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दो लघुकथाएं:एक मां का बेटी के प्रति प्रेम व अहसास और एक बच्ची के मन में मां के लिए छुपी परवाह को बतलाती ये दो लघुकथाएं पढ़िए

आशा शर्मा, सुनीता बिश्नोलिया16 दिन पहले
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‘तसल्ली से देख’

सुबह-सुबह की आपाधापी में कुछ भी ठीक नहीं होता। कभी गाड़ी की चाबी नहीं मिलती तो कभी कोई ज़रूरी काग़ज़। कभी-कभी तो अलमारी में रखी नीली जींस भी आंखों से ओझल हो जाती है। मां को न जाने कैसे वह खोई हुई चीज़ मिल जाती है। पलक झपकते ही लाकर हाथ में थमा देतीं। ‘कहां मिली?’ मैं पूछती। ‘वहीं तो रखी थी। ज़रा तसल्ली से देखती तो मिल जाती।’ मां अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ कहतीं। मगर तसल्ली किसे थी? मैं तो अपनी झल्लाहट के जवाब में मां केे स्नेह, कभी उसके ग़ुस्से के आवरण में लिपटे प्रेम और उसकी नसीहतों में छिपी परवाह को भी कहां देख पाती थी। आज जब बिटिया अपना गुलाबी कुर्ता तलाश करती हुई झल्लाती है तो मां सामने आकर खड़ी हो जाती हैं और मैं मुस्कराकर कह उठती हूं ‘तसल्ली से देख, वहीं रखा होगा, मिल जाएगा।’ उम्र के इस चौथे दशक में ज़रा फुर्सत मिली है तो तसल्ली से देख पाती हूं मां की नसीहतों को। बिटिया भी इसी तरह एक दिन समझ जाएगी, जब उसकी बिटिया पीली साड़ी अलमारी मेंं तलाश करती हुई झल्लाएगी।

आदर्श

‘दिखा क्या चुराया है तूने! खोल..खोलती है कि नहीं मुट्ठी!’ कहती हुई मालकिन शकुंतलता ने अपने किए पर शर्मिंदा होकर सिसकती सात साल की लच्छी का हाथ कसकर पकड़ लिया और दूसरे हाथ से उसके ज़ोरदार थप्पड़ मारते हुए कहा, ‘राधा देख तेरी बेटी को। तू चाहती थी कि यह पढ़-लिखकर तेरा सहारा बने पर देख ये तो कुछ और ही सीख रही है। हे राम कैसी ढीठ है। देख, तो मुट्ठी नहीं खोल रही!’ बेटी को मालकिन से पिटते और आंखों से लगातार आंसू बहाते देखकर राधा की आंखें भी छलक पड़ीं, पर वो कुछ नहीं कह पाई। ‘ये तो तेरी मां मेरे घर काम करती है, अगर तू राधा की बेटी न होती तो मैं तुम्हें देख लेती! तू मुट्ठी खोलती है कि नहीं? राधा कल भी ये तेरे साथ आई थी और कल ही मेरे सौ रुपए खो गए थे वो भी इसने ही चुराए होंगे।’ इतना सुनते ही लच्छी ने मुट्ठी खोल दी, छोटी-सी मुट्ठी में निकले दो बादाम। मालकिन को खुली मुट्ठी दिखाते हुए लच्छी जल्दी से बोली, ‘नहीं मैडम, मैंने पैसे नहीं चुराए। आप भइया से कह रहे थे ना, रोज़ बादाम खाने से दिमाग़ तेज़ होता है। इसलिए मैंने बादाम लिए हैं। मैं बड़ी होकर आपकी तरह बहुत तेज़ दिमाग़ वाली टीचर बनना चाहती हूं। मैं भी आपके जैसे बच्चों को अच्छी-अच्छी बातें सिखाऊंगी। फिर मां को काम पर भी नहीं जाना पड़ेगा।’ सुनते ही मां ने लच्छी को गले से लगा लिया और शकुंतला ये सोचकर आत्मग्लानि में डूबी जा रही थी...‘मेरे जैसी?’

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