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  • The Nine day Festival Symbolizes The Worship Of Female Power, Which Is The Oldest And Is Continuing Continuously.

मन-मंदिर में विराजित हों मां:नौ दिवसीय पर्व नारी शक्ति की आराधना का प्रतीक है, जो सबसे प्राचीन है और निरंतर चली आ रही है

नर्मदा प्रसाद उपाध्याय11 दिन पहले
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  • नवरात्र में घर तीर्थ हो जाता है और मन मंदिर। वातावरण में उत्साह और उल्लास होता है।
  • कामना करें कि यह पवित्र वातावरण हमारे अंतस में बना रहे और हृदय में भक्ति की ज्योति सदा जलती रहे।

आगमन अथवा आना केवल एक ऐसी स्वाभाविक क्रिया नहीं है जो सम्पन्न भर हो जाती हो। आगमन की प्रतिक्रिया होती है। किसी के आने से धरती की प्रकृति भी बदल जाती है। वर्षा में जिस धरती की प्रकृति जल के आप्लावन को समेटने की, उसे आत्मसात कर लेने की होती है, उसकी वही प्रकृति वर्षा के बाद आने वाली शरद ऋतु में उल्लास के अभिनंदन की हो जाती है।

यह उल्लास होता है ऐसे उत्सव के आगमन का जिसके बारे में हम यही चाहते हैं कि उसका मनाया जाना कभी थमे नहीं। जो मन वर्षाकाल में उदासी की बाढ़ में डूबा रहता है वह शरद में कांस की तरह खिल उठता है।

शरद ऋतु में देवी के आगमन की बेला, आस्था से भरपूर मन में कांस के फूल उठ आने की वह बेला है जब वर्षा से जन्मा मन का मटमैलापन शुभ्र ज्योत्स्ना में बदल जाता है।

पुष्प की तरह खिल उठते हैं दिन

नवरात्र में देवी का आगमन उनके धवल वात्सल्य के ऐसे प्रवाह का आगमन है जिसमें हम नौ दिनों के लिए डूब जाते हैं और इस तरह कि उससे उबरने का मन नहीं होता।

बंगाल में देवी के आगमन को कांस से सम्बद्ध किया जाता है। वहां ऋतु और दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है जो कांस के फूलों के बिना अधूरा है। यह भी एक रोचक तथ्य है कि सदियों पहले कालिदास ने कांस की इस शोभा को अपने काव्य में पिरोया था। उन्होंने ‘कुमारसंभव’ में विवाह के समय सज्जित देवी पार्वती की शोभा का वर्णन करते हुए लिखा था कि वे ऐसी लग रही हैं जैसे जल से धुली हुई और कांस के फूलों से भरी हुई धरती शोभायमान हो रही हो।

कांस की भांति पुष्पित मन इन नौ दिनों में वास्तव में ऐसी ही मां के प्रतिरूप हो जाते हैं। लगता है जैसे मां हमारे हृदयों में धवल उल्लास के परिधान पहिने विराज गई हों। हमारे देवी-स्वरूप इसी शुचिता और धवलता के स्वरूप हैं।

सृष्टि को जन्म देने वाली मां ही हैं

देवी की आराधना के 4,000 वर्ष पुराने प्रमाण हैं। यह मातृका की अर्थात मां की अवधारणा है। इस सृष्टि की उत्पत्ति का कारण ही माता है।

सिंधु घाटी की सभ्यता के दौरान गढ़ी गई, ईसा से 2600 तथा 1900 वर्ष पूर्व की मिट्टी की अलंकृत मातृकाएं मिली हैं और रोचक तथ्य यह है कि इस काल में किसी पुरुष देवता की मूर्तियां नहीं मिलतीं। देवी हमारे वांग्मय में ऋग्वेद के समय से विद्यमान हैं जिसमें उनके सत्तर नाम हैं और इन देवियों के स्तवन की, पूजन की निरंतरता कभी भंग नहीं होती। वे शिल्प और चित्रांकन की परम्परा से लेकर लोक की देवी के विभिन्न स्वरूपों में विराजती हैं। मार्कण्डेय, देवी और पद्मपुराणों में उनके कीर्तिकारक कृत्यों का वर्णन है।

