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  • Nowadays, Photos Are Shown By Picking Up Mobiles To Tell About Memorable Moments And Memories, But Know Exactly What Memories Are In This Article.

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ज़रा सोचिए:आजकल यादगार पलों और यादों के बारे में बताने के लिए मोबाइल उठाकर फोटो दिखाई जाती हैं, लेकिन असल में यादें क्या होती हैं इस लेख में जानिए

नेचर खंताल13 दिन पहले
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  • यादों को बताने के लिए अब पहले की तरह कहानियां और अनुभव नहीं सुनाए जाते बल्कि मोबाइल निकालकर तस्वीरें दिखाई जाती हैं।

‘बेटा, कल सुबह जल्दी उठना है, कितनी तैयारियां करनी हैं, इतने सारे लोग जाएंगे, सबके लिए खाना बनाना है, फोन बंद करो और जल्दी सो जाओ। सुबह एक आ‌वाज़ में उठ जाना, आलस मत करना, बहुत काम होंगे’ हम लोगों को सोने की हिदायत देते हुए मम्मी ख़ुद भी सोने चली गईं। अगले दिन सुबह मम्मी पांच बजे उठ गईं। ढेर सारा खाना बनाया गया। ख़ूब तैयारियां की गईं, दरी, खेल के सामान रखे गए। आख़िर सब पिकनिक पर जो जा रहे थे। ठीक समय पर हम लोग रवाना भी हो गए। बहुत सुंदर जगह चुनी गई थी पिकनिक के लिए। झरने के पास, पहाड़ की तलहटी में। हमने अपना सारा सामान एक पेड़ के नीचे रखा और अलग-अलग जगहें ढूंढने में जुट गए। कोई किसी कोने में सेल्फी लेने लगा, तो कोई किसी और जगह पर। कोई पोज़ दे रहा था, तो कोई झरने का वीडियो बना रहा था। मैंने देखा कि दरी पर बैठी छोटी दादी सबकी ओर मायूसी से ताक रही हैं। मैंने उनके पास जाकर पूछा, ‘दादी, आप क्या देख रहे हो?’ दादी ने कहा, ‘हम यहां पिकनिक मनाने आए हैं ना?’ मैंने कहा, ‘हां, दादी बिल्कुल।’ तो दादी ने जो कहा वो मुझे सोचने पर मजबूर कर गया। दादी ने कहा, ‘पिकनिक पर आने का मतलब तो सबके साथ मिलकर आनंद के क्षण बिताना होता है, पर यहां तो सब अपने-अपने में गुम हैं। सबको ख़ुद की तस्वीरें खींचनी हैं, सेल्फी। दिखावा जो करना है दोस्तों के बीच।’ यह एक बड़ा और कड़वा सच है। हम सब कहीं भी जाएं, फोन हाथ में होता है। तस्वीरें खींचने और सोशल मीडिया पर साझा करने को हम अपनी अनुभूतियां साझा करना मानते हैं। जबकि कुछ महसूस करने का हम समय ही कहां लेते हैं? तस्वीरें उस समय का चित्र होती हैं, मात्र चित्र। अगर कोई हमसे कहे कि कुछ बयां करो, तो हम केवल तस्वीरें दिखा पाएंगे। जहां तक पर्यटन का सवाल है, चंद तस्वीरें को ली जा सकती हैं, लेकिन जब परिवार और दोस्तों के साथ हों, तो यादें बनाने के और भी ज़रिए हैं। होने चाहिए। एक कहानी पढ़ी थी बचपन में, जहां चचेरे-ममेरे भाई-बहन पिकनिक पर जाते हैं। िपकनिक वाले स्थान के आसपास के पेड़ों को जांचते-समझते हैं। फिर सर्वसम्मति से एक पेड़ के नीचे साथ लाई दरी बिछाते हैं। खाने के सामान को रखकर, कुछ देर खेलते हैं। फिर भोजन का पिटारा खुलता है और उसमें से शर्बत निकालकर पिया जाता है। फिर वे आसपास की जगहों को घूमते हैं, देखते हैं, बातें करते हैं, पत्थरों और फूल-पत्तियों, फलों पर चर्चा करते हैं। उनके रंग, पत्तियों, फूलों की छुअन को महसूस करते हैं। फिर भोजन की बारी आती है और भोजन में लाई हर वस्तु को स्वाद ले-लेकर खाया जाता है। शाम को घर पहुंचकर, घर के बड़ों को बताने के लिए उनके पास बहुत कुछ होता है और यादों में दर्ज करने को भी। अगर कहानी वाले बच्चों के पास कैमरे वाले फोन होते, तो तस्वीरें होतीं, दूर बैठे दोस्तों से बातें होतीं, भोजन की भी तस्वीरें होतीं, लेकिन स्वाद के, रिश्तों की समझ के, यादों के ख़ज़ाने रीते ही रहते। ज़रा सोचिए, हर बार किसी जगह का ज़िक्र करने पर आपको तस्वीरें दिखानी पड़ें, तो यादें ही कहां बनीं? आपस में जुड़ाव बनाने के ऐसे अवसर जहां बचपन का जश्न मनाया जाता है, बड़ों से सीखा जाता है, प्रकृति को समझा जाता है, यूं ही ज़ाया नहीं हो गया? ज़रा सोचिए।

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