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कविता:तितली-तितली ख़ूब थे खेले, नहीं उन दिनों थे झमेले, बचपन के दिनों की यादें ताज़ा करती ये ख़ूबसूरत कविता

चरनजीत सिंह कुकरेजा18 दिन पहले
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तितलियों-सा झीना हो जा

तितली-तितली ख़ूब थे खेले। नहीं उन दिनों थे झमेले।

बचपन की दहलीजें लांघी, महसूस हुए तब जग के रेले।

तितलियों का मोह छूटा और, बिसर गए दुनयावी मेले।

कशमकश में उलझा जीवन, नहीं याद दुःख कितने झेले।

यादों की गुल्लक जब तोड़ी, बिखर गए जोड़े सब धेले।

सुख के पीछे दिखा काफ़िला, गम आया तो हुए अकेले।

आदेश हुआ भीतर से रब का, हाथ में अब तो माला ले ले।

बन तितली और छू ले रब को, मार चौकड़ी, तज सभी झमेले।

कर ले झीनी मन-तन काया, श्वास पता नहीं कब रब ले ले।

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