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सुनो भई कहानी:मूषकराज और उनकी बहनों की रोचक कहानी पढ़िए और बच्चों को भी सुनाइए

विद्यादेवी व्यास17 दिन पहले
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  • सम्मान सूचक, स्नेहपूर्ण शब्दों में बात कहने से सुनने वाले को भी अच्छा लगता है और बात बिगड़ने की कोई आशंका भी नहीं रहती।
  • लेकिन मौजी चुहिया को कौन समझाता, उसने तो राजा का अपमान कर ही दिया।

एक चूहा था, सभी चूहे उसे मूषकराज के नाम से जानते थे। वह सबसे बड़ा व समझदार था। सभी चूहे मूषकराज का मान-सम्मान करते थे। एक बार चूहों ने सोचा कि अपना एक राजा होना चाहिए क्योंकि सभी चूहे अपनी मनमानी करते और आपस में झगड़ते रहते थे। एक सभा बुलाई गई और काफ़ी विचार-विमर्श के बाद मूषकराज को वहां का राजा घोषित कर दिया। अब वहां रोज़ दरबार लगता और मूषकराज एक ऊंची कुर्सी पर बैठकर सबकी समास्याओंं का समाधान करते। मूषकराज की दो बहनें भी थी, एक का नाम खोजी व दूसरी का नाम मौजी था। खोजी तो बड़ी समझदार व शालीन थी। इसके विपरीत मौजी मुंहफट व चुलबुली थी। एक दिन मूषकराज को दरबार में बहुत देर हो गई। वे कोई महत्वपूर्ण मसला सुलझाने में लगे हुए थे। खोजी ने खाना बनाया और अपनी छोटी बहन मौजी से कहा कि जाकर भैया को खाना खाने के लिए बुला ला। अब मौजी कूदती-फांदती सीधी मूषकराज के पास पहुंची और बोली, ‘ऊंदड़ला रे ऊंदड़ला, थारी नाक चना-सी, आंख घना-सी, तू घर चल के रोट्यां बन गई।’ मौजी की बात सुनकर सभी दरबारियों के सामने बड़ा अपमान हुआ, वह ग़ुस्से में बोला, ‘तू घर चल के खेर का मूसला लाऊं।’ अब तो मौजी बहुत डरी और सारी बात खोजी को बताई। फिर खोजी बड़ी शालीनता से राजा के पास पहुंची और बोली, ‘राजा, पटराजा आपके हाथ कटारी नौ सौ की और पगड़ी चमके दो सौ की, आप घर पधारो के भोजन बन गया।’ इस पर मूषकराज बोले, ‘बहना, मेरी प्यारी बहना, आपके हाथ चूड़लो नौ सौ को और बिंदी चमके दो सौ की। आप घर पधारो के रेशमी साड़ी लाऊं।’ थोड़ी देर बाद मूषकराज घर पहुंचे, उनके एक हाथ में रेशमी साड़ी थी, जो उन्होंने खोजी को ओढ़ा दी, दूसरे हाथ में एक मोटा डंडा था इधर-उधर मौजी को ढूंढने लगे। मौजी तो डर के मारे पलंग के नीचे छिपी हुई थी, वही से उसने अपने भाई से क्षमा मांगी। तब मूषकराज ने डंडा फेंक दिया और मौजी को समझाया कि हमेशा, तोल-मोल कर अच्छे शब्दों में बोलना चाहिए। फिर तीनों ने मिलकर प्रेम से भोजन किया। अब मौजी भी मीठे शब्दों में बात करना सीख गई थी।

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