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मदर्स डे विशेष:मां का महत्व बेटे ने आज जाना है, पढ़िए मां के नाम उसकी ये डायरी

डॉ. मोनिका शर्माएक महीने पहले
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  • हर मां अपनी दुनिया बच्चों के इर्द-गिर्द ही बुनती है, लेकिन बच्चों को वो नज़र नहीं आती।
  • आज एक बेटे को नज़र आई है, सो उसने डायरी में लिखा है...

अनजान शहर की एक सुबह है।

वर्क फ्रॉम होम मिला है। कहीं जाना नहीं, किसी से मिलना नहीं। ख़ाली दीवारें ताक रहा हूं। मई की चुभती गर्मी है। ऊब है, लेकिन महामारी का डर बेड़ियां डाल, घर में बांधे हुए है। पिछले साल तो घर पर ही था लॉकडाउन के समय। तब भी घर में ही बंद था, लेकिन ऊब नहीं थी, अकेलापन नहीं था, घुटन नहीं थी। क्यों?

मां जो साथ रहीं वहां पर। ठहरी सहमी ज़िंदगी के इस दौर में तुम बहुत याद आ रही हो मां।

जब पूरी दुनिया आपदा से जूझ रही है, मेरा मन उन स्मृतियों के संसार में गुम है, जहां हर विपदा में तुम देवदूत सी साथ रही हो। छोटी हो या बड़ी, हर समस्या का हल सुझाने वाली कुशल नीतिकार सी मेरा हाथ थामे रहीं तुम। अनजानी मज़बूती से थामकर मुझे मेरी ही शक्ति का अहसास कराती रहीं। आज यह जानता और मानता हूं कि हर अपेक्षा से परे मुझे थामने के तुम्हारे प्रयास मेरी ओर से अक्सर उपेक्षित ही रहे। आज टूटते मन के हर क्षण में तुम्हारा स्पर्श और शब्द मन पर दस्तक देते हैं मां।

कहने को कामयाब और आत्मनिर्भर हूँं, तुमसे दूर करियर बनाने के फेर में व्यस्त और कहने को मस्त जीवन भी जी रहा हूं पर इनकी असलियत आज समझ पा रहा हूं। आज मैं सचमुच कुछ जी रहा हूं, महसूस कर रहा हूं तो वो है घर तक सिमटी ज़िंदगी में तुम्हारी हर पल की आपाधापी। मैं अनुभूत कर पा रहा हूं चारदीवारी में सबके साथ होते हुए भी तुम्हारा अकेलापन। संकटमोचन की भूमिका निभाते हुए स्वयं ही हर पीड़ा झेलने का स्वभाव। सब कुछ सह जाने का भाव। ‘तुम नहीं समझोगी मां’ मैंने जाने कितनी बार कहा। पर तुम तो सब समझती रहीं मां। समझते हुए साथ भी देती रहीं। तुम्हारी हर सलाह, हर परामर्श को पुरातन सोच का नमूना ही ठहराया मैंने। तुम्हारी वही नसीहतें जो कभी अजीब लगतीं थीं, आज वक़्त ने उनके मायने समझाए हैं तो अपनी ही नासमझी मन को पीड़ा दे रही है। तुम कभी रूठी क्यों नहीं मां? बस मनाती ही रहीं हर बार, बार बार।

समय के साथ नासमझी का आवरण उतरा तो समझ पाया कि तुम्हारे सारे सवाल, सारी सलाहें मेरी भलाई के लिए रहीं मां। ठीक इसी वक़्त, बिखरे, बेतरतीब कपड़ों के अम्बार में मुझे अलमारी में तहाकर रखे कपड़ों में तुम्हारे स्पर्श की याद आ रही है। तुम्हीं तो मेरे कपड़े सहेजती रहीं, लेकिन मैंने गाहे-बगाहे तुम पर, ‘मेरी फलां शर्ट, जींस कहां रख दी’ जैसे अनेक सवाल ही उठाए।

