पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • Madhurima
  • The Desire For A Diamond Was There For A Long Time But The Partner's Point Of View Explained The Value Of The Real Diamond And It Is Difficult To Trust The Unknown But Trusting Some People Gives New Experiences

दो अनुभव:हीरे की चाह तो काफ़ी समय से थी लेकिन साथी के नज़रिए ने असल हीरे की क़ीमत समझा दी और अनजानों पर ऐतबार करना मुश्किल होता है लेकिन कुछ लोगों पर भरोसा करके नए ही अनुभव मिलते हैं

अलका ‘सोनी’, स्नेह श्रीवास्तव7 दिन पहले
  • कॉपी लिंक

समर्पण का अंदाज़ निराला

कभी-कभी हमसे जुड़े लोगों की किसी अनोखी बात व सोच पर हम बिल्कुल निरुत्तर हो जाते हैं। बातों ही बातों में कुछ ऐसा मिल जाता है, जिसका कोई जवाब नहीं होता। ऐसा ही एक वाकया मैं बताने जा रही हूं। मेरे पति का कार्यक्षेत्र साहित्य से बिल्कुल अलग है। लेकिन उनकी साहित्य में बहुत रुचि है। बड़े कवि या लेखक हों या फिर आज के नए लेखक, वे ध्यान से सबको पढ़ते हैं। इस वजह से उन्हें साहित्य की काफ़ी जानकारी है। वे प्रायः सादा जीवन, उच्च विचार का पालन करते हैं। हमारा रहन-सहन भी सादगी भरा रहता है। लेकिन पिछले कुछ समय से जाने कैसे मुझे हीरे की अंगूठी लेने की इच्छा हो रही थी। मैं कई महीनों से इन्हें हीरे की अंगूठी ख़रीदने के लिए कह रही थी। पतिदेव थे कि लगातार मुझे टाले जा रहे थे। मैं कभी प्यार से, तो कभी मनुहार करके उन्हें मनाने की कोशिश में लगी थी। लेकिन ये टस से मस नहीं हो रहे थे। ये स्वभाव से ही किफ़ायतपसंद हैं और एक-एक पैसे को सोचकर ख़र्च करते हैं। साथ ही मुझे भी प्रेरित करते रहते हैं पैसे की बचत करने के लिए। उनका मानना है कि वक़्त आने पर बचाए पैसे ही काम आते हैं। मैं भी उनकी बात से सहमत हूं। लेकिन फिर भी कभी-कभी मन तो करता ही है कि कुछ लिया जाए। एक दिन इनका मूड ठीक देखकर मैंने फिर अपनी बात शुरू की और बोली, ‘आज चाहे जो भी हो मुझे अंगूठी चाहिए तो बस चाहिए।’ उन्होंने जब मेरे तेवर देखे तो समझ गए कि आज बात ऐसे समझाने से ख़त्म नहीं होगी। बड़े दार्शनिक अंदाज़ में उन्होंने कहना शुरू किया, ‘सब कुछ तो तुम्हारा ही है। वह हीरे की अंगूठी भी तुम्हारी ही है।’ मैं सोच में पड़ गई और वापिस प्रश्न पूछते हुए कहा, ‘बिना घर लाए कोई चीज़ मेरी कैसे हो सकती है भला? आपने तो अभी तक दिलाई भी नहीं अंगूठी मुझे। फिर वह मेरी कैसे हुई?’ मुझे विस्मय से भरा देख कर वे मुस्कराकर बोले, ‘तुमने अज्ञेय की कविता ‘साम्राज्ञी का नैवेद्य दान’ नहीं पढ़ा है जिसमें जापान की साम्राज्ञी, भगवान बुद्ध को हर फूल, हर नैवेद्य, जहां है, वहीं से समर्पित कर देती हैं। इसी तरह मैं भी हीरे की हर अंगूठी जिस भी दुकान में है, उसे वहीं से तुम्हें समर्पित करता हूं।’ उनका यह अंदाज़ देख मैं चकित रह गई और अपनी बात वहीं ख़त्म कर दी। मुझे लगा अंगूठी दुकान से आए या नहीं, असली हीरे की अंगूठी तो मुझे मिल गई।

अनजाने रक्षक

बात काफ़ी पुरानी है किंतु यादगार है। एक रात हम लोग फिल्म का अंतिम शो देखकर लौट रहे थे। रास्ते में हम लोगों की कार अचानक ख़राब हो गई। उसमें मैं मम्मी-पापा दो बड़ी बहनें और एक छोटा भाई था। इतने में एक ट्रक हम लोगों की कार के सामने आकर खड़ा हो गया और उसमें से दो नवयुवक उतरे। पहले तो हम सभी के मन में अनजाना भय व्याप्त हो गया किंतु तुरंत ही पापा ने उन्हें अपनी समस्या से अवगत कराया। पहले तो उन्होंने कार ठीक करने का प्रयास किया लेकिन जब वे भी ठीक करने में असमर्थ हुए तो उन्होंनेे एक ज़ंजीर से ट्रक के पिछले भाग से कार के अगले भाग को संयोजित किया। फिर मेरे छोटे भाई को अपने साथ ट्रक में बैठाया ताकि वह घर का रास्ता बता सके और ट्रक से कार को खींचते हुए हम लोग चल पड़े। उन युवकों ने हमें हमारे घर तक पहुंचाया। उस डर-भरे कठिन समय से निकलते हुए इंसानियत की ऐसी ख़ूबसूरत मिसाल का अनुभव कर हम सभी अभिभूत थे। पापा ने उन्हें जब पारितोषिक स्वरूप कुछ रुपए देने चाहे तो वे हाथ जोड़कर कहने लगे ‘रात का समय है और हमारी बहनें आपके साथ हैं। ऐसी विपत्ति के समय आप लोगों की सहायता करना हमारा फर्ज़ था।’

खबरें और भी हैं...