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महिलाएं सक्षम हैं, क्यों मानें कम हैं?:रूढ़िवादी सोच स्त्री को कमतर आंकती है, इससे जन्मी हिचकिचाहट और डर उन्हें आगे बढ़ने से रोकती है

डॉ. संजीव त्रिपाठी10 दिन पहले
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मोबाइल की घंटी बजते ही अनुष्का ने फोन उठाया तो सामने से आवाज़ आई- ‘मैम, मैं मोबाइल सर्विस से बात कर रहा हूं। क्या घर में किसी पुरुष से बात हो सकती है?’ अनुष्का ने कहा, ‘आपको क्या बात करनी है मुझे बता दीजिए।’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘ मैडम, टावर लगवाने के बारे में पूछना है, किसी पुरुष से बात करा दीजिए आपको समझ नहीं आएगा।’ अनुष्का उसकी ये बात सुनकर हैरान थी। ऐसा नहीं है कि वह अनपढ़ या नासमझ है, लेकिन सिर्फ़ महिला होने के कारण उस व्यक्ति ने यह सोच लिया कि एक स्त्री को तकनीकी बात समझ में नहीं आएगी।

पर क्यों है ऐसी मानसिकता...?

ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि लोग पुरुषों पर बहुत ज़्यादा भरोसा करते हैं। वे बस महिलाओं को इन कामों में पूरी तरह से सक्षम नहीं समझते। शायद हमेशा से हमने अवचेतन मन से महिलाओं को एक भावनात्मक और परवाह करने वाले रूप में स्वीकार किया है, और ये मान लिया है कि उन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है। फिर यह सोच इन विचारों में बदल जाती है कि महिलाएं अत्यधिक भावनात्मक और कमज़ोर होती हैं। बचपन से ही इन विचारों से परिचित कराया जाता है कि लड़का और लड़की को किस तरह दिखना चाहिए और व्यवहार करना चाहिए। लड़के क्या कर सकते हैं और लड़कियां क्या नहीं, यह सब पहले ही तय कर दिया जाता है। पीढ़ी दर पीढ़ी यह सोच आगे बढ़ती जाती है जो व्यवहार को आकार देती है।

ये सोच स्त्री को कमज़ोर करती है...

आमतौर पर महिलाएं ऐसी सोच को नज़रअंदाज़ कर देती हैं, लेकिन कहीं न कहीं वे अंदर से टूट भी जाती हैं। ये भेद महिलाओं की आत्म-धारणा, रिश्तों के प्रति दृष्टिकोण और दुनिया में उनकी भागीदारी के स्तर को बदल सकता है। इससे उनके आत्मविश्वास में कमी भी आती है। उनका मज़ाक उड़ेगा इसलिए वे अवसरों को टालना शुरू कर देती हैं जिसमें वे योग्य हैं या बन सकती हैं। वे मानने लगती हैं कि कुछ कौशल जैसे वित्तीय, तकनीक, यंत्र और विद्युत संबंधी काम केवल पुरुषों के लिए हैं। अगर वो सड़क पर गाड़ी भी चलाती हैं तो उन्हें इस बात का डर होता है कि यदि कुछ गड़बड़ हुई तो लोग मज़ाक न बना दें। हंसी का पात्र बनने से बचने के लिए वे जीवन में उतनी स्वतंत्र नहीं बन पातीं। नई चुनौतियां लेने से कतराती हैं और अपनी क्षमताओं पर संदेह करने लगती हैं। वे ख़ुद को अपना नहीं पातीं।

वहीं जब यह सोच स्कूल के बच्चों पर आती है तो उनके कक्षा के अनुभव, शैक्षणिक प्रदर्शन, पढ़ाई और स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। वित्त, तकनीक और विश्लेषण संबंधी कार्यों में अब लड़कियां तेज़ी से आगे आ रही हैं, इस बारे में ख़ुद भी जानें और बेटियों को भी बताएं।

महिलाओं की समझ को लेकर समाज की सोच में जड़ता केवल उनकी कार्यक्षमता तक सीमित नहीं है। ऐसे कई अन्य उदाहरण हैं जो महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी सोच दर्शाते हैं।

