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दो अनुभव:भला करने वाले का मोल नहीं चुकाया जाता बल्कि आभार जताया जाता है, वहीं ईमानदार और भले लोगों के कारण नए रिश्ते भी बन जाते हैं, कैसे जानिए इन अनुभवों से...

प्रेम कुमार कुलदीप, अल्पिता घोंगे2 महीने पहले
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सबके दाम नहीं होते

एक प्रसिद्ध फिल्म का प्रसिद्ध संवाद, ‘मुझ पर एक एहसान करना कि मुझ पर कोई एहसान मत करना’ मेरे साथ हुई एक छोटी घटना को सार्थक सिद्ध करता है। बात 1994-95 की है। एक बार मेरे ही कार्यालय में काम करने वाले एक व्यक्ति के किसी परिजन को गंभीर बीमारी का सामना करना पड़ा और उनके लिए रक्त की तुरंत ही ज़रूरत पड़ गई थी। मेरे साथ कार्यालय में काम करने वाले उस व्यक्ति को जब ख़बर लगी कि मेरा रक्त समूह उसके बीमार परिजन के रक्त से मिलता है तो उन्होंने तुरंत मुझे संपर्क किया और कहा कि आपको मेरे पीड़ित परिजन की ज़िंंदगी बचानी है और आपको रक्त देना है। मैंने तुरंत हामी भर दी। उनके बताए समय पर मैं अस्पताल पहुंच गया और डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ ने मेरा रक्त लिया। पीड़ित को रक्त देते वक़्त मुझे मन में बहुत प्रसन्नता हो रही थी कि वाकई आज मैंने एक बहुत अच्छा और नेक कार्य किया है। रक्त देने के बाद मैं अपने आप को मानवीय संवेदनाओं से एक परिपूर्ण युवा समझ रहा था। मेरे कार्यालय में काम करने वाले उन सज्जन का घर अस्पताल के पास ही था। उन्होंने मुझे अपने घर चलने के लिए कहा। मेरे लाख मना करने के बावजूद वो माने नहीं और मुझे अपने घर ले गए। वहां उन्होंने मुझे एक गिलास दूध पीने के लिए दिया। मैंने बिना ना-नुकुर के वो दूध पिया। तब तक तो सब कुछ ठीक-ठाक था और वो इस रक्तदान के लिए मुझे हार्दिक धन्यवाद दे रहे थे कि आपने जो मेरे परिवार के सदस्य की जान बचाई मैं इसके लिए आपका जीवनभर बहुत ही आभारी रहूंगा। परन्तु मैं ज्यों ही उठ कर जाने लगा तो उन्होंने अपनी जेब से ₹50 रुपए निकाले और मेरी तरफ़ बढ़ा दिए तब मुझे अचानक बहुत गु़स्सा आया और मैंने कहा, ‘यह क्या कर रहे हो आप। यह अच्छी बात नही हैं।’ फिर भी उन्होंने कहा, ‘नहीं नहीं, यह रख लो हमारी तरफ़ से।’ मैंने कहा, ‘श्रीमान, यह तो मेरा फर्ज़ था। कृपया आप इस तरह मेरा अपमान न करें। मुझे पैसे देने की कोशिश न करें। यह तो मेरा कर्तव्य था जो मैंने पूरा किया। कोई उपकार नहीं किया।’ यह कह कर मैं घर आ गया। इस घटना के अनुभव से मेरे सामने ऐसा चौंका देने वाला नज़रिया सामने आया कि समाज में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनकी ज़रूरत पड़ने पर यदि किसी ने मदद की है तो वे तुरंत उसे पैसे से चुकता कर देना चाहते हैं। भलाई का बदला भलाई से ही दिया जा सकता है। समय आने पर आप मददगार की या किसी और की मदद कर सकते हैं। आप केवल मदद का आभार जताएं। उनकी सराहना करें, यही काफ़ी है।

खोया-पाया

बात छह माह पहले की है। मेरे पति घरेलू ज़रूरत का कुछ सामान लेने घर से क़रीब दो किलोमीटर दूर गए थे। इनके घर से निकलने के चंद मिनटों बाद मैंने इन्हें कॉल किया। कुछ सामान और लाना था, वही बताने के लिए कॉल किया तो कॉल रिसीव नहीं हुआ। मैं भी अपने काम में व्यस्त हो गई। आधे घंटे बाद मेरे पति घर वापस आए। मैंने उनको कॉल रिसीव न करने की बात बताई तो वे कहने लगे, ‘मैं मोबाइल लेकर ही नहीं गया था।’ मुझे सुनकर आश्चर्य लगा क्योंकि जल्दी - जल्दी में मैंने ही इन्हें मोबाइल दिया था और इन्होंने पैंट की जेब में मोबाइल रख भी लिया था। यह बात याद आते ही पहले हमने मोबाइल पूरे घर में ढूंढा, पर नहीं मिला। मैंने फिर पति के मोबाइल पर कॉल किया तो रिंग जा रही थी पर कोई रिसीव नहीं कर रहा था, अब हम लोग तनाव में आ गए थे कि मोबाइल पक्का चोरी हो गया है। एक बार फिर मेरे पति ने कॉल किया तो इस बार एक आदमी ने फ़ोन उठाया। मेरे पति ने उन्हें एक घंटे पहले ही मोबाइल खो जाने की बात बताई। बहुत सारे सवाल करने के बाद ही उन सज्जन को यकीन हुआ कि मोबाइल मेरे पतिदेव का ही है। उन्होंने अपने घर का पता हमें बताया। हमारे घर से क़रीब आधे किलोमीटर की दूरी पर ही उनका घर था। पता सुनकर हमें हैरानी हुई क्योंकि उनके घर के सामने से तो ये निकले ही नहीं थे। हम लोग सोच में पड़ गए कि मोबाइल उन तक कैसे पहुंचा? जब हम उनके घर के सामने पहुंचे तो क़रीब साठ साल के सज्जन बाहर आए, उन्होंने अपना परिचय करवाया और बताया कि उनके घर बाग़ीचे का काम करने जो माली भैया आता है, उसे यह मोबाइल मिला। उसे मोबाइल रिसीव करना आता ही नहीं था, इसलिए उसने उन अंकलजी को मोबाइल लाकर दिया था ताकि उनकी मदद से जिसका भी हो उसे कैसे भी करके वापस मिल जाए। मोबाइल कैसे जेब से गिरा यह इन्हें मालूम ही न था और वह माली भैया और अंकल जी की वजह से एक घंटे में हमें वापस भी मिल गया था। हम दोनों बहुत ख़ुश हो गए। इस वजह से एक अंकलजी से हमारा दोस्ती का रिश्ता बन गया जो आज भी कायम है।

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