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तीन लघकथाएं:ननद भाभी की साथ में पहली होली, रोने वाली गुझिया और बच्चों के साथ बच्चा बने बुज़ुर्ग, होली के त्योहार को यादगार बनाती ये लघुकथाएं पढ़िए

डॉ. निरुपमा नागर, अवंति श्रीवास्तव, अशोक वाधवाणी21 दिन पहले
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गाल गुलाल

शुभ्रा ने बड़े उत्साह के साथ मां को आवाज़ लगाते हुए घर में प्रवेश किया। ‘मां, अब होली को आठ ही दिन बचे हैं। आंगन वाली टंकी साफ करवा दो ना! आज हम सब ने मिलकर होली को रंगा-रंग बनाने का प्लान कर लिया है। भाभी की पहली होली है। नई नवेली भाभी के साथ होली खेलने में खूब मज़ा आएगा।’ सुनकर मम्मी जी ने कहा ‘अरे! राधिका को तो लिवाने उसके भैया कल आ रहे हैं। बेटा! अपने यहां पहली होली पर बहू ससुराल में नहीं रहती है।’ ‘क्या ? अरे! ये क्या बात हुई! भैया को भी तो भाभी के साथ होली खेलना है। नहीं नहीं हम नहीं जाने देंगें भाभी को।’ शुभ्रा ने विरोध प्रकट करते हुए कहा। तभी वहां अचानक बुआ जी आ गई। ‘क्या बात है? क्यों चिल्ल-पों मचा रही है मिन्नी!’ ‘देखो ना बुआजी! भाभी की पहली होली है। हम सब कितनी धींगा-मस्ती करने का प्लान बना रहे हैं और मम्मी कह रही है पहली होली पर बहू ससुराल में नहीं रहती।’ फिर कुछ सोचकर मिन्नी बोली, ‘अच्छा ऐसा करते हैं हम सब भी भाभी के साथ उनके मायके ही चले जाते हैं।’ फिर अपने हाथ नचाते हुए बोली ‘होली तो हम खेलेंगे।’ बुआजी ने मिन्नी को चिकोटी काटते हुए कहा ‘ऐं हें‌। बड़ी आई भाभी के मायके जाने वाली। अगले साल खेल लेना भाभी के साथ होली।’ इसी बीच देवर जी और राकेश भी वहां आ गए। उनको देख बुआ जी बोली, ‘देखो! राकेश का मुंह कैसा लटका हुआ है!’ फिर हंसते हुए बोलीं -‘अच्छा बच्चों, बहू के साथ होली खेलना है तुम्हें! अच्छा चलो कोई रास्ता निकालते हैं।’ दो मिनट सोचने के बाद चुटकी बजाते हुए ज़ोर से बोलीं,‘आइडिया, आइडिया! अरे, राकेश, मिन्नी, तुम मूड मत ख़राब करो। देखो सही नियम तो यह है कि पहली होली पर सास - बहू साथ नहीं रहते। एक काम करते हैं मैं मेरी भाभी को अपने साथ ले जाती हूं। बहुत सालों से हमने भी होली साथ में नहीं खेली। निकल गया साॅल्यूशन! तुम्हारी भाभी तुम्हारे पास, मेरी भाभी मेरे पास। यह सुनकर ख़ुशी के मारे राधिका का चेहरा लाल हो गया। कनखियों से राकेश को देखा, वे भी लालिमा लिए मुस्कुरा रहे थे। समस्या का ऐसा हल सुन ससुर जी भी चुप नहीं रहे, बोले - ‘इंदु, अपनी भाभी के साथ मुझे नहीं ले जाएगी? मैं अकेला बच्चों के साथ क्या करुंगा।’ बुआ जी ने भाई की ठिठोली पर हंसते हुए बच्चों की तरफ देखा और बोलीं ‘देखो देखो राकेश राधिका के गाल गुलाल हुए जा रहे हैं।’

