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  • Subodh Could Not Correct What Niyati Had Done To Avanti And Baby, But Given The Circumstances, He Had Taken A Happy Path.

कहानी:अवंति और बेबी के साथ नियति ने जो किया उसे सुबोध ठीक तो नहीं कर सकता था पर परिस्थिति को देखते हुए उसने एक सुखद रास्ता अपना लिया था

प्रकाश माहेश्वरी7 दिन पहले
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  • आदर्श कोरी बातें होती हैं, सच से बहुत दूर। पर सुख की तलाश सबको रहती है। जब सुख सच है, तो आदर्श सच क्यों नहीं?
  • आदर्श तो सदा बहुत सुखद होते हैं। यह कहानी आदर्श स्थिति का ब्योरा है। इसलिए बड़ी सुकूनदायक है।

फैक्टरी अहाते से लगी हुई कम्पनी कॉलोनी थी। दोपहर बारह बजे भोजन की छुट्टी होती। मेस जाते वक़्त सुबोध हर रोज़ देखता कि पान की दुकान के पास, बरगद की छांव तले खड़े होकर कुछ स्कूली बच्चे अपने-अपने पिता की प्रतीक्षा कर रहे होते। इन सब बच्चों में उसे एक पांच-छः वर्षीया बच्ची बहुत प्यारी लगती थी। सुबोध ने ग़ौर किया, बच्ची के पिता शायद सबसे देरी से आते थे। अबोध बालिका अन्य बच्चों को तृषित आंखों से अपने-अपने पिता से लिपटते देखा करती। सुबोध को उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में फैला वह सूनापन अपनी ओर खींचता-सा लगता था। उसे उसके अनदेखे पिता पर ग़ुस्सा भी आता। कौन होगा वो निष्ठुर इंसान? हर रोज़ देरी से आता है? क्या कभी जल्दी नहीं आ सकता? उस दिन वो स्वयं लेट हो गया। पूरी सड़क पर सन्नाटा छाया हुआ था। उसने दूर से देखा। पिता की प्रतीक्षा से निराश हो बच्ची बेचैन हो उठकर खड़ी हुई और धीमे कदमों से चलते हुए अपने घर की ओर जाने लगी। उसके पैर धीमे-धीमे उठ रहे थे। एक नन्ही-सी बच्ची की चाल से परिलक्षित ऐसी निराशा देख उसका हृदय भर आया। उसने लम्बे-लम्बे डग भरे और उसके समीप पहुंच गया। उसने देखा, बच्ची के पैरों में चप्पल नहीं थी। ‘अरे? इतनी धूप में नंगे पैर जा रही हो? तुम्हारी चप्पल कहां है?’ बच्ची ने चौंककर, फिर विस्मय से गरदन मोड़ उसकी ओर निहारा, ‘नाली में गिर गई।’ ‘फिर निकाली क्यों नहीं?’ ‘छिः..नाली की पहनेंगे?’ नाक दबा बच्ची ने इस अंदाज़ से कहा, मानो बोल रही हो- कितने गंदे हो आप? वह झेंप गया। बच्ची से बात करने में उसे आनन्द आ रहा था। कुछ सोच उसने पूछा, ‘आज तुम्हारे पापा अभी तक नहीं आए?’ ऐसा सुनते ही बच्ची ठिठककर खड़ी हो गई। एक क्षण को उसकी ओर निहारा, फिर रूआंसी हो आंख मसलने लगी, ‘पापा भोत गंदे हैं, पास वाले अंकल लेने आते हैं’ और आगे बढ़ गई। सुबोध ने उसे गोद में उठा लिया, ‘तुम्हारे पैर जल रहे होंगे न? आओ, तुम्हारे घर छोड़ दें?’ बच्ची राह बतलाती गई। वह उसके फ्लैट तक छोड़ने आया। ‘हमारे घर चलो न अंकल’ गोद में रहते हुए ही बच्ची ने कॉलबेल का बटन दबा दिया। किसी के क़दमों की आहट सुनाई दी और धीरे-से दरवाज़ा खुला। कुछ कहने के लिए सुबोध ने मुंह खोला ही था कि वह चौंक पड़ा। सादी साड़ी और सूनी मांग लिए एक पच्चीस- छब्बीस वर्षीया युवती विषाद की प्रतिमूर्ति बनी खड़ी थी। उसे समझते देर नहीं लगी, बच्ची हर रोज़ तृषित नेत्रों से अन्य बच्चों को अपने-अपने पिताओं से मिलते क्यों देखा करती थी। उसके पापा.. अब कभी नहीं लौटने वाले थे! उसका हृदय करुणा से भर आया। उफ़! कितनी निष्ठुर है नियति! इन दोनों पर कितना भारी अन्याय किया था! भारी हृदय लिए वह लौटने वाला था कि बच्ची ने हाथ पकड़ लिया,‘अंकल रुको न...!’ मगर सुबोध का दिल इतना भर आया था कि रुक ना सका। तेज़ी से सीढ़ियां फलांगता उतरता चला गया। दूसरे दिन 12 बजे जब वह लंच के लिए लौट रहा था, बच्ची उसे देख दूर से भागती हुई आई और उसकी गोदी में चढ़ गई, ‘अंकल! आज जाना नहीं। हमारे साथ मम मम करना।’ सुबोध उसकी ज़िद नकार न सका। उसके बाद नित्य का नियम हो गया। ऑफिस के बाद का अधिकांश समय बच्ची, जिसे सब बेबी बुलाते थे, के घर गुज़रता। धीरे-धीरे बेबी व उसकी मां अवंति से सुबोध की घनिष्ठता बढ़ती गई। दो माह बीत गए। सुबोध के तीन माह का ट्रेनिंग पीरियड समाप्त हो गया। वह वापस लौट गया। अवंति अकेली बैठी उसके बारे में सोचा करती। क्यों बढ़ाई होगी घनिष्ठता उससे? मालूम तो था, सुबोध कम्पनी सेक्रेटरी का कोर्स कर रहा है, अच्छे खानदान का है, ट्रेनिंग के लिए आया था, ट्रेनिंग कर चला जाएगा। कुछ दिनों बाद किसी अच्छी कम्पनी में नियुक्त हो जाएगा। धीरे-धीरे उसे याद भी न रहेगा कि इस छोटी-सी औद्योगिक नगरी में वह कभी किसी नन्ही-सी बेबी से मिला था। लेकिन उसे यह क्या होता जा रहा है? बेबी की ख़ुशी के लिए उसने सुबोध से जान-पहचान बढ़ाई थी। अब उसका ना घर के काम में दिल लगता; ना स्कूल में पढ़ाने में। उधर बेबी अलग उसे परेशान करती थी। रोज़ भोजन के समय रो-रो कर आंखें सुजा लेती, ‘अंकल कब आएंगे मम्मी ?...अंकल भी गंदे...!’ बेचारी अवंति क्या जवाब देती? अंततः उसने यह नगरी छोड़ देने का निश्चय किया। लेकिन क्या यह इतना सहज था? नन्ही-सी बेबी को लेकर इतने बड़े जगत में कहां जाती? कुछ दिनों पूर्व उसे एक अन्य शहर में एक पारमार्थिक स्कूल से ऑफर आया था। मगर कम्पनी स्कूल के मुकाबले कम पगार होने के कारण उसने मना लिख दिया था। अब उसने पुनः उस स्कूल को लिखा। आज वहां से उनका जवाब आ गया था। अपना सामान समेट वह जाने की तैयारी कर रही थी। कम्पनी का कर्मचारी, जो फ्लैट ख़ाली करते समय चेक करके इन्वेंट्री लेने आ गया था, उसे चाभी सौंप उसने अंतिम बार तृषित आंखों से अपने फ्लैट को निहारा। कितनी ही यादें थीं, जिन्हें छोड़कर वह जा रही थी। मगर क्या भूल पाएगी? एक लंबी श्वास खींच उसने रुलाई रोकी। नीचे टैक्सी रुकने की आवाज़ आई। बेबी की ऊंगली थाम उसने सूटकेस उठाया और नीचे उतरने के लिए जीने पर ज्यों ही क़दम बढ़ाया, वह चौंक गई! सुबोध ऊपर आ रहा था! उसका हृदय तेज़ी से धड़कने लगा। सुबोध ठीक उसके सम्मुख आ खड़ा हो गया। अवंति ने एक पल चोर निगाहों से उसे निहारा और फिर आंखें झुकाकर निकलने की कोशिश करने लगी। भावनाओं के प्रवाह में वह दोबारा कमज़ोर होना नहीं चाहती थी। सुबोध ने उसने रोकना चाहा, लेकिन वह राह बनाती जाने लगी। उसके दृढ़ रुख़ को देख सुबोध ने राह छोड़ दी। अवंति का मन अंदर ही अंदर कसक उठा। काश! सुबोध एक बार और पूछ लेते! अपने दुर्भाग्य पर निःश्वास छोड़ वो अंतिम पैढ़ी उतरी और छूटते सूटकेस पर पकड़ मज़बूत कर जैसे ही टैक्सी की ओर बढ़ने लगी कि उसे ठिठककर खड़ा हो जाना पड़ा। सामने एक अधेड़ दम्पत्ति उसका रास्ता रोककर खड़े थे! वह आश्चर्य से उन्हें निहारने लगी। ‘हम सुबोध के माता-पिता हैं...’ मुस्कराते हुए सुबोध की मां ने आगे बढ़ उसकी बांह थाम ली। ‘सुबोध ने हमें सब बतला दिया है। अपनी बहू को हम इस तरह जाने नहीं देंगे।’ एक क्षण को वह हतप्रभ रह गई। उसे विश्वास नहीं हो रहा था। पीछे मुड़कर देखा, सुबोध बेबी को गोद में लिए मुस्करा रहा था। उसकी आंखों से ख़ुशी की अश्रुधार बह चली!

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