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अनुभव:एक बच्चे की ईमानदारी और दूसरों की मदद के ज़रिए ख़ुद की मदद करने की सीख देते ये दो अनमोल अनुभव...

मानसी जैन, लोकेश कुमावत16 दिन पहले
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ईमानदारी ने जीता दिल

कुछ साल पहले की बात है, मैं अपने परिवार के साथ कश्मीर भ्रमण के लिए गई थी। बर्फ के पहाड़, झीलें, स्वच्छ हवा का स्पर्श बहुत ही सुहावना लग रहा था। एक दिन हमें पहलगाम के पहाड़ों की चढ़ाई करनी थी। यह पहाड़ जो कि समुद्र तल से 8,990 फीट की ऊंचाई रखता है। उस पर चढ़ने के लिए घोड़े की सवारी करनी होती है। घोड़े की सवारी करवाने वाले दो-तीन, 13-14 साल के बच्चे थे जो हमें नीचे से ऊपर घोड़े पर ले जाने वाले थे। यह बहुत ही खड़ी और ख़तरनाक चढ़ाई थी। मेरे घोड़े का नाम टिकटिक था जो बहुत ही शांत और समझदार घोड़ा प्रतीत हो रहा था। मैं आश्चर्य कर रही थी कि कैसे यह घोड़े इतना ज़्यादा भार उठाकर शांति से कठिन रास्ते पर चलते चले जा रहे थे। बीच रास्ते में, एक जगह पर फोटो खींचने के लिए रुकना था। हम सबने घोड़े से उतरकर फोटो खींचा और वापस घोड़े पर सवार होकर ऊपर की ओर बढ़ने लगे। ये लड़के घोड़ों से बात करते हुए उनको प्रेरित करते हुए आगे बढ़ा रहे थे। ऊपर पहुंचते ही हम उतरे और मैंने अपना फोन निकाला फिर से फोटो खींचने के लिए। वहां का दृश्य देखकर ही हम सब मुग्ध हो गए। अब समझ आया इसे मिनी स्विट्जरलैंड क्यों कहते हैं! जब मैंने अपनी जेब से फोन निकाला, उस वक़्त मुझे पता चला कि मेरी जेब में ₹पांच हज़ार रुपए रखे थे वो शायद कहीं गिर गए! मैं बहुत ही परेशान हो गई और मैंने अपने परिवार को बताया कि मेरे ₹पांच हज़ार रुपए मुझे मिल नहीं रहे हैं! हम सब ने यह निष्कर्ष निकाला कि जहां हम बीच रास्ते में फोटो खींचने के लिए रुके थे, वहीं पर फोन निकालते वक़्त शायद वह पैसे गिर गए थे। मुझे एकदम से रोना आ गया क्योंकि यह पैसे बहुत ज़्यादा थे और वापस नीचे जाकर आना अब मुश्किल ही दिख रहा था। उस दिन पर्यटकों की भीड़ भी काफ़ी दिख रही थी और वापस गए भी तो पैसे मिलना नामुमकिन-सा लग रहा था। इतने में मेरे घोड़े का चालक बच्चा बोला, ‘आप लोग यहां घूमना चालू करें तब तक मैं उस जगह पर जाकर देखकर आता हूं।’ वह फटाक से दौड़ लगाकर नीचे गया। हम सब वहीं बैठ गए। मेरी तो घूमने की इच्छा ही ख़त्म हो गई। वह वापस आया क़रीबन 15-20 मिनट में। मैं उसकी गति देखकर हैरान रह गई। वह पैदल ही गया था और वह पैसे ढूंढने में सक्षम रहा। उसने मुझे पूरे पैसे वैसे के वैसे लौटाए, मेरी चिंता ख़त्म हुई। उस लड़के की ईमानदारी और निष्ठा देखकर बहुत ही अच्छा लगा। उसे मैंने इनाम के तौर पर कुछ रुपए दिए परंतु उसने रखे नहीं। वाकई! भलाई का ज़माना है!”

मदद के बदले ...

हमारा गांव शहर से थोड़ा दूर पड़ता है। चूंकि दूरी कम ही है इसलिए शहर जाने के लिए साधन मुश्किल से मिलते हैं। मेरा कॉलेज शहर में है इसलिए मैं अक्सर बाइक लेकर कॉलेज जाता हूं। बहुत से लड़के सुबह-सुबह कॉलेज या कोचिंग जाते हुए इस रास्ते पर दिखाई दे जाते हैं। उनमें से अधिकतर या तो पैदल या किसी बाइक पर जाते हैं और कुछ किसी से लिफ्ट लेकर मेन स्टैंड तक जाते हैं। जब मैं बाइक लेकर जाता हूं तो बहुत से लड़के मेरी बाइक के आगे हाथ हिलाया करते हैं लेकिन मैं अक्सर अकेला जाना पसंद करता हूं। इसलिए किसी को लिफ्ट नहीं देता हूं। उस दिन मैं थोड़ा लेट हो गया था। इसलिए बिना हेलमेट के घर से निकल गया। हमेशा की तरह दो या तीन हाथ मेरी बाइक के आगे लोगों ने दिए लेकिन मैंने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया फिर थोड़ी दूर पर अचानक एक लड़का मेरी बाइक के सामने इतनी तेज़ी से आया कि मुझे रुकना पड़ा। वो बोला, ‘भैया मुझे मेन स्टैंड तक छोड़ दीजिए आज मेरा एग्ज़ाम है। मैंने उसे मेन स्टैंड पर उतारा और उसने मुझे धन्यवाद कहा। कुछ दिन बाद मेरा एग्ज़ाम था और बाइक की ख़राबी की वजह से मैं कुछ जल्दी घर से निकल गया। मैं थोड़ा जल्दी में था इसलिए मैंने सड़क से गुज़रने वाले साधनों पर ध्यान नहीं दिया। तभी एक बाइक अचानक मेरे आगे रुकी और हेलमेट के अंदर से आवाज़ आई, ‘चल रहे हो क्या भैया मेन स्टैंड तक?’ मैं बिना सोचे-समझे उसकी बाइक पर बैठ गया और हम दोनों मेन स्टैंड तक आ गए। मैंने उसको धन्यवाद कहा तभी उसने अपना हेलमेट उतारा। यह वही लड़का था जिसे उस दिन मैंने लिफ्ट दी थी। तभी वह बोला, ‘मदद के बदले मदद।’ फिर वह हेलमेट वापस लगा के चला गया। मैं देखता रहा उसकी ओर जब तक वह मेरी आंखों से ओझल नहीं हो गया। अब मैं जब भी कॉलेज जाता हूं तो किसी ना किसी को लिफ्ट ज़रूर देता हूं और मेन स्टैंड पर उसको छोड़ देता हूं। उस दिन मैंने जिं़दगी का एक सबक सीखा कि अक्सर हम दूसरों की मदद नहीं करते बल्कि दूसरों की मदद के ज़रिए अपनी मदद करते हैं।

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