रो उठी गुझिया

हुआ यूं कि पिछले साल मुझे होली के त्योहार से चार दिन पहले एक मीटिंग के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा और ऐन त्योहार के दिन एक दिन पहले ही मैं घर पहुंची। पतिदेव बड़े अरमानों से बोले ‘शालू! गुझिया की तैयारी कर लो, रात में प्रसाद में चढ़ानी होगी और पूजा भी करनी है।’ एक तो सफ़र की थकान, दूसरा मीटिंग के काम ने मुझे बुरी तरह से थका दिया था। कहां तो खाना बनाना भी भारी पड़ रहा था, कहां गुझिया बनाना! सुनते ही दर्द और बढ़ गया। मैंने टालते हुए कहा, ‘अरे, खोया लाना पड़ेगा, मैदा भी नहीं है, मेवे भी लाने होंगे...’ अभी वाक्य खत्म भी नहीं हुआ था कि बीच में ही पतिदेव बोल पड़े ‘अरे यार, चिंता मत करो मेरी अर्धांगिनी, मैं यूं ही मिस्टर बेस्ट प्लानर नहीं कहलाता। सब सामान ला चुका हूं, तुम तो बस बनाने की तैयारी करो।’ ‘ओफ्फो! सामान की जगह अगर आप बाजार से गुझिया ही ख़रीद लाते तो ज़्यादा अच्छा था, मुझसे नहीं बनेगी गुझिया। पूरे शरीर में दर्द हो रहा है, ऊपर से सफ़र की थकावट।’ अब वो समझाने की मुद्रा में आ गए ‘देखो शालू, त्योहार साल में एक बार ही आता है और गुझिया भी साल में एक ही बार बनती है। सभी मेहमानों को तुम्हारे हाथ की गुझिया बहुत पसंद है, उठो चलो तैयारी करते हैं।’ अब मेरा पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया, ग़ुस्से से बोली ‘सुनो जी! मैं तो गुझिया नहीं बनाऊंगी, तुम से बनती हो तो बना लो।’ मैंने यह बात एक चुनौती की तरह कही, जिसे पतिदेव ने सहर्ष स्वीकार किया ‘ठीक है! मत बनाओ, मैं ही बना लूंगा मगर शगुन तो घर की गुझियों से होगा।’ मैंने भी बचने के लिए चादर मुंह तक तानी और सोने का उपक्रम करने लगी। थोड़ी ही देर में किचन से तरह-तरह की विचित्र आवाज़ें आने लगीं। दिल घबरा रहा था पर मैं बिस्तर पर डटी रही। कभी लगता मानो आसमान से सितारे टूट टूट कर बिखर रहे हैं, तो कभी ऐसा लगता जैसे कि बहुत देर बाद जब मोबाइल डाटा ऑन करो तो जिस तरह से नोटिफिकेशन की आवाज़ टन टन टन करके आती है, बस ऐसी ही आवाज़ें मेरे कानों तक पहुंच रही थीं। थोड़ी देर बाद इन आवाज़ों ने मुझे बहुत विचलित कर दिया, सोचा देखूं क्या हो रहा है किचन में। मैं जैसे ही किचन के पास पहुंची पतिदेव को आहट मिल गई। मुझे देखते ही बोले, ‘शालू, अच्छा हुआ तुम आ गईं, देखो तुम्हारी याद में यह गुझिया कैसे फूट फूट कर रो रही हैं।’ मेरी हंसी छूट गई। गुझिया वाकई फूटकर तेल में बिखर रही थी। मैंने कहा ‘चलो मिलकर बनातेे हैं।’ फिर मिलकर हमने गुझिया ही नहीं, और कई पकवान बना डाले। थकावट छूमंतर हो चुकी थी।

होली है !

आत्माराम मित्रों के साथ होली खेलने के लिए सुबह - सुबह सफेद सलवार कुर्ता और पायजामा पहनकर घर से निकले। चौराहे पर देखा, ढेर सारे बच्चे पिचकारी से एक दूसरे को रंग रहे थे। उन्हें वहां से गुज़रते देखकर वे सारे बच्चे ठिठक गए। एक बच्चे ने सब बच्चों से कहा, ‘अंकल को आगे जाने दो। ग़लती से उन्हें रंग लग गया तो वो हमारा बुरा हाल करेंगे।’ आत्माराम ने जिज्ञासावश एक बच्चे से इसका कारण पूछा तो उसने बताया, ‘थोड़ी देर पहले एक बुज़ुर्ग दादाजी पर ग़लती से रंग पड़ गया था। वे बहुत ग़ुस्सा हो गए। हमको मारने के लिए पत्थर तक उठा लिया उन्होंने। हम सब डरकर भाग गए।’ यह सुनकर उन्होंने कहा, ‘मैं दोस्तों के साथ रंग खेलने जा रहा था, लेकिन अब शुरूआत तुम बच्चों से ही करूंगा।’ उनकी बातें सुनकर सारे बच्चे ख़ुशी से झूम उठे। बच्चों ने ‘होली है!’ कहकर आत्माराम को सर से पांव तक रंगों से नहला दिया। आत्माराम भी बच्चा बनकर उनकी ख़ुशी में शामिल होकर नाचने, गाने लग गए। वहां से गज़रने वाले लोग, एक बड़े और बच्चों को एक साथ हुल्लड़बाज़ी करते हुए देखकर रुकते, इस मनोहारी दृश्य का आनंद लेते, फिर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ जाते थे।

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