। इसलिए आने वाले वसंत को रोक देना क्या ठीक है?’ ‘ये देखो मां, आपके लिए मैं व मेरे लिए आप, ये वसंत हमारे लिए कम है क्या?’ ‘मैं जब तक हूं तब तक तो ठीक! पर मैं न रहूं तो तुम्हें ज़िदंगी कैसे रास आएगी?’ राधा की आंखों में आंसू देख गौरव परेशान हो गया। ‘ठीक है मां अपनी पसंद की आप एक लड़की देख लें। पर मेरी एक शर्त है। उस लड़की की वजह से हम दोनों में किसी भी प्रकार का अलगाव नहीं होना चाहिए।’ ‘तुम देखना बेटा, मैं अपनी प्रिया जैसी ही एक दूसरी प्रिया को बहुत जल्दी तुम्हारे लिए लेकर आऊंगी।’ कहती हुई शादी करवाने वाले संस्थान की ओर चल दीं। .... बाथरूम से बाहर निकलते हुए वीणा, घड़ी को देखकर बोली ‘अरे... अरे....इतनी जल्दी साढ़े नौ बज गए। कालचक्र का पता नहीं इतनी तेज़ी से कैसे दौड़ता है?’ बड़बड़ाते हुए वीणा मां को इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना है, याद आते ही मम्मी के कमरे में गई व सुई लगा दी। उन्हें नमकीन दलिया दिया व उनकी सुबह की दवाइयां टेबल पर निकाल कर रखीं। मेरी बेटी मेरी कितनी सेवा करती है सोच कर मां की आखों से आंसू बहने लगे। सीधे हाथ व सीधे पैर पर लकवा मार गया, अतः बिस्तर पर पड़ी मां की सेवा बेटी को तो करनी ही है। ‘क्यों बेटी वीणा तूने खाना खा लिया?’ ‘नही मां! तुम्हारा दोपहर का खाना हॉट बाक्स में रख दिया, गोलियां जो तुम्हें लेनी हैं उन्हें टेबल पर रख दिया। अब मुझे सिर्फ़ खाना खाना ही बचा है। दोपहर को 12 बजे गरम पानी जो पीती हो वह थर्मस में रख दिया। उसे याद से पी लेना। शाम को बाई काम करने आएगी तब उससे चाय बनवाकर पी लेना।’ इतनी सेवा करने वाली बेटी को देख गर्व के साथ मां परेशान भी हो रही है कि मेरे कारण ही बेटी का जीवन बरबाद न हो जाए। ये ख़्याल उसे बहुत परेशान करने लगा। ‘क्यों बेटी शादी कराने वाले संस्थान का एजेंट आज आने वाला था ना....’ ‘मैंने आपसे कितनी बार कहा है, मुझे शादी नहीं करनी है और कितनी बार कहूं? मैं शादी करनेे के बाद चली जाऊं तो आपकी देखभाल कौन करेगा?’ ‘मुझे किसी वृद्धाश्रम में छोड़ देना। क्योंकि भाग्यहीन लोगों की वही जगह है।’ पारू कहने लगी। ‘ऐसी बातें क्यों करती हो मम्मी? जो घटना घटी उसका दोषी कोई नहीं। यह विधि का विधान है। तुमने मेरे लिए अच्छा लड़का देख शादी करने की सोची। पर क्या करें? वह इतना कमज़ोर व बुज़दिल निकला। शादी के दिन तक उसका मुंह नहीं खुला पर शादी वाले दिन सुबह ही अपनी पसंद की लड़की के साथ भाग गया। तुमने बिस्तर पकड़ लिया। तुम भाग्य को मत कोसो मां, मेरा भाग्य अच्छा था जो उसकी कलई पहले खुल गई। जो एक निर्णय कर उसे बताने का साहस न रखता हो क्या वह मर्द है? अच्छा हुआ मैं उस नामर्द से बच गई।’ ‘अब भी तुम्हारी उम्र ज़्यादा नहीं हुई! तुम्हारी शादी किए बिना यदि मैं ऊपर चली गई तो मुझे मोक्ष कैसे मिलेगा?’ ‘ठीक है मां तुम्हारी मर्ज़ी। मेरे लिए एक लड़का तुम ही पसंद करना। पर मेरी एक शर्त है। जो लड़का तुम देखो वह हमारे घर में ही घर जंवाई बनकर रहने को तैयार हो, क्योंकि मैं तुम्हें वृद्धाश्रम में नहीं छोड़ सकती। तुम्हें मेरे पास ही रहना होगा। जो इस बात के लिए राज़ी हो तो वह कैसा भी हो मुझे मंज़ूर होगा। इस बात को एजेंट आए तो अच्छी तरह समझा देना।’ जल्दी-जल्दी जा रही बेटी को देख पारू ने दीर्घ श्वास छोड़ी। ... ‘बेटा गौरव मैने आज तुम्हारी जन्मपत्री पंडित को दिखाई। उन्होंने कहा उनके पास एक लड़की की जन्मपत्री आई है। उसके व तुम्हारे 32 गुण मिल रहे हैं। ये संयोग बहुत अच्छा है। लड़की एक बड़ी संस्था में मैनेजर है। पांच साल पहले ऐन शादी के दिन दूल्हा दूसरी लड़की के साथ भाग गया। अतः शादी नहीं हुई। लड़की की सिर्फ़ एक मां ही है।’ ‘मेरी शर्त उसे बताई कि नहीं?’ ‘उसका अभी से क्या? जब लड़की को देखेगे तो बातचीत कर लेंगे।’ वहां पारू ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थी। वीणा के घर आते ही बोल पड़ी ‘बेटी, अभी-अभी एजेंट आकर लड़के की जन्मपत्री देकर गया। उसका नाम गौरव है। वह भी कोई बड़े प्राइवेट बैंक में अधिकारी है। उसका एक बड़ा भाई भी है, जो विदेश में रहता है। गौरव ने अपने साथ काम करने वाली लड़की को पसंद कर प्रेम विवाह किया। पर अफ़सोस तीन ही महीने में सड़क दुर्घटना में मारी गई। उसके बाद शादी नहीं करूंगा कह कर अभी तक शादी नहीं की। ये फोटो है उसका इसे देखकर बता बेटी।’ कहते-कहते मारे उत्साह के पारू हांफने लगी। वो आज बहुत ख़ुश थी। मां को इतना प्रसन्न देख वीणा ने तुरंत हां कर दी। लड़का-लड़की दोनों ने एक दूसरे को देखा। राधा को वीणा बहुत पसंद आई। गौरव ने तो पसंद मां पर ही छोड़ दी थी, सो उनकी हां होते ही उसने भी हां कह दी। पर अचानक मौन तोड़ते हुए वीणा ने गौरव से कहा- ‘मुझे आपसे अकेले में बात करनी है।’ ‘कोई भी बात हो, कोई बात नहीं, मां के सामने ही निसंकोच कहिएगा।’ गौरव बोला। ‘मुझे अपनी साझा ज़िंदगी से जुड़ी कोई बात करनी है। आपकी माताजी शायद एकदम से न समझ पाएं।’ ये सुनते ही एकदम राधा का चेहरा कुम्हला गया। ‘कोई बात नहीं वीणा जी, मेरी मां के सामने ही कहिएगा। मुझसे ज़्यादा इस शादी में मेरी मां उत्साहित है।’ ‘वीणा! अभी क्यों बात कर रही है। मेहमानों को नाश्ता तो दो।’ पारू बोली। ‘नहीं आंटी! वे जो कहना चाहती हैं आराम से उन्हें कहने दें। यही सबके लिए अच्छा है।’ गौरव तसल्ली से बोला। ‘यह एक बड़ा फैसला होगा, आपके लिए भी और आपकी माताजी के लिए भी। मैं उसी से शादी करूंगी, जो घर जंवाई बन कर रहे। मेरी बात आप लोगों को बुरी लगी हो, तो कृपया मुझे क्षमा करें।’ ‘नहीं बेटी। ऐसा कुछ नहीं है, अगर गौरव यहां रहे, तो कोई बात नहीं। मैं अकेले रह लूंगी।’ कहते-कहते राधा की आवाज़ भीग गई। ‘अम्मा, आप क्या कह रहीं हैं? आप मेरी शर्त भूल गईं क्या?’ गौरव परेशान होकर बोला। ‘आंटी, आप मुझे ग़लत न समझें। मेरी मां को इस असहाय स्थिति में छोड़ कर मैं अलग नहीं रह सकती। मेरी मां को अपने साथ ससुराल लाकर, मैं आप लोगों को कष्ट देना नहीं चाहती। इसलिए मैं घर जंवाई बनने को जो तैयार हो उसी से शादी करूंगी। ये मेरी शर्त है। गौरव के एक भाई और हैं, यही जानकर मैंने आपको आमंत्रित किया। यदि मेरी बातों से आपका दिल दुखा हो तो मुझे माफ़ कर दीजिएगा’ स्पष्ट व आत्मविश्वास के साथ बोलते हुए जैसे ही वीणा ने अपनी बात ख़त्म की वैसे ही गौरव बोल पड़ा, ‘मेरा एक भाई ज़रूर है, पंडित जी ने आपको बताया होगा। परंतु मेरी मां का मैं इकलौता बेटा हूं। मैं उन्हें छोड़ कर अलग नहीं हो सकता।’ राधा व वीणा उसे आश्चर्य से देखने लगे। ‘हां वीणा जी, मेरी पत्नी प्रिया की मां हैं राधा आंटी। मेरे और प्रिया के प्रेम को इन्होंने ही सपोर्ट किया था और अपनी एकमात्र बेटी की शादी मुझसे कर दी। पता नहीं किसकी नज़र लगी, एक दिन ऑफिस से आते समय मेरी बाइक को पीछे से कार ने टक्कर मारी व प्रिया सदा के लिए मेरा साथ छोड़कर भगवान को प्यारी हो गई। इस दुख को किस तरह कैसे कहूं!’ ‘अपनी इकलौती पुत्री जिसके सुखी वैवाहिक जीवन को देखकर जो मां ख़ुश होती थी अब उसके लिए पूरा ससंार ही अन्धकारमय हो गया। मैं उन्हें उनके दुख में अकेला कैसे छोड़ सकता था। वो भी तो मेरी मां हैं। मैंने उन्हें पुत्र व पुत्री बनकर सम्भाल लिया और उन्होंने मां बन कर मुझे सम्भाल लिया। अब यदि उन्हें छोड़ने पर मुझे बहुत शानदार ज़िंदगी भी मिले, तो ये मुझे मंज़ूर नहीं। ऐसी ज़िंदगी मुझे नहीं चाहिए।’ पूरा घर आश्चर्य में पड़ गया। वीणा की अंाखों से आंसू बहने लगे। ‘गौरव, मुझे माफ़ कर दीजिएगा। जन्म देने वाली माता व शादी कर घर लाए अपनी पत्नी के मन को ही न समझने वाले आदमियों को ही मैंंने देखा व दुखी हुई हूं। ऐसे में आप एक सास को मां जैसे मान रहे हो, तो मेरा मन आपको देवतुल्य मानकर पूजने को कर रहा है। आप सचमुच गौरव हैं।’ ‘मां मुझे माफ़ कर दीजिएगा।’ जैसे ही वीणा ने यह कहा, राधा ने उसे गले लगा लिया। ‘तुम भी मेरे लिए प्रिया ही हो! किसी को भी कहीं जाने की ज़रूरत नहीं। सभी एक साथ एक ही घर में रहेंगे। तुम्हारा दाम्पत्य जीवन सुखी हो व हमारा रिश्ता अपूर्व हो सब रिश्तों से ऊंचा।’ ऐसा कहकर राधा जी ने पारू को भी गले लगाया। ‘समधिन जी, मेरी बेटी बहुत ही भाग्यशाली है। दामाद अपनी सास के लिए बेटा बना है। इस अपूर्व रिश्ते से हम भी जुड़ने जा रहे हैं, ये हमारा सौभाग्य है।’ पारू के चेहरे से अपार ख़ुशी व संतोष झलक रहा था।

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