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संस्मरण 'रीत-रीत का भेद':पहली होली मायके में होती है, इस रीत को जान कर लगा कि होली में और भी कई रीत होती होंगी। वाकई थीं क्या?

मनीषा नारायण21 दिन पहले
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मेरे मायके में होली खेलने का ज़्यादा प्रचलन नहीं था परंतु ठीक इसके विपरीत ससुराल में होली तरह-तरह के पकवानों और रंग खेलकर ख़ूब हर्षो-उल्लास से मनाई जाती। सासु मां के कहने पर कि शादी के बाद की होली में बहू मायके जाती है, ऐसा विधान था, सो मैंने ऐसा ही किया।

जब दूसरे साल होली आई तो मेरे पति और ननद ने मुझे रंगों से सराबोर कर दिया। जैसे ही मैं रंग लेकर सासू मां के कमरे में गई तो मुझे देखते ही उनका स्वर थोड़ा कड़क हो गया और बोलीं, ‘हमारे यहां सास को रंग नहीं लगाया जाता। सिर्फ़ चरणों में डाला जाता है।’ ये सुनकर मैंने वैसा ही किया और अनमने मन से बाहर आ गई।

थोड़ी देर बाद मेरी ननद ने धीरे से आकर मेरे कान में कहा, ‘भाभी, मम्मी सिर्फ़ रंगों से बचना चाहती हैं, ऐसा कोई रिवाज़ नहीं है।’ इतना सुनना था कि बस। मैंने ढेर सारा रंग लिया और चली गई सासू मां के कमरे में रंग लगाने। मुट्ठी भरकर रंग मैंने उनके ऊपर डाल दिया और कहा, ‘बुरा ना मानो होली है।’ कमरे में पूरी तरह सन्नाटा छा गया, मैं भी थोड़ा डर गई। फिर एकदम से मेरी सासू मां बोलीं, ‘हैपी होली। ख़ुश रहो बहू।’ अब जब भी होली का त्योहार आता है, मेरी सासू मां अनकहे एहसासों को पढ़ लेती हैं और कहती हैं, ‘आओ बहू, रंग लगाओ।’

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