  • जब टू या फोर व्हीलर से सड़क दुर्घटना होती है तो ग़लती महिलाओं पर थोपी जाती है। फिर भले पुरुष गाड़ी ग़लत चला रहा हो।
  • महिलाओं के साथ गाड़ी में बैठने के बाद मज़ाक उड़ाकर पूछा जाता है, ‘गाड़ी चलानी तो आती है न?’ सिर्फ़ पुरुष ही नहीं, बल्कि महिलाएं भी सवाल उठाती हैं। — जब टू या फोर व्हीलर से सड़क दुर्घटना होती है तो ग़लती महिलाओं पर थोपी जाती है। फिर भले पुरुष गाड़ी ग़लत चला रहा हो।
  • महिलाओं के साथ गाड़ी में बैठने के बाद मज़ाक उड़ाकर पूछा जाता है, ‘गाड़ी चलानी तो आती है न?’ सिर्फ़ पुरुष ही नहीं, बल्कि महिलाएं भी सवाल उठाती हैं।
  • मीटर की रीडिंग महिलाओं को बताने के बजाय पुरुषों को बताई जाती है।
  • तकनीक या गैजेट से जुड़ी बातें महिलाओं से नहीं करते क्योंकि ‘यह उनके बस का नहीं है।’ कार्यक्षेत्र में भी ऐसा बर्ताव देखने को मिलता है।
  • अगर कार शो रूम में महिला किसी ग्राहक को कार दिखा रही है या टेस्ट ड्रायविंग पर लेकर जाती है तब उसे उपहास की नज़रों से देखा जाता है।
  • वित्त से जुड़ी बातें महिलाओं से नहीं की जातीं, किसी समस्या में उनकी राय दख़ल लगती है।

अगर ऑफिस में एक महिला के बजाय उससे कम योग्य पुरुष को प्रमोशन मिलता है तो शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें लगता है कि वह इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी नहीं संभाल पाएगी। और इसी रूढ़िवादी सोच के चलते, लोग उन्हें गंभीरता से लें, उसके लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है।

नज़रिया बदलने की ज़रूरत है...

महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी सोच घर, दफ़्तर और समाज में हमेशा से मौजूद रही है। उन्हें क्या करना चाहिए और वे क्या नहीं कर सकतीं, यह पहले से तय कर दिया गया है। इस सोच में बदलाव लाने के लिए पहला क़दम हमें ही उठाना होगा।

समर्थन भी दें

अगर बेटी कोई ऐसा कार्यक्षेत्र चुनना चाहती है, जो आपके परिवार या परिचितों में किसी ने नहीं चुना, तो ऐसी रूढ़िवादी सोच रखने के बजाय उसके सपनों को पूरा करने में उसका साथ दें।

सोच में बदलाव लाएं

अगर आप भी महिलाओं के प्रति ऐसी पुरातनपंथी सोच रखते हैं तो एक बार इस सोच पर विचार कीजिए और दुनिया में महिलाओं की उपलब्धि के बारे में जानिए। लोगों को उनके कौशल और व्यवहार के आधार पर परखें, लड़का है या लड़की उससे फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए। महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी सोच को बदलना आपके हाथ में है। आप पर निर्भर करता है कि गाड़ी सीख रही महिला को धीमा चलने पर कोसना है या उसका हौसला बढ़ाना है? तकनीक में विशेषज्ञता हासिल होने पर उससे सवाल करके कमियां खोजनी हैं या उसे सराहना है? अब ये आपको सोचना है....

ग्लास सीलिंग घर से तोड़ना शुरू करें

बेटियों के साथ असमान व्यवहार को घर में ही रोक दें। लड़का रसोई से संबंधित खेल खेलता है तो उसे यह कहकर न रोकें कि वो लड़कियों वाले गेम खेल रहा है। बच्चे के सामने महिलाओं के कौशल से संबंधित मज़ाक न उड़ाएं, न ऐसे जोक्स पढ़ें। मिसाल के तौर पर, अक्सर जोक्स या मीम बनाए जाते हैं कि महिलाएं दो पैरों से स्कूटी रोकती हैं। कई पुरुष भी रोकते हैं लेकिन मज़ाक सिर्फ़ महिलाओं का बनता है। बच्चा आपको सुनकर महिलाओं के प्रति वैसी ही धारणा बना सकता है।

(ग्लास सीिलंग यानी महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकने वाले अनुचित भेदभावपूर्ण तरीक़े या प्रवृत्ति)

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