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कविता:मां की ममता और घर में मां की अहमियत को बयां करतीं ये दो कविताएं

अनीता वाधवानी, श्याम सुंदर तिवारीएक महीने पहले
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मां की चाहत

मैं चाहती हूं तुम्हें हर समय ख़ुश देखना जानती हूं यह मुमकिन नहीं कुछ रहस्यों से भरी है धरा उसमें भी हम जो आए हैं मानुष तन में जीवन है कठिनतम रास्तों से भरा मेरा रास्ता मुझे चलना है तुम्हारा रास्ता तुम्हें मैं चाहूं भी तो नहीं चल सकती हाथ पकड़ कर तेरा पर गुज़ारिश करती हूं रब से तुम्हारे हिस्से की कठिनतम सीढ़ी मुझे चढ़ने दे तुम्हें बख़्श दे सरल हवादार रास्ते या फिर मां के हदय को पाषाण में बदल दे और वो भी मुस्करा देता है मेरी नादानी पर शायद कहता है मेरे हाथ भी बंधे हैं प्रकृति के कानून से सबको तपना ही पड़ता है अपने हिस्से की धूप में

घर का कोना कोना अम्मा

घर का कोना कोना अम्मा, भरा भरा सा लगता है, तुम रहती हो घर में ये घर, हराभरा सा लगता है।

अपनी आंखों से ही तुम, सबके मन पढ़ लेती हो, बांध आंसुओं को पल्लू में, हर एक दुख सह लेती हो। हर बड़ा दुख तेरे कारण, ज़रा ज़रा सा लगता है।

कितने सपनों की पांखें, तेरी माला में रहती हैं, बड़ी उफनती नदिया भी, छिपकर गालों पर बहती है ख़ुशियों के जो आम लगाए, लग्नसरा सा लगता है।

मीनारों की सोच और, मन अमृत जल सा रखती हो, बच्चों की हर एक हंसी में, हरसिंगार सी दिखती हो तेरे उर का सोना अम्मा, खरा खरा सा लगता है।

घर का कोना कोना अम्मा, भरा भरा सा लगता है।

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