‘यह क्या बना लिया आज?’ कहते हुए कैसे नहीं झिझका मैं? जबकि मेरी पसंद पूछकर-जानकर ही खाना बनाती हो। मुझे रसोई की गर्मी, तुम्हारी मेहनत, परवाह कुछ नज़र नहीं आई। ‘तुमने कुछ खाया या नहीं?’ यह तो मैंने कभी पूछा ही नहीं। सवाल तो कभी शाम तक तुम्हारे चेहरे पर उतर आई थकान को लेकर भी नहीं किया।

कभी थके-बुझे से मन का कारण भी नहीं पूछा। जाने तुम कैसे बिन कहे ही जान लेती थीं मेरी उदासी का कारण। क़दमों की थकी सी आहट भर से पहचान लेती हो मेरी मायूसी और मुस्कराने के अंदाज़ भर से तुम्हें समझ में आ जाता है मेरे मन के मौसम का हाल। लेकिन मैं तो देखकर भी कभी नहीं समझा तुम्हें।

बहुत लम्बी फेहरिस्त है मां - जितना कुछ तुम करती रही हो, मैं उतना ही उदासीन रहा। कुछ समझा नहीं तो कुछ समझने की कोशिश ही नहीं की। तुम तो अपनी कहने-बताने या जताने से ज़्यादा मुझे और भरे-पूरे घर को समझने संभालने में ही गुम रहीं। आज अकेलेपन से जूझता मेरा मन यह सोचकर ही कितना व्यथित है कि मैंने कभी तुम्हें अपने कमरे के दरवाज़े पर नॉक करके अंदर आने को कहा था। प्राइवेसी के नाम पर तुम्हारी निःस्वार्थ परवाह की उस अनदेखी के स्मरण भर से आंखें नम हैं मां। यह याद करके तो आंसू ही झर रहे हैं कि नॉक करे बिना न आने की मेरी बेअदब ताक़ीद के बाद भी तुमने अधखुले दरवाज़े से चुपके से झांक कर मेरी ख़ैरियत लेकर चैन पाना नहीं छोड़ा।

मैंने तुम्हें अपनी दुनिया की परिधि से बाहर रखने की कोशिश की। मेरे बहुत सारे दोस्त करते हैं - अपनी मां पर उनके कॉल सुनने की इल्ज़ाम लगाते हैं, फोन चेक करने पर झिड़कते हैं भले वो मां का इरादा न रहा हो, मां पर अपनी हर नाकामी, हर तकलीफ़ के दौर में चिल्लाकर ग़ुस्सा उतार लेते हैं - मैंने भी यह सब किया है। मां हमारी दुनिया में दख़ल नहीं दे सकती, हम बच्चे यही समझते हैं, लेकिन नहीं जानते मां ही तो हमारी दुनिया की धुरी है।

मां, आज यह विपदा हमें कितने ही नए पाठ पढ़ा रही है। मानवीय बनने के, संवेदनाओं को जीने के, दूसरों के लिए सोचने के। ऐसे में ज़िंदगी का हर पहला सबक सिखाने वाले की याद तो आएगी ही। इंसानी जीवन के लिए ज़रूरी हर बात और जज़्बात का परिचय तो तुमने ज़िंदगी के पहले ही पड़ाव पर करवा दिया था। जिसने सब सिखाया, सब समझाया, सुख की समझ और दुख के मायने, उसे ही न समझ पाने की पीड़ा हो रही है। हम बच्चे जिनकी उंगली थामकर चलते हैं, उन्हें ही कैसे पीछे छोड़कर दौड़ पड़ते हैं?

मदर्स डे आ रहा है मां। इस बार ख़ुद से एक वादा कर रहा हूं। जब बंदिशों का दौर ख़त्म होगा, मैं तुमसे मिलूंगा, तो तुम जानोगी मां कि तुम्हें देखकर, तुम्हें जानकर आज मैं कितना बेहतर इंसान बना हूं। मुझे नाज़ है तुम पर। एक दिन तुम भी मेरे सलीक़े और अदब पर नाज़ करो, इसकी पूरी कोशिश करूंगा।

(एक युवा की डायरी का पत्रनुमा पन्ना)

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