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  • The Meaning Of Animal Love Is To Have The Same Love For All Animals, Know This From Those Madams And Honesty Has No Value, That Person Explained It Very Well

दो अनुभव:पशु प्रेम का अर्थ सभी पशुओं के प्रति एक-सा प्रेम रखना है ये उन मैडम से जाना और ईमानदारी का कोई मोल नहीं होता ये उस व्यक्ति ने बखूबी समझा दिया

दीपक शर्मा, राजेंद्र यादव12 दिन पहले
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पशु प्रेम की नई परिभाषा

पिछले महीने मोबाइल पर एक संदेश से मेरे स्कूल के समय की एक अध्यापिका के निधन की दुःखद सूचना प्राप्त हुई। इस ख़बर को पाकर हृदय भीतर तक दुःखी हो उठा। मैडम के साथ बिताए स्कूल के पुराने दिन याद आने लगे। हालांकि मुझे स्कूल से निकले बीस साल से अधिक समय हो चुका है। फिर भी सोशल मीडिया के ज़रिए मैडम से संपर्क बना हुआ था। प्रकृति, पशु-पक्षियों से उनको अत्यंत प्रेम था। स्कूल के समय एक बार मेरा किसी काम से उनके घर जाना हुआ। बातचीत के दौरान उन्होंने मुझे बताया कि उनके घर के पास के ख़ाली प्लॉट पर एक मादा सूअर ने बच्चों को जन्म दिया है। जब उन्हें इसका पता चला तो उन्होंने गुड़-आटे का हलवा बनाया और जाकर उस मादा सूअर को खिलाकर आईं। यह सुनकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। मैंने उनसे इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि मादा पशु को बच्चों को जन्म देने के बाद बहुत भूख लगती है और घी में बना हुआ गुड़-आटे का हलवा भूख मिटाने के साथ ही उन्हें पोषण भी देता है। मैडम के उस मादा सूअर और उसके बच्चों के प्रति प्रेम को देख कर मुझे अत्यधिक आश्चर्य हुआ। मैं तो सूअर को सबसे गन्दा पशु समझता था, परन्तु उन्होंने जानवरों के प्रति मेरा नज़रिया बदल दिया। मेरे लिए पशु-प्रेम का अर्थ सिर्फ़ पालतू कुत्ते- बिल्लियों से प्रेम करना ही था, वहीं मैडम के व्यवहार ने बता दिया कि पशु-प्रेम तो हर एक जीव के प्रति प्रेम और करुणा भाव रखना हैं। मैडम, आज आप इस दुनिया में नहीं हैं, किन्तु मुझ जैसे अनेक शिष्यों को आपने जीवन के प्रति एक नया नज़रिया प्रदान किया है। आप जीवन की गुरु थीं। आपको शत-शत नमन।

ईमान ने नतमस्तक किया

बात उन दिनों की है जब मेरी नियुक्ति शासकीय शिक्षक के रूप में दूरस्थ जंगलों के मध्य बसे ग्राम पटपडा में थी। वहां का रास्ता उबड़-खाबड़, पत्थरों से भरा था ही, राह में चोर लुटेरों का भय था सो अलग। इसी बीच मेरी सगाई हुई। उसकी निशानी केस व रूप में उंगली में थी सोने की अंगूठी। मैंने गांव जाने से पहले शहर छिन्दवाड़ा से बारिश के पूर्व इंतज़ाम के लिए एक बोरी चावल ख़रीदकर सायकिल के पीछे कैरियर में बांध दिया। रास्ते मे चोरों का ध्यान आया। अवसर देखकर मैंने चावल की बोरी में अंगूठी डालकर फिर से उसे कसकर बांध दी और चल पड़ा। शाम ढलते-ढलते मैं अपने निवास पर जैसे ही सायकिल से उतरा तो देखा बोरी नहीं थी। रात गहराने लगी थी, इसलिए मैंने तब तलाशना ठीक नहीं समझा। रात करवटें बदलते बीती। सुबह हल्की-सी झपकी लगी ही थी कि किसी ने कुंडी खटखटाई। दरवाज़ा खोला, तो सामने गांव का गंगाराम सिर पर बोरी उठाए खड़ा था। बोला, ‘गुरुजी, ये चावल की बोरी शायद आपकी ही है। हमारे गांव में कोई इतना महंगा चावल (बासमती) नहीं खाता है। लेकिन मुझे आपके बारे में पता था।’ बोरी उतरवाते हुए मैंने उससे कहा- ‘जानते हो गंगाराम, ये सिर्फ़ चावल की बोरी नहीं है। इसमें और भी कुछ है।’ मैंने बोरी में अंदर हाथ घुमाकर अंगूठी निकाल ली। मैंने ख़ुश होकर उसे पूरी चावल की बोरी देनी चाही, तो उसने हाथ जोड़ लिए। बोला, ‘वो तो मैं भी शहर से बीज लेकर लौट रहा था, तो आपकी यह बोरी मुझे रास्ते मे मिल गई।’ गंगाराम तो चला गया लेकिन मुझे अहसास करा गया कि उस जैसे इंसानों के दम पर भलाई का ज़माना सदा रहेगा।

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