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लघुकथा-कविता:जो छोटे खिलौने बेचता है, वो ग़रीब तो होगा ही पर क्या धन का लालची भी होगा और नववर्ष की शुभकामनाएं देती कविता पढ़िए

तारावती सैनी ‘नीरज’, जयदेव सिंह ‘जेडी’11 दिन पहले
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गुब्बारे वाला लड़का

मैंने मार्केट जाने के लिए गाड़ी की चाबी उठाई और अपने तीन साल के बेटे को साथ लेकर यह सोचकर निकली थी कि आधे-एक घंटे में वापस घर आ जाऊंगी, पर ऐसा हुआ नहीं। हम लोग जाम में फंस गए और जाम भी इतना ज़्यादा लम्बा था कि हमें एक घंटा तो वहीं गाड़ी में बैठे-बैठे ही हो गया था। ऊपर से शाम होने को थी। इतने में वहां एक बच्चा लाइट वाले गुब्बारे लेकर आया और बेटे की तरफ़ देख कर बोला ‘मैडम जी एक लाइट वाला गुब्बारा ले लो।’ मैंने मना कर दिया। लेकिन वह फिर भी बार-बार एक गुब्बारा ले लो की ज़िद पकड़े बैठा था। मेरा दिमाग़ पहले ही बहुत ख़राब हो रहा था और इस बच्चे ने उसे और हवा दे दी। मैं उसपर चिल्ला पड़ी, ‘अरे तुम्हें एक बार में बात समझ में नहीं आती। जाओ, आगे बढ़ो, मुझे नहीं लेना तुम्हारा गुब्बारा।’ लेकिन इतने में ही मेरा बेटा गुब्बारे में जलती लाइट्स को देखकर लालायित हो गया और उसे लेने के लिए कहने लगा। जब मैंने उसे भी लेने से मना कर दिया तो वह रोने लगा। गुब्बारे वाला लड़का अब भी वहीं खड़ा था। मैनें उस लड़के से पूछा ‘कितने का एक गुब्बारा?’ उसने कहा, ‘मैडम जी, तीस रुपया का।’ मैने झुंझलाते हुए कहा, ‘इतना महंगा? तुम लोगों ने तो गुब्बारे के नाम पर लूट मचा रखी है। दस रुपए का गुब्बारा है, जिसे तीस रुपए का दे रहा है।’ मैनें उसे बीस रुपए में देने के लिए कहा। वह लड़का नहीं माना और अपनी ज़िद पर अड़ा रहा। आख़िर बेटे को देखते हुए मैंने उसे तीस रुपए में लेने का मन बना लिया। पर देखा तो मेरे पास पचास का नोट था, तीस रुपए छुट्टे नहीं थे और न ही उस लड़के के पास थे। काफ़ी देर हो गई और मेरा बेटा गुब्बारा लेने की ज़िद में अब रोने भी लगा। पैसे छुट्टे न होने कारण मैंने उस लड़के को सख़्त हिदायत के साथ आगे जाने को बोल दिया। वह लड़का मेरी बात सुनते ही आगे बढ़ गया पर उसको न जाने क्या सूझी। वह वापिस आया और मेरे रोते बेटे को देख कर बोला ‘बाबू रो मत, ये लो गुब्बारा।’ उसने एक गुब्बारा निकालकर उसे दे दिया और मुझे बिना कुछ भी बोले आगे बढ़ गया। मैं सन्न रह गई। कहां तो वह तीस रुपए से कम में गुब्बारा देने को तैयार नहीं था और अब ऐसे ही दे गया। और एक मैं थी जो छुट्टे न होने पर उसे पचास रुपए न दे सकी। मेरा अंतर्मन सवाल कर रहा था, ‘बता अब कि कौन क्या महंगा दे रहा है? लूट किसने मचा रखी है?’ मैं अपने अंतर्मन को कोई जवाब न दे सकी।

नव वर्ष हो मंगलमय​​​​​​​

नव पल्लव, नव तरु, नवांकुर और वर्ष नव, आरूढ़ नभ, मयूख नव, चुन पुष्प नव कर काज नव।

नव यामिनी, नव चांदनी नव शीत है और शशांक नव, नव साज हो, नव साध्य हो हो संचरित उत्साह नव।

नव शांति हो, नव मित्र हो नव गीत हो, नव लक्ष्य हो प्रेम की हो फुहार नव, और इला करे शृंगार नव।

आत्मकेन्द्रितता को त्याग, प्रफुल्लित हो अपनत्व नव, स्वार्थ में उलझें ना रिश्ते, हो अपनत्व कुछ निःस्वार्थ नव।

है कामना शुभ, प्रार्थना शुभ, शुभ रहे ये वर्ष नव, साकार हों स्वप्न सारे, हो पल्लवित सुविचार नव।

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