देवी के अवतरण तथा उनके कृत्यों से जुड़ी अनगिनत कथाएं हमारे लोकमानस में और वाचिक परम्परा में मौजूद हैं। देवी के इस बहुआयामी और समृद्ध स्वरूप ने ऐसे उत्साह और उल्लास को रच दिया जिसके आगमन की बाट हम पूरे बरस जोहते हैं।

आराधना है हर देवी स्वरूप की

यह उल्लास और उत्सव उस नारी शक्ति की आराधना का प्रतीक है जो शक्ति पार्वती से लेकर राधा तक के स्वरूप में है।

नवरात्र में आराधना विशेष रूप से दुर्गा के स्वरूप की होती है किंतु इस आराधना के पीछे अवधारणा तो उस शक्ति की आराधना की है जिसके कारण ही पुरुष तत्व परिचालित होता है। इस शक्ति की आराधना यदि आदिगुरु शंकराचार्य ने अद्वैत का उद्घोष करते हुए भी सगुण रूप में ‘सौंदर्यलहरी’ की रचना कर की, तो ‘गीतगोविन्द’ में महाकवि जयदेव ने राधा के रूप में, कृष्ण की परम आह्लादिनी शक्ति के रूप में उनकी अद्‌भुत सांकेतिक वंदना की।

भगवत्पाद शंकर कहते हैं कि गंगा वास्तव में आपका चरणामृत है जिसे शंकर मस्तक पर धारण करते हैं और जब विष्णु आपके चरणों में झुकते हैं तो उनके मस्तक पर लगने वाली आपके चरणों की लाक्षा ऐसी लगती है जैसे उनके मुकुट में एक लाल मणि जड़ दी हो। ‘गीतगोविन्द’ के मंगलाचरण में ही जब नंद, राधा से कहते हैं कि इस सांझ में जब घिर आए बादलों के कारण तथा काले तमाल वृक्षों के कारण चारों ओर घना अंधेरा हो रहा है तब इस वातावरण में यह छोटा-सा बालक कृष्ण डर जाएगा, रास्ता भटक जाएगा इसलिए तुम इसे घर पहुंचा दो, तो उनका आशय यही होता है कि राधा ही कृष्ण की वह परम आह्लादिनी शक्ति हैं जो उन्हें घर पहुंचा सकती है। बिना उस शक्ति के तो कृष्ण गतिहीन ही हैं।

देवी के इस तरह के अनेक रूप हैं। देवी पुराण का एक आख्यान यह भी है कि एक बार हज़ार सिरों वाला राक्षस अयोध्या में प्रविष्ट हुआ तो नागरिकों के अनुरोध पर भगवान राम ने माता सीता को भेजा, जिन्होंने एक ही तीर से उस राक्षस का वध कर दिया।

निरंतर आस्था के प्रतीक नौ दिन

यह अखण्डित रहने वाली यात्रा का संस्कार है। नौ दिन तो प्रतीक हैं, प्रतीति तो अक्षुण्ण है, उसे क्षीण कहां होना है!

नवरात्र के इन नौ दिनों में मां के सगुण रूप की अर्चना हम एक स्थापित मूर्ति के रूप में करते हैं तथा हमारे अपने मनमंदिर में विराजित देवी के अमूर्त रूप की आराधना हमारी आस्था के अभिषेक से होती रहती है। देवी का स्वरूप इस तरह न तो दृष्टि से और न ही अंतर्दृष्टि से हट पाता है।

सदियों से हमारी आस्था इस भाव पथ पर अपनी निरंतर यात्रा करती चली आ रही है लेकिन उसके पांव कभी विराम नहीं लेते। नवरात्र के इन नौ दिनों में पवित्र वातावरण कुछ इस तरह रच जाता है कि यह संसार लौकिक से अलौकिक हो जाता है, घर तीर्थ हो जाते हैं और मन मंदिर। ऐसी सृष्टि इसलिए होती है क्योंकि हमारा संस्कार ही ऐसा है।

कामना करें कि देवी की आराधना का यह नौ दिवसीय महापर्व अबाध रूप से अनवरत मनता रहे और हमारी अंजुरी सदैव आराधना के जल से भरपूर रहे, वह कभी रीते नहीं।

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