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कविता:जीवन को आसान बनाने, प्रकृति को मान-सम्मान देने और इस समय के दर्द को बयां करतीं ये कविताएं पढ़िए...

डॉ. महिमा श्रीवास्तव, अलका सोनी12 दिन पहले
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नवल, धवल संसार रचें

आतंक के सायों से निकल विषाणुओं को करके विफल नवल धवल संसार रचें। पारदर्शी झीलों में झांके सघन विटप आड़े बांके कृत्रिम सुविधाओं से बचें। नीलाभ आकाश विहंसता तके हरित धरा आए जब सज-धज के हरियाली सीमेंट से ना ढंके। गौरैया चहके, गिलहरी फुदके वन- उपवन महुए-बौर महकें कॉन्क्रीट के मायाजाल से बचें। धूल धुंए रहित प्राची सिन्दूरी मलयानिल महकाए सांझ पूरी पैदल चलें ईंधन सवारी तजें। पर्वतों से निकलें फेनिल निर्झर भर जाए शुद्ध हवा से हर घर सामग्रियां को पुनः चक्रित करें। सघन अरण्यों में मृग भरें कुलांचे ताज़े कंदमूल स्वास्थ्य कुंजी बांचे रासायनिक खाद को अलविदा कहें। सावन में झिरमिर सुधा बूंदें बरसें बसंत में पुष्पित बाग बगिया हरषें धरती के अंधाधुंध दोहन से बचें। निशा काल, सज जाए नभ-मंडल शुभ्र ज्योत्सना से दमके नील कंवल पौधे रोंपे, प्रकृति का श्रृंगार करें। फिर से करें प्रकृति का मान सम्मान जीवन को बनाए सादा और आसान मानव हो ना करें व्यर्थ अभिमान।

इस तूफ़ान के बाद

क्या कुछ नहीं बचेगा इस तूफान के बाद क्या बदल जाएगा हर मंज़र इस उफान के बाद !! कैसे उठें ये हाथ तुझसे विनती के लिए, हृदय दुखी है आज हर ख़बर के बाद रोक रखा है अब तक मैंने मन को, एक मां की उस नज़र के बाद, जिसने देखा था जाते-जाते मुझको ऐसे , कि अब न मिलेंगे हम उस पल के बाद रोक लो भगवन इस प्रलय को अब भी फिर न मांगूगी कुछ इस मन्नत के पूरी हो जाने के बाद.....

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